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विश्व शरणार्थी दिवस: संघर्ष से नेतृत्व तक के सफ़र के लिए एकजुटता का आहवान

क्यांगवाली, होइमा में एक उत्सव में युगांडा की महिलाओं का एक समूह ड्रम बजा रहा है।
UN/John Kibego विश्व शरणार्थी दिवस के अवसर पर युगांडा के होइमा में लोकतांत्रिक गणराज्य काँगो से आए शरणार्थियों ने भाग लिया.

विश्व शरणार्थी दिवस: संघर्ष से नेतृत्व तक के सफ़र के लिए एकजुटता का आहवान

प्रवासी और शरणार्थी

विश्व भर में 12.2 करोड़ लोग उत्पीड़न, हिंसा या मानवाधिकार उल्लंघन मामलों के कारण अपने घर छोड़ने पर मजबूर हुए हैं, जिनमें से 4.27 करोड़ लोगों ने अन्तरराष्ट्रीय सीमाएँ पार करके अन्य देशों में शरणार्थी के तौर पर आश्रय लिया है. संयुक्त राष्ट्र महासचिव एंतोनियो गुटेरेश ने ध्यान दिलाया है कि हर एक शरणार्थी अपने साथ एक उजड़े हुए परिवार और गहरी क्षति की व्यथा को लेकर चलता है, और इसलिए यह ज़रूरी है कि उनकी बात को सुना जाए, और अपने भविष्य को आकार देने में उनकी भी भागेदारी हो.

संयुक्त राष्ट्र महासचिव एंतोनियो गुटेरेश ने शुक्रवार, 20 जून, को 'विश्व शरणार्थी दिवस' के अवसर पर जारी अपने सन्देश में आगाह किया कि सूडान से यूक्रेन तक, हेती से म्याँमार तक, रिकॉर्ड संख्या में लोग अपनी जान बचाने के लिए भाग रहे हैं जबकि मानवीय सहायता के लिए समर्थन घटता जा रहा है.

उन्होंने कहा कि शरण देने वाले देशों में मेज़बान समुदाय इस बोझ का सबसे ज़्यादा भार उठा रहे हैं, जबकि अक्सर वे विकासशील देशों में हैं. यह स्थिति अनुचित है और लम्बे समय तक जारी नहीं रह सकती है.

यूएन प्रमुख के अनुसार, ऐसे समय जब दुनिया से पर्याप्त समर्थन न मिल रहा हो, तब भी शरणार्थी असाधारण साहस, सहनसक्षमता और संकल्प का परिचय दे रहे हैं. 

"जब उन्हें अवसर मिलता है, वे सार्थक योगदान देते हैं — अर्थव्यवस्थाओं को मज़बूत करते हैं, संस्कृतियों को समृद्ध बनाते हैं, और सामाजिक सम्बन्धों को गहरा करते हैं."

महासचिव ने ज़ो देकर कहा कि शरणार्थी बनने का विकल्प कभी नहीं चुना जाता है. लेकिन हम किस तरह से प्रतिक्रिया देंगे, ये हम चुन सकते हैं.

इसके मद्देनज़र, उन्होंने एकजुटता को केवल शब्दों तक सीमित न रखने पर बल देते हुए कहा है कि शरणार्थियों के लिए मानवीय व विकास सहायता को मज़बूती देनी होगी, संरक्षण व पुनर्वास जैसे टिकाऊ समाधानों का विस्तार करना होगा, और शरण माँगने के अधिकार की रक्षा करनी होगी, जोकि अन्तरराष्ट्रीय क़ानून की एक आधारशिला है.

संयुक्त राष्ट्र इस विश्व दिवस के अवसर पर, शरणार्थियों के प्रति एकजुटता की भावना को प्रोत्साहित करने पर ज़ोर दे रहा है, जिसमें सहयोग, समाधान और अपनी व्यथा व आशाओं को बयाँ करने की शक्ति को अहम साधन बताया गया है.

ज़हरा नादर: महिला अधिकार कार्यकर्ता

इसी सिलसिले में, यूएन न्यूज़ ने अफ़ग़ानिस्तान से शरणार्थी, पत्रकार और महिला अधिकार कार्यकर्ता ज़हरा नादर से बातचीत की.

जब तालेबान ने अफ़ग़ानिस्तान में पहली बार सत्ता हासिल की तो ज़हरा की आयु छह साल थी. उनके परिवार ने अफ़ग़ानिस्तान से भागकर ईरान में शरण ली थी. वहाँ उन्हें न केवल शिक्षा से वंचित किया गया, बल्कि नस्लभेद का भी सामना करना पड़ा.

कई वर्षों बाद अफ़ग़ानिस्तान लौटने पर निर्वासन में बिताए जीवन के अन्तर और स्कूल जाने के अवसर ने ज़हरा नादर में पत्रकारिता और वकालत का जुनून जगाया. वहाँ उन्हें न केवल शिक्षा से वंचित किया गया, बल्कि नस्लभेद का भी सामना करना पड़ा.

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कई वर्षों बाद अफ़ग़ानिस्तान लौटने पर निर्वासन में बिताए जीवन और स्कूल जाने के अवसर के बीच भारी अन्तर ने ज़हरा नादर में पत्रकारिता और वकालत का जुनून जगाया.

अगस्त 2021 में, जब वह कैनेडा में पीएचडी कर रही थीं, तभी तालेबान ने फिर से सत्ता पर नियंत्रण कर लिया, जिससे उनका घर लौटकर पढ़ाने और ज़मीन पर रहकर काम करने का सपना टूट गया.

उन्होंने कहा, “मैंने महसूस किया कि काबुल में पली-बढ़ी और वहीं पत्रकार बनी एक पत्रकार के तौर पर मेरी ज़िम्मेदारी है कि मैं अफ़ग़ानिस्तान की महिलाओं की व्यथा दुनिया तक पहुँचाऊ.” 

“यह सचमुच अमानवीय है कि किसी देश की आधी आबादी को सिर्फ़ इसलिए उनके बुनियादी मानव अधिकारों से वंचित कर दिया जाए, क्योंकि वे महिला के रूप में जन्मी हैं.”

इस तस्वीर को बदलने की दिशा में, उन्होंने ज़ान टाइम्स की स्थापना की. यह एक अफ़ग़ान महिला के नेतृत्व वाली समाचार संस्था है जो निर्वासन में अफ़ग़ानिस्तान में मानवाधिकारों के उल्लंघन, विशेष रूप से महिलाओं से जुड़ी घटनाओं पर जानकारी जुटाती है.

सीमित वित्तीय संसाधनों और अपनी रिपोर्टर पर बढ़ते ख़तरों के बावजूद, नादर ने अपने काम को जारी रखा है ताकि अफ़ग़ान महिलाओं की आवाज़ और मौजूदगी विश्व भर में बनी रहे.

उन्होंने अफ़ग़ानिस्तान की स्थिति को मौजूदा दौर में महिला अधिकारों के लिए सबसे गम्भीर संकट बताया. उन्होंने अन्तरराष्ट्रीय प्रयासों को अपर्याप्त क़रार देते हुए चेतावनी दी कि निष्क्रियता बरतने से तालेबान और उसकी स्त्री-विरोधी विचारधाराओं को और बल मिलेगा.

अपने सदमे और फ़िलहाल स्वदेश लौट पाने में असमर्थता के बावजूद, ज़हरा नादर ने उम्मीद नहीं छोड़ी हैं. उन्होंने युवा अफ़ग़ान महिलाओं से सीखने और एक बेहतर भविष्य के लिए तैयारी के माध्यम से प्रतिरोध की अपील की है.

बार्थेलेमी म्वांज़ा: संघर्ष से नेतृत्व तक का सफ़र

काँगो लोकतांत्रिक गणराज्य (DRC) से आए शरणार्थी बार्थेलेमी म्वांज़ा अब एक युवा नेता और अधिकारों के पैरोकार हैं.

जब म्वांज़ा 18 वर्ष के थे, तब उन पर एक सशस्त्र गुट में शामिल होने का दबाव था, जो देशव्यापी युद्ध में शामिल था. वहीं उनके पिता ने उनसे लड़ाई से दूर रहने की गुहार लगाई. यह एक ऐसा निर्णय था जो उनकी जान भी ले सकता था.

जान बचाने के लिए म्वांज़ा को ज़िम्बाब्वे के टोंगोगारा शरणार्थी शिविर में शरण लेनी पड़ी. अपने देश से विस्थापित होने का भावनात्मक बोझ उठाते हुए उन्होंने कहा, “वाक़ई मुझे रोना आ गया कि मैं कहाँ हूँ?” 

फिर उन्होंने स्वयं से सवाल किया, “मैं कब तक यूँ ही रोता रहूँगा? क्या मुझे अब भविष्य की ओर नहीं देखना चाहिए?”

इसके बाद, म्वांज़ा ने UNHCR के साथ एक स्वयंसेवक के रूप में काम शुरू किया, जहाँ उन्होंने 5 हज़ार से अधिक युवा शरणार्थियों का नेतृत्व किया. यह समूह लैंगिक हिंसा के विरुद्ध जागरूकता, युवाओं की सुरक्षा और जलवायु कार्रवाई जैसे मुद्दों पर सक्रिय था.

अब अमेरिका के ओहायो राज्य में पुनर्वासित हो चुके म्वांज़ा, UNHCR के साथ मिलकर शरणार्थियों की आवाज़ बुलन्द करने, जलवायु बदलाव पर कार्रवाई को प्रेरित करने और अपनी कहानी साझा करने का सिलसिला जारी रखे हुए हैं.

म्वांज़ा ने कहा, शरणार्थियों को वैश्विक मंच पर सशक्त बनाना और उनके हक़ में आवाज़ उठाना मेरा एक सपना था, और अब मैं देख सकता हूँ कि वह सपना साकार हो रहा है.”