महिला नेतृत्व की मिसाल, मध्य प्रदेश में पर्यटन को मिलता नया चेहरा
एक नाव की सवारी से निकलता, साँस्कृतिक सैर का रास्ता, महिलाओं की नेतृत्व क्षमता को सामने ला रहा है. ये दरअसल एक ऐसा शान्त, मगर गहरा बदलाव है जो भारत के मध्य प्रदेश प्रान्त में महिलाओं की अगुवाई में आकार ले रहा है. जो महिलाएँ कभी केवल घर तक सीमित थीं, वो आज न केवल अपना भविष्य गढ़ रही हैं, बल्कि भारतीय पर्यटन को नया चेहरा दे रही हैं.
यह बदलाव सम्भव हुआ है UN Women और मध्य प्रदेश पर्यटन बोर्ड की साझेदारी से चल रहे ‘महिलाओं के लिए सुरक्षित पर्यटन गन्तव्य’ कार्यक्रम के ज़रिए, जो महिलाओं को प्रशिक्षण, सुरक्षा और नेतृत्व का मंच देकर, समाज में नई सोच और अवसर का मार्ग खोल रहा है.
दुनियाभर में पर्यटन क्षेत्र में कार्यरत आधे से अधिक लोग महिलाएँ हैं, फिर भी नेतृत्व की ज़िम्मेदारियों में उनकी भागेदारी बेहद सीमित है.
इसका मुख्य कारण है - गहराई से जड़ें जमा हुए सामाजिक पूर्वाग्रह, देखभाल कार्य की अनदेखी जिम्मेदारियाँ, और प्रशिक्षण व वित्तीय संसाधनों तक सीमित पहुँच.
‘महिलाओं के लिए सुरक्षित पर्यटन गन्तव्य’ कार्यक्रम इन बाधाओं को सीधे चुनौती देता है. यह कार्यक्रम, महिलाओं को न केवल आर्थिक रूप से सक्षम बनाता है, बल्कि उन्हें नेतृत्व, संवाद और सार्वजनिक पहचान के अवसर देकर यह सिद्ध करता है कि दृश्यता ही सशक्तिकरण की पहली सीढ़ी है.
भारत में UN Women की कार्यवाहक स्थानीय प्रतिनिधि कान्ता सिंह कहती हैं, "जब महिलाएँ स्थानीय पर्यटन में नेतृत्व और निर्णय की भूमिका निभाती हैं, तो गन्तव्य की पूरी छवि ही बदल जाती है. महिला पर्यटक अधिक सुरक्षित महसूस करती हैं, और समाज में महिलाओं की सार्वजनिक उपस्थिति के प्रति नज़रिए में सकारात्मक बदलाव आता है."
मधु वर्मा: नाविक बनने तक का सफ़र
ओंकारेश्वर की मधु वर्मा कभी नर्मदा नदी के किनारे खड़ी होकर दूसरों की ज़िन्दगी को चलते हुए देखती थीं. आज वही मधु वर्मा, उसी नदी में नाव चलाती हैं, पर्यटकों को पौराणिक कहानियाँ सुनाती हैं - वे कहानियाँ जो कभी उन्होंने अपनी दादी से सुनी थीं.
वो कहती हैं, “मैं केवल नदी के किनारे खड़ी रहती थी, अब अपनी दिशा ख़ुद तय करती हूँ और दूसरों को भी रास्ता दिखाती हूँ.”
कुछ समय पहले तक उनका जीवन घरेलू कामों तक सीमित था. नाव चलाना और अजनबियों से बात करना उन्हें असम्भव बात नज़र आती थी, ख़ासतौर उस पेशे में जहाँ सदियों से पुरुषों का वर्चस्व रहा था.
“परिवार ने विरोध किया, पड़ोसियों ने मज़ाक उड़ाया. मुझे भी शक था - क्या मैं, एक महिला होकर, नाव चला सकती हूँ?”
फिर उन्होंने, अपराजिता महिला संघ और ‘महिलाओं के लिए सुरक्षित पर्यटन गन्तव्य’ कार्यक्रम के सहयोग से, प्रशिक्षण लिया. वर्षों बाद पहली बार कक्षा में बैठीं, मंच पर बोलना सीखा.
वो बताती हैं, “डर तो था, लेकिन दादी की कहानियाँ याद आईं - वही अब मेरी ताक़त हैं. पर्यटक सुनते हैं, मुस्कुराते हैं - और मैं भी उनके साथ मुस्कुराती हूँ.”
अब मधु की आमदनी से उनकी बेटी स्कूली शिक्षा हासिल करती है. पति उनका समर्थन करते हैं और गाँव की दूसरी महिलाएँ भी प्रेरित हो रही हैं.
वो कहती हैं, “इस काम ने मुझे केवल धन ही नहीं, घर और समाज में सम्मान भी दिलाया है.”
लीला गौड़ा: माँ की विरासत से नेतृत्व की ओर
मंडला ज़िले की लीला गौड़ा का बचपन पर्यटकों की बातचीत और कहानियों के बीच बीता. उनकी माँ रमा बाई ने गाँव का पहला ऐसा कारोबार या सुविधा शुरू की जिसमेंं पर्यटक उनके घर पर ठहर सकते थे, जिसे Homestay कहा जाता है.
लीला याद करती हैं, “मेरी माँ न तो कोई औपचारिक शिक्षा हासिल की थी, और न ही उन्हें अंग्रेज़ी भाषा का ज्ञान था, उनके भीतर भरा था तो केवल साहस. मैंने उन्हें शून्य से बहुत कुछ बनाते देखा था. मैं भी उनके क़दमों पर चलना चाहती हूँ.”
लीला अपने बचपन में पर्यटकों को गाँव की सैर पर ले जातीं, पौधों के बारे में जानकारी देती थीं, और लोक कथाएँ सुनातीं. यहीं उन्हें कहानी कहने की अपनी कला का अहसास हुआ.
लीला ने, ‘आधार’ संस्था और माँ के प्रोत्साहन के सहारे, ‘महिलाओं के लिए सुरक्षित पर्यटन गन्तव्य’ कार्यक्रम में हिस्सा लिया, जहाँ उन्हें पर्यटन प्रबन्धन, संस्कृति व्याख्या, और नेतृत्व का प्रशिक्षण मिला.
वो कहती हैं, “लोगों को सन्देह था कि मैं यह कैसे कर पाऊँगी, लेकिन मुझे अपने ज्ञान और लगन पर भरोसा था.”
आज लीला न केवल एक सफल Homestay चलाती हैं, बल्कि अपने गाँव की साँस्कृतिक प्रतिनिधि भी हैं. वो पर्यटकों को स्थानीय बुनकरों, किसानों और परम्पराओं से जोड़ती हैं.
“हमारी रोज़मर्रा की चीज़ें - जैसेकि रसोई, जंगल, कहानियाँ - दूसरों के लिए रोचक अनुभव बन जाते हैं.”
लीला अब गाँव की लड़कियों को भी आगे बढ़ने की राह दिखा रही हैं. वह मुस्कुराकर कहती हैं, “मेरी माँ ने एक दरवाज़ा खोला, मैं अब गलियारे बना रही हूँ.”
व्यक्तिगत बदलाव से नीतिगत परिवर्तन तक
‘महिलाओं के लिए सुरक्षित पर्यटन गन्तव्य’ केवल एक प्रशिक्षण कार्यक्रम नहीं, एक राज्यस्तरीय प्रतिबद्धता है, जो महिलाओं को सार्वजनिक स्थलों में सुरक्षित, आत्मनिर्भर और नेतृत्वकारी भूमिका में स्थापित करने की दिशा में प्रयासरत है.
इस पहल के लक्ष्य हैं: 10 हज़ार महिलाओं को अतिथि-सत्कार (Hospitality) में प्रशिक्षित करना, 40 हज़ार महिलाओं को आत्मरक्षा का प्रशिक्षण देना और 50 पर्यटन स्थलों में महिला नेतृत्व को सशक्त बनाना.
इस परिवर्तनकारी मॉडल को टिकाऊ बनाने में सरकारी संस्थानों की भागेदारी, UN Women की लैंगिक विशेषज्ञता, और स्थानीय संगठनों का ज़मीनी जुड़ाव अहम भूमिका निभा रहा है.
भारतीय पर्यटन का नया अध्याय
मधु वर्मा और लीला गौड़ा जैसी महिलाएँ जैसे-जैसे आगे आ रही हैं, वे केवल पर्यटन का चेहरा ही नहीं, बल्कि उसकी आत्मा भी बदल रही हैं.
उनकी उपस्थिति से महिला पर्यटकों को अधिक सुरक्षा का अनुभव होता है, समुदायों की सोच में बदलाव आता है, और लड़कियों को ऐसे रोल मॉडल नज़र आते हैं जिन्हें उन्होंने पहले कभी नहीं देखा था.
नीतियों और आँकड़ों के पीछे छिपी हैं असली कहानियाँ - उन महिलाओं की, जिन्होंने अपने जीवन की दिशा बदली, और अब दूसरों को भी बदलने के लिए प्रेरित कर रही हैं.
वे अब केवल श्रमिक नहीं, बल्कि नेता, कथावाचक, उद्यमी, और बदलाव की वाहक बन चुकी हैं.
मधु कहती हैं, “इस कार्यक्रम से पहले मुझे मालूम नहीं था कि महिलाएँ ख़ुद भी आय अर्जित कर सकती हैं, या अपनी बात कह सकती हैं. अब मुझे यक़ीन है कि हम कर सकते हैं और हमें करना ही चाहिए.”
इस लेख का विस्तृत संस्करण यहाँ प्रकाशित हुआ है.