'एक बैटरी, एक क़दम', स्वच्छ ऊर्जा में राह दिखाता छत्तीसगढ़
भारत नवीकरणीय ऊर्जा उत्पादन में तेज़ी से अपने क़दम आगे बढ़ा रहा है. पूर्वी प्रदेश छत्तीसगढ़ ने, देश का सबसे बड़ा सौर संयंत्र बनाया है जो दिन के दौरान उत्पन्न ऊर्जा को, विशाल बैटरी का उपयोग करके संग्रहीत करता है. इस संग्रहित हरित ऊर्जा को सूरज ढलने के बाद घरों और व्यवसायों में इस्तेमाल किया जा सकता है. इस पहल ने लोगों की ज़िन्दगी में सुखद बदलाव शुरू कर दिया है.
विश्व बैंक के समर्थन से बनी यह परियोजना, 2030 तक 500 गीगावाट नवीकरणीय ऊर्जा को भारत के राष्ट्रीय ऊर्जा ग्रिड में सम्मिलित करने के लक्ष्य तक पहुँचाने के लिए मार्गदर्शक साबित हो रही है.
तपती गर्मियों की दोपहरी में, जब बिजली चली जाती थी मगर अचानक पंखे फिर से चलने भी लगते थे, तो बच्चे सुखद अचरज के साथ "जादुई डिब्बे" का ख़ामोश शुक्रिया अदा करते नज़र आते थे.
ये डिब्बे दरअसल साधारण घरेलू बैटरियाँ थीं, जो बिजली को संग्रहीत करके, ज़रूरत के समय उपयोग में लाई जाती थीं. हालाँकि उस समय वो बैटरियाँ केवल एक कमरे तक सीमित थीं, लेकिन अब भारत, एक बहुस्तरीय और व्यापक ऊर्जा भंडारण प्रणाली की ओर बढ़ चुका है.
छत्तीसगढ़ के राजनांदगांव में एक शान्त लेकिन क्रान्तिकारी ऊर्जा परिवर्तन हो रहा है. कोयले पर अपनी ऐतिहासिक निर्भरता के बावजूद, यह प्रदेश, अब भारत के पहले और सबसे बड़े सौर ऊर्जा संयंत्र का घर बन गया है, जिसमें एक ग्रिड-स्तरीय बैटरी ऊर्जा भंडारण प्रणाली (Battery Energy Storage System - BESS) जोड़ी गई है.
भारत में पहली बार इतने बड़े पैमाने पर, दिन के समय सूर्य की रौशनी से उत्पन्न सौर ऊर्जा को बैटरियों में संग्रहित किया जा रहा है.
100 मेगावाट (MW) क्षमता वाला यह सौर संयंत्र और इससे जुड़ी 40 MW की बैटरी भंडारण प्रणाली, तीन घंटे तक सौर ऊर्जा संग्रहीत कर सकती है. ये सब भारत में ऊर्जा के उत्पादन, भंडारण और वितरण के तरीक़े को नया आकार दे रहे हैं.
यह संयंत्र, 450 एकड़ की बंजर भूमि पर बनाया गया है, जिससे प्रदेश के घने जंगलों और उपजाऊ खेतों का संरक्षण सुनिश्चित हो सके.
विश्व बैंक के समर्थन से बनी यह परियोजना, 2030 तक 500 गीगावाट नवीकरणीय ऊर्जा को भारत के राष्ट्रीय ऊर्जा ग्रिड में सम्मिलित करने के लक्ष्य तक पहुँचाने के लिए मार्गदर्शक साबित हो रही है.
यह परियोजना भारत के स्वच्छ ऊर्जा लक्ष्यों की दिशा में एक अहम और पथ-प्रदर्शक पहल है. इसमें विश्व बैंक से 6.7 करोड़ डॉलर और जलवायु निवेश कोष (Climate Investment Funds) से 2.2 करोड़ डॉलर की वित्तीय सहायता प्रदान की गई है.
परियोजना का संचालन और कार्यान्वयन भारत सरकार का संगठन भारतीय सौर ऊर्जा निगम (SECI) कर रहा है.
स्थानीय से राष्ट्रीय ग्रिड तक
2017 में ऑस्ट्रेलिया ने Hornsdale में दुनिया का पहला, ग्रिड से जुड़ा बैटरी ऊर्जा संयंत्र स्थापित करके वैश्विक स्तर पर एक नई दिशा दिखाई.
इसी तरह के नवाचारों से प्रेरणा लेते हुए, भारत में भी सौर ऊर्जा निगम (SECI) और विश्व बैंक ने मिलकर, ऊर्जा भंडारण की उच्च तकनीक को राष्ट्रीय स्तर पर लागू करने की पहल की.
यह पहल उस व्यापक रणनीति का हिस्सा है जिसके तहत भारत ने 2030 तक 500 गीगावाट गैर-जीवाश्म ईंधन आधारित ऊर्जा को राष्ट्रीय ग्रिड में शामिल करने का लक्ष्य तय किया है.
छत्तीसगढ़ में स्थापित यह संयंत्र इस अन्तरराष्ट्रीय सहयोग की पहली प्रमुख उपलब्धि के रूप में सामने आया है. भले ही इसकी क्षमता भारत के दीर्घकालिक ऊर्जा लक्ष्यों की तुलना में सीमित हो, यह एक दिशा-निर्देशक परियोजना है.
यह संयंत्र सूर्यास्त के बाद भी घरों, विद्यालयों, अस्पतालों और व्यावसायिक प्रतिष्ठानों को निरन्तर हरित ऊर्जा प्रदान करता है, और प्रतिवर्ष लगभग 1.7 लाख टन कार्बन उत्सर्जन में कमी लाने में सहायक है.
रौशन भविष्य
जो बैटरियाँ कभी केवल बिजली कटने पर एक कमरे की रौशनी बचाने का साधन थीं, आज वे पूरे देश को स्वच्छ और टिकाऊ ऊर्जा से रौशन करने की क्षमता रखती हैं.
छत्तीसगढ़ अब केवल एक प्रदेश नहीं, बल्कि भारत के स्वच्छ ऊर्जा भविष्य की दिशा में एक प्रेरणादायक मॉडल बन चुका है.
यह केवल एक संयंत्र की नहीं, बल्कि उस बदलाव की कहानी है, जिसके ज़रिए भारत अपने ऊर्जा भविष्य को "एक बैटरी, एक क़दम" की सोच से नए सिरे से आकार दे रहा है.
इस लेख का विस्तृत संस्करण यहाँ प्रकाशित हुआ.