इसराइल-ईरान टकराव से, अफ़गानिस्तान में संकट गहराया
अफ़ग़ानिस्तान पहले से ही भारी मानवीय और आर्थिक चुनौतियों से जूझ रहा है, जबकि ईरान पर इसराइल और संयुक्त राज्य अमेरिका द्वारा किए गए हवाई हमलों के बाद बढ़ती अस्थिरता, अफ़ग़ान संकट को और अधिक जटिल बना रही है.
यूएन महासचिव की विशेष प्रतिनिधि और अफ़ग़ानिस्तान में संयुक्त राष्ट्र सहायता मिशन (UNAMA) की प्रमुख रोज़ा ओटुनबायेवा ने सोमवार को सुरक्षा परिषद में कहा कि इसराइल और ईरान के बीच चल रहे मिसाइल हमलों का पहले से ही गम्भीर प्रभाव पड़ रहा है.
उन्होंने मध्य पूर्व क्षेत्र में तनाव कम करने के, यूएन महासचिव के तत्काल आहवान को दोहराते हुए कहा, "यह टकराव पहले से ही अफ़ग़ानिस्तान में प्रभाव डाल रहा है, व्यापार को बाधित कर रहा है और बुनियादी वस्तुओं व ईंधन की क़ीमतों को बढ़ा रहा है, और ईरान में रह रहे दीगर अफ़ग़ान लोगों को वापिस लौटने के लिए प्रेरित कर रहा है."
अधिक लोगों की वापसी की आशंका
रोज़ा ओटुनबायेवा ने बताया कि इस वर्ष पड़ोसी देशों पाकिस्तान और ईरान से, लगभग 6 लाख अफ़ग़ान लोग, स्वदेश वापिस लौटे हैं, और संयुक्त राष्ट्र की एजेंसियां क्षेत्र में "चिन्ताजनक घटनाक्रम" को देखते हुए, ईरान से सम्भावित सीमा-पार आवागमन को संभालने की तैयारी कर रही हैं.
उन्होंने कहा, "पिछले कुछ दिनों में केवल ईरान से औसतन प्रतिदिन 10 हज़ार से अधिक लोग, अफ़ग़ानिस्तान को वापिस लौटे हैं."
स्थानीय समुदायों और देश के वास्तविक शासक - तालिबान अधिकारियों ने "वापस लौटने वाले लोगों को समायोजित करने के लिए बहुत प्रयास किए हैं, मगर अन्तरराष्ट्रीय सहायता के बिना, ऐसे लोगों की सुरक्षित, व्यवस्थित और शान्तिपूर्ण वापसी सुनिश्चित करने में अनेक बाधाएँ हैं."
तालेबान के साथ सम्पर्क पर चिन्ताएँ
रोज़ा ओटुनबायेवा ने सुरक्षा परिषद को, तालिबान नेताओं के साथ संयुक्त राष्ट्र के सम्पर्क के बारे में जानकारी दी. ग़ौरतलब है कि तालेबान ने, लगभग चार साल पहले सत्ता में वापसी की थी.
इस "व्यापक दृष्टिकोण" का उद्देश्य एक ऐसा अफ़ग़ानिस्तान बनाना है जो अपने साथ और अपने पड़ोसियों के साथ शान्तिपूर्ण हो, अन्तरराष्ट्रीय समुदाय में पूरी तरह से एकीकृत हो, अपने अन्तरराष्ट्रीय दायित्वों को पूरा करे, और हिंसा के किसी अन्य चक्र से नहीं गुज़रे.
उन्होंने ज़ोर देकर कहा कि संयुक्त राष्ट्र का यह कोशिश, "यथास्थिति को सामान्य बनाने का प्रयास नहीं है, बल्कि यह सुनिश्चित करती है कि चिन्ता के कई प्रमुख मुद्दे, सम्पर्क प्रयासों के मूल में बने रहें, जिनमें विशेष रूप से देश के अन्तरराष्ट्रीय दायित्वों को क़ायम रखना भी शामिल है."
महिलाओं और लड़कियों के अधिकारों का हनन जारी
उन्होंने कहा कि अन्तरराष्ट्रीय समुदाय "इस बात से बेहद चिन्तित है कि संयुक्त राष्ट्र के सम्पर्क ने अफ़ग़ान महिलाओं और लड़कियों की ऐसी स्थिति में सुधार नहीं किया है जो अस्वीकार्य है और ना ही समावेशी शासन को बढ़ावा दिया है. साथ ही, मानवाधिकारों में व्यापक गिरावट को भी नहीं रोका है."
इस बीच, तालेबान अधिकारियों ने देश की ज़ब्त सम्पत्तियों, देश पर लगे प्रतिबन्धों, उनके शासन को मान्यता नहीं मिलने, अधिक विकास सहायता की आवश्यकता और सहायता निर्भरता को समाप्त करने के बारे में शिकायतें व्यक्त की हैं.
कुछ स्थिरता मगर प्रतिबन्धात्मक नीतियाँ भी
रोज़ा ओटुनबायेवा ने कहा कि तालिबान शासन ने, अफ़गानिस्तान में कुछ हद तक स्थिरता और सुरक्षा प्रदान की है, मामूली आर्थिक विकास और विदेशी निवेश को बढ़ावा दिया है, निष्क्रिय बुनियादी ढाँचा परियोजनाओं को शुरू किया है, और विदेशों में, विशेष रूप से इस क्षेत्र में राजनयिक सम्बंधों को सघन बनाया है.
हालाँकि, तालेबान अधिकारी "अफ़ग़ान लोगों पर अत्यधिक प्रतिबन्धात्मक और भेदभावपूर्ण नीतियों को लागू करना जारी रखे हुए हैं", जैसा कि "पुण्य के प्रचार और बुराई की रोकथाम पर क़ानून" में प्रावधान शामिल हैं. यह क़ानून अगस्त 2024 में प्रभावी हुआ था.
इस क़ानून ने तालेबान की व्यवस्थित, सरकार - प्रायोजित नीतियों को "मज़बूत" किया, जो महिलाओं और लड़कियों को, शिक्षा, रोज़गार, आवागमन की स्वतंत्रता और अभिव्यक्ति की स्वतंत्रता सहित सार्वजनिक जीवन में हिस्सा लेने से वंचित करती हैं.
उन्होंने कहा, "इस क़ानून के माध्यम से, तालेबान अधिकारी एक ऐसे रास्ते पर चलना जारी रखे हुए हैं जो अफ़ग़ानिस्तान को उसके अन्तरराष्ट्रीय दायित्वों से दूर करता है और अन्तरराष्ट्रीय प्रणाली में अन्ततः देश के पुनः एकीकरण को बाधित करता है."
"हम अफ़ग़ान महिलाओं और लड़कियों की अस्वीकार्य स्थिति को नहीं भूल सकते, भले ही अधिक आदेश लागू किए जाने के कारण महिलाओं व लड़कियों का निरन्तर हाशिए पर रहना, अब ख़बरों की सुर्ख़ियाँ नहीं बनता है."
उन्होंने महिलाओं व लडकियों पर लगे प्रतिबन्ध हटाने और उन्हें शिक्षा का अधिकार फिर से देने का आहवान भी किया.
पाँच में से एक व्यक्ति भूखा
मानवीय मामलों के लिए संयुक्त राष्ट्र की सहायक महासचिव जॉयस मसूया ने सुरक्षा परिषद की इस बैठक में ध्यान आकर्षित किया कि धन सहायता में कटौती, अफ़ग़ानिस्तान को किस तरह से प्रभावित कर रही है, जहाँ आधी आबादी को जीवित रहने के लिए सहायता की आवश्यकता है.
उन्होंने कहा कि अफ़ग़ानिस्तान की आबादी "दशकों के संघर्ष व टकराव, गहरी ग़रीबी, लगातार कठोर जलवायु, महिलाओं और लड़कियों के अधिकारों पर गम्भीर प्रतिबन्ध और अत्यधिक सीमित धन उपलब्धता के वातावरण के कारण, लगातार और तीव्र मानवीय ज़रूरतों का सामना कर रही है."