एआई मॉडल में छोटे बदलावों के ज़रिए 'बिजली खपत में बड़ी कटौती सम्भव'
कृत्रिम बुद्धिमता (एआई) के बढ़ते इस्तेमाल से दैनिक कामकाज में बड़े बदलाव आ रहे हैं. टैक्स्ट, वीडियो, संगीत समेत अन्य सामग्री को तैयार करना सरल हो गया है और हर दिन बीतने के साथ करोड़ों लोगों की निर्भरता इस पर बढ़ती जा रही है. मगर, इस टैक्नॉलॉजी के उभरने के साथ ही एक चिन्ता भी गहरा रही है: पर्यावरण पर इसका दुष्प्रभाव और बिजली की निरन्तर बढ़ती मांग. अब एक नए अध्ययन के अनुसार, एआई के चुनिन्दा मॉडल की बनावट और इस्तेमाल में छोटे बदलावों के ज़रिए इनकी ऊर्जा खपत में विशाल कटौती की जा सकती है.
एआई टैक्नॉलॉजी के इस्तेमाल में बड़े पैमाने पर संसाधनों की खपत होती है. विशाल डेटा केन्द्रों, हार्डवेयर सामग्री को चलाने के लिए बिजली आपूर्ति की ज़रूरत है. वहाँ डीज़ल जनरेटर, बैटरी की भी व्यवस्था की जाती है और मशीनों का तापमान ज़्यादा होने से रोकने के लिए, जल का भी उपयोग किया जाता है.
संयुक्त राष्ट्र शैक्षिक, वैज्ञानिक एवं सांस्कृतिक संगठन (UNESCO) के एक नए अध्ययन में एआई के ऐसे संक्षिप्त (कॉम्पैक्ट) मॉडल अपनाने की पैरवी की गई है, जिनसे संसाधनों का इस्तेमाल घटाया जा सकेगा.
यूनेस्को ने युनिवर्सिटी कॉलेज लन्दन की साझेदारी में अपना यह अध्ययन बुधवार को प्रकाशित किया है, जिसके अनुसार, लॉर्ज लैंग्वेज मॉडल्स (Large Language Models/LLMs) में छोटे बदलावों की मदद से ऊर्जा खपत में 90 प्रतिशत तक की कटौती की जा सकती है.
LLM मॉडल, कृत्रिम बुद्धिमता टैक्नॉलॉजी का ही एक प्रकार हैं, जो किसी यूज़र द्वारा दिए गए इनपुट को न केवल समझ सकते हैं, बल्कि एक व्यक्ति की तरह उसका लिखित में जवाब भी दे सकते हैं.
इन मॉडल को गहरी समझ विकसित करने वाली तकनीक (deep learning technique) की मदद से तैयार किया जाता है, जिससे लिखित डेटा, भाषा की जटिल बनावट को पढ़ा-समझा जा सकता है, और उसके अनुरूप जवाब तैयार किए जा सकते हैं.
वहीं, जनरेटिव एआई (GenAI) की मदद से टैक्स्ट, तस्वीरें, संगीत और कम्प्यूटर कोड जैसी सामग्री बनाई जा सकती है, जिनमें ChatGPT, गूगल जैमिनाई और बाइडू (Baidu) के ERNIE जैसे चैट बॉट्स भी शामिल हैं.
बिजली की बढ़ती खपत
हर दिन, एक अरब से अधिक लोग जनरेटिव एआई टूल्स का इस्तेमाल करते हैं. एक बार निर्देश देने (prompt) और उसके आधार पर जवाब पाने में 0.30 वॉट-घंटे बिजली खपत होने का अनुमान है, जोकि प्रति वर्ष कुल 310 गीगावॉट-घंटे तक पहुँचती है.
यह अफ़्रीका में एक निम्न-आय वाले देश में 30 लाख लोगों की वार्षिक बिजली खपत के समान है और तेज़ी से बढ़ती जा रही है.
जनरेटिव एआई मॉडल के इस्तेमाल का पर्यावरण पर गहरा दुष्प्रभाव हो रहा है, बिजली की मांग के साथ-साथ जल की खपत में भी वृद्धि हो रही है, जिससे हार्डवेयर व मशीनों को ठंडा रखा जाता है.
यूनेस्को के इस अध्ययन में, एआई को और अधिक टिकाऊ बनाने, इसके इस्तेमाल व विकास में नए दृष्टिकोण व उपायों को अपनाने पर बल दिया गया है. साथ ही, उपभोक्ताओं को भी जागरुक बनाया जाना आवश्यक है ताकि वे इसके पर्यावरणीय दुष्प्रभावों में कमी लाने के लिए प्रयास कर सकें.
तीन अहम उपाय
विशेषज्ञों ने एआई से पर्यावरण पर होने वाले प्रभावों में कमी लाने के लिए, Smarter, Smaller Stronger, Resource Efficient AI and the Future of Digital Transformation नामक रिपोर्ट में एआई के टिकाऊ उपयोग पर शोध एवं विकास के लिए निवेश को अहम बताया है.
इसके साथ ही, तीन अहम समाधानों पर बल दिया है, जिनके ज़रिए सटीक नतीजों के साथ बिजली खपत में ठोस कटौती की जा सकती है.
पहला - छोटे, स्मार्ट एआई मॉडल का इस्तेमाल, जोकि बड़े मॉडल जितना ही सटीक हों. यानि सभी प्रकार की सामग्री तैयार करने वाले एक मॉडल के बजाय, ऐसे मॉडल बनाए जाएं जोकि विशिष्ट उद्देश्यों व कार्य के ही इस्तेमाल में आ सकें, जैसेकि केवल अनुवाद या फिर सारांश तैयार करने के लिए मॉडल.
ये तभी सक्रिय किए जा सकेंगे, जब उनसे कोई काम करने के लिए कहा जाए.
दूसरा - सामग्री तैयार करने के लिए छोटे, सुस्पष्ट निर्देश (prompts). इन उपायों की मदद से बिजली के इस्तेमाल में 50 फ़ीसदी तक की कमी लाई जा सकती है.
तीसरा - मॉडल के आकार को घटाना. विशेषज्ञों के अनुसार, एआई मॉडल को घटाकर ऊर्जा खपत में 44 प्रतिशत की कटौती करना सम्भव है. इस तकनीक को ‘quantization’ कहा जाता है, जिसमें सटीकता को प्रभावित किए बग़ैर ऊर्जा खपत कम की जा सकती है.