ख़ुशहाली की धारा: उत्तराखंड में जल आपूर्ति की बदौलत बदलती ज़िन्दगी
भारत के उत्तरी प्रान्त उत्तराखंड के शहरों के बाहरी इलाक़ों में रहने वाले परिवार, हाल के समय तक अनियमित, सीमित और असुरक्षित जल आपूर्ति से जूझते रहे हैं. मगर अब उनके दिन बदल रहे हैं. उत्तराखंड सरकार ने विश्व बैंक के सहयोग से एक जल सुधार कार्यक्रम शुरू किया है जिसकी बदौलत राज्य में जल आपूर्ति की तस्वीर अब पूरी तरह बदल चुकी है.
देहरादून के बाहरी इलाक़े में रहने वाली अनीता देवी याद करती हैं कि पहले उन्हें हर दिन नदी या पहाड़ से पानी लाना पड़ता था.
इसमें उनके बच्चों को भी मदद करनी पड़ती थी, जिससे उनकी शिक्षा प्रभावित होती थी. वे कहती हैं, “पानी की व्यवस्था, जैसे कभी ख़त्म नहीं होने वाली परेशानी थी.”
आज उनके घर में रोज़ 16–24 घंटे तक शुद्ध और निरन्तर जल आपूर्ति उपलब्ध है. वो मुस्कुराते हुए बताती हैं, “अब ना नदी जाना पड़ता है, ना टैंकर के इन्तज़ार में लम्बी क़तारों में खड़ा रहना पड़ता है.”
अनीता अब उन 5 लाख 44 हज़ार लोगों में शामिल हैं जो उत्तराखंड के 22 शहरों के बाहरी इलाक़ों में इस बदलाव का लाभ उठा रहे हैं.
यहाँ 95% से अधिक घरों में लगातार तेज़ धार वाला जल पहुँच रहा है - जिससे स्वच्छता में सुधार हुआ है, बीमारियाँ घटी हैं, और महिलाओं व बच्चों के लिए समय, गरिमा और नए अवसर बढ़े हैं.
महिलाओं का कामकाज आसान
इस पहल का सबसे बड़ा बदलाव महिलाओं के जीवन व कामकाज में आया है. महिलाएँ अब घर में पानी की सुविधा मिलने से, पानी ढोकर लाने वाले काम से मुक्त हो गई हैं जिसमें बहुत थकान होती थी.
बहुत सी महिलाएँ अब पानी ढोकर लाने में लगने वाले समय को बचाकर, आज रोज़गार से जुड़ रही हैं या अपने छोटे व्यवसायों को आगे बढ़ा रही हैं.
बच्चों की शिक्षा भी अब बाधित नहीं होती और स्वच्छ जल की उपलब्धता से बीमारियाँ भी कम हुई हैं.
कुशल प्रणाली, सतत और लाभकारी अर्थव्यवस्था
इस योजना की एक बड़ी विशेषता यह है कि सभी जल कनेक्शन मीटरयुक्त और बिल-आधारित हैं.
प्रत्येक परिवार 220 रुपए प्रति माह में 20 हज़ार लीटर तक पानी उपयोग कर सकता है, जबकि अतिरिक्त खपत पर प्रति 1,000 लीटर पर 15 रुपए का शुल्क लगता है. परिवारों का औसत मासिक जल बिल, लगभग 350 रुपए आता है.
विश्व बैंक के विशेषज्ञ मैथ्यूज मुलक्कल बताते हैं, "लोग अब भुगतान करने को तैयार हैं, क्योंकि उन्हें इसकी सीधी सुविधा और बचत दिखाई दे रही है. एक वर्ष में ही भुगतान दर 30–40% से बढ़कर 70–90% तक पहुँच गया है."
अब परिवारों को न तो महंगे पम्प चलाने पड़ते हैं, न ही RO फ़िल्टर और बोरवेल पर धन ख़र्च करना पड़ता है.
ज़िम्मेदारी की भावना
जल प्रयोग पर बिल व्यवस्था लागू होने के बाद, पानी का प्रयोग अधिक सावधानी से होने लगा है. हरिद्वार के भावदेश कुमार राजपूत कहते हैं, "पहले लोग कार धोने में बहुत पानी बहाते थे. अब एक बाल्टी में ही काम चल जाता है."
इसके अलावा, ग्राहक सेवा में काफ़ी सुधार हुआ है. 97% शिकायतें 48 घंटों के भीतर सुलझाई जाती हैं.
इस बदलाव से एजेंसियों को भी लाभ हुआ है. 22 में से 20 क्षेत्रों में जल एजेंसियों ने संचालन और प्रशासनिक लागत की भरपाई शुरू कर दी है, जिससे ये व्यवस्था आर्थिक रूप से आत्मनिर्भर बन गई है.
यह बदलाव दरअसल किसी ढाँचे से कहीं अधिक लोगों की सोच में बदलाव से सम्भव हुआ.
विश्व बैंक के विशेषज्ञ मैथ्यूज मुल्लाकल बताते हैं, "जब जल एजेंसियों ने केवल निर्माण पर नहीं, बल्कि सेवा की गुणवत्ता, स्थायित्व और दक्षता पर ध्यान देना शुरू किया - वहीं से असली परिवर्तन शुरू हुआ."
इस लेख का विस्तृत संस्करण यहाँ प्रकाशित हुआ था.