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असम के डिब्रूगढ़ में एक आंगनवाड़ी केन्द्र में प्रारम्भिक बाल शिक्षा सत्र के दौरान खेलते बच्चे.

असम में 'जीवन की धारा को पार करना ही होगा' कहावत से साहसी प्रेरणा

© UNICEF/Biju Boro
असम के डिब्रूगढ़ में एक आंगनवाड़ी केन्द्र में प्रारम्भिक बाल शिक्षा सत्र के दौरान खेलते बच्चे.

असम में 'जीवन की धारा को पार करना ही होगा' कहावत से साहसी प्रेरणा

एसडीजी

“जीबोन एति नोदिर सुत, जी पार कोरी जाबो लागे,” जिसका अर्थ है - “जीवन नदी की धारा की तरह है, जिसे पार करना ही होगा.” यह कहावत असम में जलवायु परिवर्तन और बार-बार आने वाली प्राकृतिक आपदाओं की चुनौतियों को सटीक रूप से दर्शाती है. यूनीसेफ़ का मानना है कि अब एकजुट होकर बच्चों के भविष्य के लिए ठोस समाधान खोजे जाने का समय आ गया है.

भारत में यूनीसेफ़ की प्रतिनिधि, सिंथिया मैक्केफ़्री ने हाल ही में असम का दौरा किया, जोकि एक ऐसा राज्य है जो सुन्दरता व संघर्ष, दोनों का प्रतीक है. 

उन्होंने, डिब्रूगढ़ ज़िले के डिकॉम से लेकर दिनजॉय तक के अपने सफ़र में, चाय बागान की हरियाली के बीच यह क़रीब से देखा कि यूनीसेफ़ के कार्यक्रम किस तरह स्थानीय समुदायों के जीवन में ठोस और सकारात्मक बदलाव ला रहे हैं.

यूनीसेफ़ ने असम में, बढ़ते जलस्तर और जलवायु संकट को देखते हुए, प्रदेश के लिए एक व्यापक बाढ़ नियंत्रण योजना तैयार की है.

इस योजना में विशेष रूप से कमज़ोर वर्ग के बच्चों और समुदायों की सुरक्षा, पोषण, स्वास्थ्य, शिक्षा, सामाजिक सुरक्षा व जल, स्वच्छता एवं स्वास्थ्य (WASH) से जुड़ी तैयारियों को प्राथमिकता दी गई है. यह कार्य प्रदेश सरकार के सहयोग से आगे बढ़ाया जा रहा है.

205 चाय बागान में एक दशक का प्रभाव

यूनीसेफ़ वर्ष 2007 से, असम के चाय बागान में उन बुनियादी कमियों को दूर करने की दिशा में निरन्तर काम कर रहा है, जहाँ प्रथम बागान श्रम अधिनियम के प्रावधानों को, प्रभावी रूप से लागू नहीं किया गया था.

इन प्रयासों का प्रत्यक्ष असर आज युवाओं की ज़िन्दगी में दिखाई देता है. 16 वर्षीय पूजा ओरंग गर्व से बताती हैं, “मैंने सिर्फ़ 15 मिनट में अपना बैंक खाता खोल लिया! अब मैं छात्रवृत्ति पाना चाहती हूँ और बचत करके ज़रूरतमंदों की मदद करना चाहती हूँ.”

यूनीसेफ़ और असम राज्य ग्रामीण आजीविका मिशन (ASRLM) की साझेदारी से आज महिलाएँ और युवतियाँ, अपने वित्तीय निर्णय स्वयं ले रही है.

यह पहल पाँच चाय ज़िलों में वित्तीय समावेशन को बढ़ावा देती है और महिलाओं को जलवायु आपदाओं के दौरान शिक्षा एवं सामाजिक सुरक्षा योजनाओं का सीधा लाभ प्राप्त करने में सक्षम बनाती है.

डिब्रूगढ़ के दिनजॉय टी एस्टेट स्थित आंगनवाड़ी केन्द्र में भारत में यूनिसेफ़ की प्रतिनिधि सिंथिया मैक्केफ़्री और यूनीसेफ़ की क्षेत्रीय सलाहकार (CAP) समान्था मॉर्ट माताओं और उनके बच्चों के साथ.
© UNICEF/Biju Boro

स्कूलों में आपदा-तैयारी और जलवायु शिक्षा

बारबरूआ लोअर प्राइमरी स्कूल का दृश्य असम में बच्चों की नई जागरूकता का प्रतीक बन गया. 

यूनीसेफ़ की प्रतिनिधि सिंथिया मैक्केफ़्री ने देखा कि 10 वर्षीय बिनीता घाटोवर और उसके साथी कक्षा में बैठकर भूकम्प की स्थिति में अपनाई जाने वाली सावधानियों को अपने मस्तिक में उकेरने की कोशिश कर रहे थे. तभी अचानक आपदा अलार्म बजा - और बच्चे लोमड़ी-सी फुर्ती से मेज़ के नीचे छिप गए.

कुछ ही क्षणों बाद, जब शिक्षकों ने सभी के सुरक्षित होने की पुष्टि की, तो बच्चे अनुशासित ढंग से बाहर आए और अपने बैग सिर पर रखकर रोल कॉल के लिए लाइन में खड़े हो गए. तभी एक बच्चे की आवाज़ गूँजती है - “पेड़ के बगल में शरण मत लो!”

यह दृश्य दर्शाता है कि अब बच्चे सिर्फ़ पाठ्यक्रम नहीं पढ़ रहे, बल्कि आपदाओं से सुरक्षित रहने के लिए व्यवहारिक ज्ञान भी अर्जित कर रहे हैं. 

यूनीसेफ़ द्वारा चलाए जा रहे जलवायु अनुकूलन शिक्षा कार्यक्रम, स्कूलों में बच्चों को बदलते पर्यावरणीय जोखिमों से निपटने के लिए तैयार कर रहे हैं.

सिंथिया ने अनुभव साझा करते हुए कहा, “मैंने 193 युवा शिक्षार्थियों को देखा, जो अपनी उम्र के अनुसार दी जा रही व्यावहारिक शिक्षा के ज़रिए जागरूक और आत्मविश्वासी बन रहे हैं.”

आज यूनीसेफ़ के सहयोग से 419 चाय बागान-प्रबंधित स्कूल असम की राज्य शिक्षा प्रणाली में शामिल हो चुके हैं - जहाँ बच्चों को पाठ्यपुस्तकों के साथ-साथ स्वच्छ जल, शौचालय, और नियमित आपदा तैयारी की सुविधाएँ भी उपलब्ध कराई जा रही हैं.

भारत में यूनीसेफ़ की प्रतिनिधि सिंथिया मैक्केफ़्री और यूनीसेफ़ की क्षेत्रीय सलाहकार (CAP) समान्था मॉर्ट, डिब्रूगढ़ के दिनजॉय टी एस्टेट स्थित आंगनवाड़ी केन्द्र में एक माँ और उसके बच्चे के साथ.
© UNICEF/Biju Boro

स्थानीय नेतृत्व, सामूहिक समर्थन

यह प्रगति केवल यूनीसेफ़ के प्रयासों की देन नहीं है, बल्कि एक समन्वित साझेदारी और ठोस प्रयासों का परिणाम है. 

असम में आपदा जोखिम न्यूनीकरण रोडमैप 2030, मिशन वात्सल्य, और बाल विवाह समाप्ति मिशन जैसे प्रमुख प्रयासों में राज्य सरकार, शिक्षाविदों व नीति-निर्माताओं ने मिलकर एक सक्रिय और निर्णायक भूमिका निभाई है.

यूनीसेफ़ की भारत प्रतिनिधि सिंथिया मैक्केफ्री ने आगाह करने के अन्दाज़ में कहा, “ब्रह्मपुत्र का जल स्तर बढ़ रहा है. असम के बच्चे लगातार बाढ़, गर्मी, तूफ़ान और भूकम्प जैसी आपदाओं से जूझ रहे हैं. वे अकेले इन बाधाओं को पार नहीं कर सकते. अब सरकार, निजी क्षेत्र, समुदाय और मीडिया को मिलकर उनके भविष्य में निवेश करना होगा.”

यूनीसेफ़ इस दिशा में पहले ही क़दम बढ़ा चुका है - वह जलवायु-संवेदनशील समाधानों के ज़रिए स्कूलों को सुरक्षित बना रहा है, आंगनवाड़ी कार्यकर्ताओं को प्रशिक्षित कर रहा है, और युवाओं को रोज़गार योग्य कौशल सिखा रहा है ताकि वे स्वयं के साथ-साथ, अपने समुदायों को भी सशक्त बना सकें.

यह लेख पहले यहाँ प्रकाशित हुआ.

भारत में यूनीसेफ़ की प्रतिनिधि सिंथिया मैक्केफ़्री, डिब्रूगढ़ के दिनजॉय टी एस्टेट स्थित आंगनवाड़ी केन्द्र में प्रारम्भिक बाल शिक्षा सत्र के दौरान बच्चों से बातचीत करते हुए.
© UNICEF/Biju Boro