ग़ाज़ा: भूख तोड़ रही है लोगों की रीढ़, दिन में एक बार भी मुश्किल से भोजन मयस्सर
संयुक्त राष्ट्र के "विश्व खाद्य कार्यक्रम" (WFP) और उसके साझीदारों ने कहा है कि इसराइल द्वारा ग़ाज़ा पट्टी में जारी बमबारी के कारण, वहाँ अधिकांश परिवार केवल एक समय का खाना खाकर जीवित हैं. जबकि एक-तिहाई परिवार ऐसे हैं, जो पूरे दिन कोई भी भोजन खाए बिना, ख़ाली पेट रहने के लिए मजबूर हैं.
ग़ाज़ा में लोगों को अगर थोड़ी बहुत भोजन सामग्री मिल भी रही है तो नो पोषण की दृष्टि से बहुत कम है.
ग़ाज़ा के लोगों को भोजन के नाम पर पतली दालें, दाल या चावल, रोटी का एक टुकड़ा या कभी-कभी जड़ी-बूटियों और ज़ैतून के तेल का मिश्रण - 'दुक्का' मिल पा रहा है.
हालात इतने दयनीय हैं कि व्यस्क लोग जानबूझकर अपनी भोजन ख़ुराक छोड़ देते हैं ताकि बच्चों, बुज़ुर्गों और बीमारों के लिए का पेट पहले भरे जा सकें.
फिर भी, जनवरी (2025) से अब तक औसतन रोज़ाना 112 बच्चों को गम्भीर कुपोषण के कारण अस्पताल में भर्ती कराया गया है.
एक माता-पिता ने कहा, "जब मेरे बच्चे रात को भूख से जागते हैं, तो मैं उनसे कहती हूँ: ‘पानी पी लो और आँखें बन्द कर लो.’ ये बात मुझे तोड़ देती है. मैं भी वही करती हूँ. पानी पीती हूँ और सुबह होने की दुआ करती हूँ."
भोजन के लिए जान का जोखिम
ग़ाज़ा में लोग इन गम्भीर खाद्य संकटों के कारण, हर दिन थोड़ा बहुत भोजन हासिल करने के लिए अपनी जान जोखिम में डालने को मजबूर हैं.
ग़ाज़ा के स्वास्थ्य मंत्रालय (MoH) के अनुसार, 27 मई से अब तक भोजन सहायता हासिल करने की कोशिश करते हुए, 549 फ़लस्तीनी लोगों की मौत हुई और 4 हज़ार 66 लोग घायल हुए हैं.
इसराइल द्वारा क़ाबिज़ फ़लस्तीनी क्षेत्रों में काम करने वाले संयुक्त राष्ट्र के मानवीय मामलों के कार्यालय (OCHA) के प्रमुख जोनाथन व्हिटॉल ने कहा है कि, "ज़्यादातर हताहत वे लोग हुए हैं जिन्हें सैन्य क्षेत्र में बनाए गए अमेरिकी-इसराइली वितरण केन्द्रों तक पहुँचने की कोशिश करते हुए, जानबूझकर गोली मारी गई या उन पर अन्धाधुन्ध गोलेबारी की गई."
ग़ाज़ा में मई के अन्त से, अमेरिकी-इसराइली समर्थित ग़ाज़ा मानवतावादी संस्थान (GHF) सहायता वितरित कर रहा है, जो संयुक्त राष्ट्र और स्थापित गै़र-सरकारी संगठनों को दरकिनार करता है.
संयुक्त राष्ट्र ने कहा है कि GHF से मदद लेने वाले फ़लस्तीनी लोगों को गोलियों, गोलेबारी और भगदड़ के ख़तरों का सामना करना पड़ता है.
एक फ़लस्तीनी व्यक्ति ने WFP को बताया, "हम वहाँ जाना नहीं चाहते. लेकिन हमारे पास क्या विकल्प है? हमारे बच्चे खाना माँगते हैं. हम रात में सोते नहीं. हम भोजन लेने के लिए जाते हैं, इन्तजार करते हैं और उम्मीद करते हैं कि हम वापस लौटेंगे."
पतन के कगार पर बुनियादी व्यवस्था
ग़ाज़ा की लगभग सभी सेवा प्रणालियों को लम्बे समय से चल रहे युद्ध और बमबारी ने पतन के कगार पर पहुँचा दिया है.
ईंधन की कमी के कारण पीने के पानी की, केवल 40 प्रतिशत सुविधाएँ काम कर रही हैं, और 93 प्रतिशत घरों को जल सुरक्षा के संकट सामना करना पड़ रहा है.
ईंधन की कमी चिकित्सा सेवाओं को भी बुरी तरह से प्रभावित कर रही है क्योंकि चिकित्सा उपकरण और दवाओं का भंडारण बिजली पर निर्भर है.
विस्थापन का कुचक्र
42 दिन के युद्धविराम के बाद, 18 मार्च को ग़ाज़ा में इसराइली बमबारी फिर शुरू होने के बाद से 6 लाख 84 हज़ार से अधिक फ़लस्तीनी लोग विस्थापित हो चुके हैं. इनमें से लगभग सभी के लिए यह विस्थापन पहली बार नहीं है.
ग़ाज़ा का 82 प्रतिशत से अधिक क्षेत्र या तो इसराइली सैन्य क्षेत्र घोषित है या विस्थापन आदेश के अधीन है, इसलिए नए विस्थापितों के लिए सुरक्षित स्थान बहुत कम हैं, या लगभग नहीं के बराबर है.
वे भीड़भाड़ वाले विस्थापन शिविरों, अस्थाई आश्रयों, क्षतिग्रस्त इमारतों और कभी-कभी खुले स्थानों में रास्तों पर रहने को मजबूर हैं. स्कूल अब सीखने की जगह नहीं, बल्कि आश्रय स्थल बन गए हैं.
नुसीरात में फ़लस्तीनी शरणार्थियों के लिए संयुक्त राष्ट्र राहत और कार्य एजेंसी (UNRWA) की शिक्षिका कमला का कहना है, "स्कूल ख़ाली आश्रय स्थल बन गए हैं, जहाँ सुरक्षित शिक्षा का कोई वातावरण नहीं बचा है."
संयुक्त राष्ट्र के महासचिव के प्रवक्ता स्तेफ़ान दुजैरिक के अनुसार, इन सभी आश्रयों की स्थिति तेज़ी से बिगड़ रही है क्योंकि वहाँ पर्याप्त आश्रय सामग्री उपलब्ध नहीं है.
उन्होंने 19 जून को एक वक्तव्य में कहा, “1 मार्च के बाद से ग़ाज़ा में कोई भी आश्रय सामग्री नहीं पहुँची है, जब से इसराइली अधिकारियों ने लगभग 80 दिनों तक सहायता और अन्य सभी आपूर्ति पर पूर्ण प्रतिबन्ध लगा दिया था.”
उन्होंने कहा कि, “हालांकि कुछ वस्तुओं को बाद में सीमित मात्रा में आने की अनुमति दी गई है, लेकिन तम्बू, लकड़ी, तिरपाल और अन्य किसी भी आश्रय सामग्री पर अब भी प्रतिबन्ध जारी है.”