वैश्विक परिप्रेक्ष्य मानव कहानियां

स्रेब्रेनीत्सा जनसंहार के 30 वर्ष: सत्य, न्याय और सतर्कता की पुकार

एक व्यक्ति ने अपनी हथेली में पुरुषों की कई छोटी, पुरानी तस्वीरें पकड़ रखी हैं।
UN News/Hisae Kawamori काडा होतिच ने स्रेब्रेनीत्सा जनसंहार में अपने बेटे, पति और दो भाइयों को खो दिया, जैसा कि यहां दिखाया गया है.

स्रेब्रेनीत्सा जनसंहार के 30 वर्ष: सत्य, न्याय और सतर्कता की पुकार

मानवाधिकार

स्रेब्रेनीत्सा (Srebrenica) जनसंहार में जीवित बचे लोगों ने मंगलवार को संयुक्त राष्ट्र के शीर्ष अधिकारियों के साथ, उस भयावह घटना की 30वीं बरसी मनाई. उस जनसंहार में बोस्निया के हज़ारों मुसलमानों की सुनियोजित ढंग से हत्या की गई थी, जिसे द्वितीय विश्व युद्ध के बाद, योरोप की ज़मीन पर हुआ सबसे भयानक अत्याचार माना गया. 

इस बरसी के अवसर पर यूएन महासभा में आयोजित एक विशेष कार्यक्रम में, स्रेब्रेनीत्सा जनसंहार से इनकार करने की प्रवृत्ति का विरोध करने, पीड़ितों को समर्थन देने और स्थाई शान्ति को बढ़ावा देने की आवश्यकता पर ज़ोर दिया गया.

मुनीरा सुबाशिच एक ऐसी भुक्तभोगी हैं जिनके सबसे छोटे बेटे और उनके 21 अन्य परिजनों को, जुलाई 1995 में स्रेब्रेनीत्सा जनसंहार में मार दिया गया था.

मुनीरा सुबाशिच ने कहा, "मैं एक जनसंहार होते देखा है,...और दुनिया व योरोप बस चुपचाप तमाशा देखते रहे."

अब मुनीरा ने, ‘स्रेब्रेनीत्सा और ज़ेपा की माताएँ' नामक संगठन की अध्यक्ष के रूप में, वैश्विक नेताओं से आग्रह किया है कि वे अतीत को नहीं भूलें और पीड़ितों व जीवित बचे लोगों को न्याय दिलाएँ.

उन्होंने कहा, "जब आप किसी माँ के बच्चे को मारते हैं, तो आप उसके एक पूरे हिस्से को ख़त्म कर देते हैं," 

हज़ारों लोगों की हत्या हुई

1995 में बोस्नियाई सर्ब बलों द्वारा स्रेब्रेनीत्सा में किए गए जनसंहार में, क़रीब 8 हज़ार 372 पुरुषों और लड़कों की हत्या कर दी गई थी, हज़ारों लोग विस्थापित हुए और पूरी की पूरी बस्तियाँ उजाड़ दी गईं, जबकि यह क्षेत्र संयुक्त राष्ट्र सुरक्षा परिषद द्वारा "सुरक्षित क्षेत्र" घोषित किया गया था.

संयुक्त राष्ट्र के अन्तर्गत तैनात डच शान्ति सैनिकों की एक छोटी और कम हथियारों से लैस टुकड़ी, बड़ी बोस्नियाई सर्ब सेना को नहीं रोक सकी, जिसके बाद शहर पर सर्ब सेना का क़ब्ज़ा हो गया था.

इस जनसंहार को अन्तरराष्ट्रीय न्यायालय (ICJ) और पूर्व यूगोस्लाविया के लिए बने अन्तरराष्ट्रीय आपराधिक न्यायाधिकरण (ICTY) दोनों ने, जनसंहार के रूप में मान्यता दी है.

पिछले वर्ष, संयुक्त राष्ट्र महासभा ने 11 जुलाई को, "1995 स्रेब्रेनीत्सा जनसंहार की स्मृति और आत्मचिन्तन का ‘अन्तरराष्ट्रीय दिवस’ घोषित किया था.

United Nations मुख्यालय के गलियारे में लगी एक प्रदर्शनी में एक बड़े पोस्टर पर एक बुजुर्ग महिला का काला और सफेद चित्र प्रदर्शित किया गया है।
UN Photo/Loey Felipe

पीड़ितों को सम्मान दें

यूएन महासचिव एंतोनियो गुटेरेश के प्रमुख सचिव कोर्टेने रैट्रे ने, उनकी तरफ़ से, उस जनसंहार में मारे गए लोगों को श्रद्धांजलि अर्पित की, और उनके परिवारों के साहस की सराहना की.

उन्होंने कहा, “आज हम पीड़ितों को याद करते हैं और उन्हें सम्मान देते हैं. हम जीवित बचे लोगों की मज़बूती, गरिमा और जुझारूपन को नमन करते हैं.” 

महासचिव ने अपने सन्देश में कहा कि अन्तरराष्ट्रीय समुदाय को नफ़रत, विभाजन और जनसंहार को नकारे जाने की प्रवृत्तियों के ख़िलाफ़ डटे रहना चाहिए.

उन्होंने कहा, “हम, सभी पीड़ितों के दुख को मान्यता देकर ही, आपसी समझ, विश्वास और स्थाई शान्ति की नींव रख सकते हैं.” 

“हमें यह सुनिश्चित करना चाहिए कि स्रेब्रेनीत्सा जनसंहार में जीवित बचे लोगों की आवाज़ें सुनी जाती रहें, ताकि उस जनसंहार को नकारे जाने, उसके बारे में सच्चाई को तोड़-मरोड़ कर पेश किए जाने और इतिहास के विकृतिकरण का मुक़ाबला किया जा सके.”

त्रासदियाँ फिर नहीं हों

संयुक्त राष्ट्र के अधिकारियों ने चिन्ता व्यक्त करते हुए यह भी कहा कि स्रेब्रेनीत्सा जनसंहार को नकारने और युद्ध अपराधों में दोषी ठहराए गए लोगों की महिमा मंडन की कोशिशें आज भी जारी हैं.

उन्होंने चेतावनी दी कि इस तरह की सोच समाज में विभाजन को बढ़ावा देती है और मेल-मिलाप की प्रक्रिया को बाधित करती है.

महासभा के अध्यक्ष फ़िलेमॉन यैंग ने कहा, "शिक्षा ही हमारी स्मृति को मिटने से बचाने का सबसे मज़बूत माध्यम है. हमें केवल इतिहास को याद नहीं रखना है, बल्कि उससे सीख भी लेनी है, ताकि स्रेब्रेनीत्सा जैसी त्रासदियाँ फिर नहीं हों."

संयुक्त राष्ट्र महासचिव ने ज़ोर दिया कि अतीत से सीख लेना, आज पहले से कहीं अधिक ज़रूरी है, क्योंकि जो "ख़तरनाक प्रवृत्तियाँ" स्रेब्रेनीत्सा जनसंहार की कारण बनी थीं, वहीं आज फिर दुनिया में उभर रही हैं.

महासचिव ने कहा, "स्रेब्रेनीत्सा के बाद दुनिया ने एक बार फिर कहा था, 'अब कभी नहीं,' लेकिन आज फिर नफ़रत फैलाने वाली भाषा बढ़ रही है, जो भेदभाव, उग्रवाद और हिंसा को जन्म दे रही है." 

एक बिखरा हुआ परिवार

स्रेब्रेनीत्सा स्मृति केन्द्र की मिरेला उस्मानोविच का जन्म, जनसंहार के बाद हुआ, लेकिन उस जनसंहार का असर उनके जीवन पर गहराई से पड़ा है.

उस जनसंहार में, मिरेला के दो भाइयों की हत्या हुई थी, उनके कुछ अवशेष मिले, लेकिन शरीर के कई हिस्सों का पता आज भी नहीं है. यह अधूरापन उनके परिवार को हर दिन महसूस होता है.

उन्होंने कहा, "मेरे माता-पिता ने ख़ुद को किसी भी ख़ुशी से वंचित कर लिया, मानो कि उनकी हर मुस्कान अपने बेटों के साथ धोखा होगी." 

दुनिया ने वादा किया था कि स्रेब्रेनीत्सा जैसा जनसंहार फिर नहीं होगा, लेकिन 30 साल बाद भी उनके परिवार को लगता है कि ‘फिर कभी नहीं’ सिर्फ़ एक नारा रह गया है.

एक नई पीढ़ी, नए सवालों के साथ

मिरेला दुनियाभर के युवाओं से बात करती हैं, जो पूछते हैं, "हिंसा थमने के बाद क्या होता है? जब ख़बरें मिट जाती हैं, क़ब्रें मिल जाती हैं और सच्चाई सामने होती है, क्या तब न्याय आता है?"

उनका जवाब है, अक्सर न्याय नहीं आता.

"जो न्याय देर से आता है या सिर्फ़ काग़ज़ों तक सीमित रहता है, वह भरोसा बहाल नहीं कर सकता. और गरिमा के बिना शान्ति, असली शान्ति नहीं होती."