ईरान परमाणु समझौते पर कूटनीति का आग्रह, युद्धविराम पर सहमति 'महत्वपूर्ण उपलब्धि'
संयुक्त राज्य अमेरिका की मध्यस्थता से इसराइल और ईरान के बीच लागू हुआ युद्धविराम एक महत्वपूर्ण उपलब्धि है, जिससे एक भयावह टकराव से बचने का अवसर मिला है. शान्तिनिर्माण एंव राजनैतिक मामलों के लिए यूएन अवर महासचिव रोज़मैरी डीकार्लो ने ईरान के परमाणु कार्यक्रम समझौते पर. मंगलवार को सुरक्षा परिषद में हुई चर्चा को सम्बोधित करते हुए यह बात कही है. उन्होंने ध्यान दिलाया कि इस समझौते के समर्थन में पारित हुए प्रस्ताव की शर्तों को पूरा नहीं किया गया है और इस मुद्दे के कूटनैतिक समाधान की तलाश की जानी होगी.
ईरान को परमाणु हथियार हासिल करने से रोकने के इरादे से 2015 में एक समझौते पर सहमति हुई थी, जिसे संयुक्त व्यापक कार्रवाई योजना (JCPOA) के नाम से जाना जाता है, और इसकी अवधि इस वर्ष अक्टूबर महीने में समाप्त हो रही है.
इस बीच, संयुक्त राज्य अमेरिका की मध्यस्थता के बाद नाज़ुक परिस्थितियों में दोनों देशों में समझौता हुआ है, जिससे पिछले 12 दिनों से इसराइल और ईरान द्वारा एक दूसरे पर किए जा रहे हवाई और मिसाइल हमलों पर फ़िलहाल विराम लग गया है. इन हमलों में बड़े पैमाने पर जान-माल की हानि हुई है.
अवर महासचिव डीकार्लो ने सदस्य देशों को बताया कि “पिछले 12 दिनों से जारी घातक झड़पों के बाद, युद्धविराम समझौता एक भयावह टकराव को टालने और ईरान परमाणु मुद्दे को शान्तिपूर्ण ढंग से निपटाने के लिए एक अवसर है.”
उन्होंने कहा कि ईरान के परमाणु कार्यक्रम को पूर्ण रूप से शान्तिपूर्ण बनाए रखने के लिए सर्वोत्तम विकल्प कूटनीति, सम्वाद, और सत्यापन प्रक्रिया है, ताकि ईरान की जनता तक ठोस आर्थिक लाभ पहुँचाए जा सके. मगर, उनके अनुसार, फ़िलहाल इस समझौते के मुख्य उद्देश्यों को पूरा नहीं किया जा सका है.
उन्होंने कहा कि मध्य पूर्व क्षेत्र में शान्ति, सम्वाद व स्थिरता को आगे बढ़ाने के लिए संयुक्त राष्ट्र सभी प्रयासों को समर्थन देने के लिए तैयार है. साथ ही, यूएन सचिवालय प्रस्ताव 2231 (2015) को लागू करने की प्रक्रिया को समर्थन प्रदान करता रहेगा, जिसकी अवधि 18 अक्टूबर को समाप्त हो रही है.
धीमे हुए कूटनैतिक प्रयास
अवर महासचिव ने बताया कि हाल के दिनों में भड़के हिंसक टकराव की वजह से कूटनैतिक प्रयासों को धक्का पहुँचा है.
“13 जून के बाद से इसराइल और ईरान के बीच सैन्य टकराव और 21 जून को ईरान के परमाणु प्रतिष्ठानों पर अमेरिकी हवाई हमलों से प्रस्ताव 2231 को पूर्ण रूप से लागू किए जाने की सम्भावनाएँ जटिल हो गई हैं.”
“ईरान द्वारा कल क़तर में एक सैन्य ठिकाने पर किए गए हमले से पहले से ही तनाव से घिरे एक क्षेत्र में असुरक्षा और गहरी हुई है.”
पिछले कुछ महीनों में ओमान के सहयोग से ईरान और संयुक्त राज्य अमेरिका के बीच पाँच दौर की द्विपक्षीय वार्ता के बावजूद, परमाणु समझौते को पूरी तरह लागू करने की दिशा में कोई रास्ता नज़र नहीं आया है.
हिंसक टकराव की वजह से इस वार्ता के छठे दौर को स्थगित कर दिया गया था. ईरान के अनुसार, इसराइली हमलों में कम से कम 606 लोगों की जान गई है और 5,300 घायल हुए हैं. वहीं, इसराइल में मृतकों का आँकड़ा 28 है और डेढ़ हज़ार घायल हैं.
अवर महासचिव डीकार्लो ने कहा कि मतभेदों के बावजूद, चीन, फ़्राँस, जर्मनी, ईरान, रूस, ब्रिटेन ने एक कूटनैतिक समाधान की दिशा में अपने संकल्प को दोहराया है और कूटनीति ही इसके लिए सर्वश्रेष्ठ उपाय है.
ईरान परमाणु समझौता (JCPOA)
सुरक्षा परिषद के पाँच स्थाई सदस्यों – अमेरिका, ब्रिटेन, चीन, फ़्राँस, रूस -- और जर्मनी के साथ ईरान की इस समझौते पर सहमति बनी थी, जिसे प्रस्ताव 2231 के ज़रिए समर्थन दिया गया.
ईरान के परमाणु कार्यक्रम पर कई वर्षों तक जारी रहे तनाव के बाद हुए इस समझौते का उद्देश्य यह सुनिश्चित करना था कि इस कार्यक्रम को शान्तिपूर्ण बनाए रखा जा सके.
ईरान ने अपने पर थोपे गए आर्थिक प्रतिबन्धों को हटाने के बदले, सम्वेदनशील परमाणु गतिविधियों को सीमित करने, यूरेनियम संवर्धन, भंडारण और सेंट्रीफ़्यूज पर सख़्त शर्तें मानने, और अन्तरराष्ट्रीय निरीक्षकों को जाँच की अनुमति देने पर सहमति जताई थी.
संयुक्त राष्ट्र के फ़्रेमवर्क के तहत, अन्तरराष्ट्रीय परमाणु ऊर्जा एजेंसी (IAEA) का दायित्व इस समझौते के अनुपालन का सत्यापन करना और सुरक्षा परिषद को इस प्रक्रिया से अवगत कराना है.
2018 में अमेरिका द्वारा इस समझौते से पीछे हटने के बाद, ईरान ने JCPOA में तयशुदा यूरेनियम संवर्धन की सीमा से आगे बढ़ना शुरू कर दिया था.
यह समझौता अब अटका हुआ है और इसके लिए सहयोग घट रहा है, जिसके मद्देनज़र, संयुक्त राष्ट्र ने कूटनीति को नए सिरे से शुरू किए जाने का आग्रह किया है.