ग़ाज़ा: हाल के सप्ताहों में, भोजन लेने की कोशिश में, 875 लोगों की मौत
संयुक्त राष्ट्र के मानवाधिकार कार्यालय (OHCHR) ने बताया कि ग़ाज़ा में, हाल के सप्ताहों में भोजन लेने की कोशिश के दौरान, भूखे और मजबूर 875 लोगों की मौत हुई है. इनमें से ज़्यादातर मौतें उन निजी राहत केन्द्रों के पास हुईं, जो कथित रूप से ग़ाज़ा मानवतावादी संस्था (GHF) द्वारा चलाए जा रहे हैं.
OHCHR के प्रवक्ता थमीन अल-ख़ीतान ने मंगलवार को बताया, "13 जुलाई तक, हमने ग़ाज़ा में 875 लोगों की मौत दर्ज की है, जो भोजन लेने की कोशिश में मारे गए. इनमें से 674 लोगों की मौत GHF केन्द्रों के पास हुई."
प्रवक्ता ने जिनीवा में पत्रकारों को जानकारी देते हुए कहा कि, शेष 201 लोगों की मौत उन रास्तों पर या आसपास हुई, जहाँ संयुक्त राष्ट्र या उसके साझीदार, राहत सामग्री ले जा रहे थे.
GHF एक निजी संगठन है, जो अमेरिका और इसराइल द्वारा चलाया जा रहा है जिसने संयुक्त राष्ट्र के नियमित मानवीय सहायता अभियानों को दरकिनार कर दिया है.
27 मई को दक्षिण ग़ाज़ा में, अमेरिका-इसराइल समर्थित राहत केन्द्रों की शुरूआत के साथ, उनसे जुड़ी हत्याओं की घटनाएँ सामने आने लगी थीं.
इस केन्द्र ने संयुक्त राष्ट्र और पहले से काम कर रहे विश्वसनीय संगठनों को पूरी तरह दरकिनार कर दिया.
स्थानीय लोगों का कहना है कि इन निजी राहत केन्द्रों पर भोजन पाने की कोशिश जानलेवा साबित हो रही है.
नहीं थम रही गोलीबारी...
ख़बरों के अनुसार, हाल ही की घटना में 14 जुलाई को ग़ाज़ा के रफ़ाह के अस-शाकूश इलाके़ में, भोजन लेने GHF राहत केन्द्र पर पहुँचे लोगों पर, इसराइली बलों ने गोलाबारी की और गोले दागे.
OHCHR के अनुसार, इस हमले में दो फ़लस्तीनी मारे गए और क़रीब नौ लोग घायल हुए. कुछ घायलों को रैडक्रॉस समिति (ICRC) के रफ़ाह स्थित अस्पताल में पहुँचाया गया था.
इसी अस्पताल में शनिवार को भी 130 से ज़्यादा घायल लोग पहुँचाए गए थे, जिनमें से ज़्यादातर को गोली लगी थी.
सभी घालों ने बताया कि वे सिर्फ़ भोजन लेने के लिए राहत केन्द्र की ओर जा रहे थे.
फ़लस्तीनी शरणार्थियों के लिए काम करने वाली संयुक्त राष्ट्र एजेंसी - UNRWA ने आम लोगों की लगातार हो रही मौतों पर गहरी चिन्ता जताई है, जो सिर्फ़ भोजन लेने की कोशिश कर रहे थे.
बच्चों में गम्भीर कुपोषण
इस बीच बच्चों में जानलेवा कुपोषण तेज़ी से बढ़ रहा है. UNRWA की संचार निदेशक जूलिएट टौमा ने कहा, "हमारी धरातल पर मौजूद टीमों, UNRWA और अन्य संयुक्त राष्ट्र एजेंसियों की टीमों ने, इन हमलों से जीवित बचे लोगों से बात की है. इनमें वो भूखे बच्चे भी शामिल हैं, जो थोड़ा-सा भोजन लेने के लिए जा रहे थे, लेकिन उन पर भी गोलियाँ चला दी गईं."
जूलिएट टौमा ने, अम्मान से वीडियो के ज़रिए बताया कि ग़ाज़ा पर इसराइल की लगभग पूर्ण नाकाबन्दी के कारण अब नवजात शिशु भी गम्भीर कुपोषण की वजह से दम तोड़ने लगे हैं.
उन्होंने कहा, "हमें पिछले चार महीनों से ग़ाज़ा में किसी भी तरह की मानवीय सहायता सामग्री ले जाने की अनुमति नहीं दी गई है."
2 मार्च से शुरू हुई इस नाकाबन्दी के बाद से बच्चों में कुपोषण के मामलों में भारी बढ़ोत्तरी देखी गई है.
निदेशक टौमा ने बताया कि मिस्र और जॉर्डन में, मानवीय सहायता सामग्री से भरे हुए क़रीब 6 हज़ार ट्रक, ग़ाज़ा में प्रवेश करने के लिए प्रतीक्षा कर रहे हैं. इन ट्रकों में, जिनमें भोजन सामग्री, दवा और साबुन जैसी बुनयादी समाग्री भरी हुई है. अगर ये मदद ग़ाज़ा तक नहीं पहुँची, तो ये सामान ख़राब हो जाएगा.
ग़ाज़ा में 10 लाख बच्चों को इस मदद की सख़्त ज़रूरत है जोकि वहाँ की आबादी का लगभग आधा हिस्सा हैं.
एक 'ख़ामोश युद्ध'
वहीं, इसराइली क़ब्ज़े वाले पश्चिमी तट और पूर्वी येरूशेलम में, फ़लस्तीनियों की हत्या की घटनाएँ लगातार बढ़ रही हैं.
संयुक्त राष्ट्र की एजेंसियों ने बताया कि इन हत्याओं का सम्बन्ध इसराइली बस्तियों और सुरक्षा बलों से हो सकता है.
OHCHR के अनुसार, जनवरी में, इसराइली बलों ने, दो साल की एक बच्ची को उसके घर में ही सिर में गोली मारी, जबकि 3 जुलाई को 61 वर्षीय बुज़ुर्ग को नमाज़ अदा करके लौटते हुए, नूर शम्स शिविर के बाहर, गोली दागकर मार दिया गया.
संयुक्त राष्ट्र के मानवाधिकार कार्यालय ने कहा कि पिछले कुछ सप्ताहों में फ़लस्तीनियों पर हमले, हत्या और उत्पीड़न के मामले बढ़ गए हैं.
OHCHR के थमीन अल-ख़ीतान ने बताया कि इसराइल के "लौह दीवार" अभियान के बाद से, क़ब्ज़े वाले पश्चिमी तट के उत्तरी इलाक़े में लगभग 30 हज़ार फ़लस्तीनियों को जबरन विस्थापित कर दिया गया है, और सैकड़ों घर भी ध्वस्त कर दिए गए हैं.
उन्होंने कहा कि अन्तरराष्ट्रीय क़ानून के तहत, क़ब्ज़े रखने वाले पक्ष के लिए स्थाई जनसंख्या में बदलाव लाना, युद्ध अपराध और जातीय सफ़ाया माना जा सकता है.
UNRWA की जूलिएट टौमा ने कहा कि फ़िलहाल यह एक 'ख़ामोश युद्ध' है जिसमें लोगों की आवाजाही पर कड़ी पाबन्दियाँ, बढ़ती ग़रीबी और बेरोज़गारी है.
इस सैन्य अभियान से जेनिन, तुलकरम और नूर शम्स जैसे शरणार्थी शिविर प्रभावित हुए हैं, और यह 1967 के बाद, पश्चिमी तट में सबसे बड़े स्तर पर फ़लस्तीनी विस्थापन का कारण बन रहा है.