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बन्दूकों के शान्त हो जाने पर भी, लम्बे समय के लिए रह जाते हैं यौन हिंसा के निशान

सूडान में परस्पर विरोधी सैन्य बलों के बीच हिंसक टकराव के दौरान, बड़े पैमाने पर यौन हिंसा को अंजाम दिए जाने के आरोप सामने आए हैं.
© UNICEF/Adriana Zehbrauskas
सूडान में परस्पर विरोधी सैन्य बलों के बीच हिंसक टकराव के दौरान, बड़े पैमाने पर यौन हिंसा को अंजाम दिए जाने के आरोप सामने आए हैं.

बन्दूकों के शान्त हो जाने पर भी, लम्बे समय के लिए रह जाते हैं यौन हिंसा के निशान

मानवाधिकार

युद्धभूमि पर गोलाबारी बन्द हो जाने के लम्बे समय बाद तक भी हिंसक टकराव के दौरान यौन हिंसा अपराधों का ज़हर पीड़ितों और समुदायों को प्रभावित करता है. यौन हिंसा के पीड़ितों को कई पीढ़ियों तक इसके सदमे, कथित शर्मिंदगी व कलंक से जूझना पड़ता है. संयुक्त राष्ट्र ने 19 जून, गुरूवार को 'हिंसक टकराव में यौन हिंसा के उन्मूलन के लिए अन्तरराष्ट्रीय दिवस' के अवसर पर इन बर्बर कृत्यों के अन्तर-पीढ़िगत प्रभावों, उनकी पीड़ा को उजागर किया गया है.

हिंसक टकराव के दौरान यौन हिंसा, युद्ध, यातना व आतंक का एक औज़ार है, जिसके ज़रिए पीड़ितों को न केवल तबाह कर दिया जाता है बल्कि उनके परिवार और समुदाय भी तहस-नहस हो जाते हैं.

अन्तरराष्ट्रीय क़ानून में इसे युद्ध अपराध, मानवता के विरुद्ध अपराध और एक ऐसा कृत्य माना गया है, जिसे जनसंहार की श्रेणी में रखा जा सकता है. 

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लम्बे समय तक जारी रहने वाले इसके प्रभावों से स्थाई शान्ति स्थापित करने के प्रयास भी प्रभावित होते हैं.

हिंसक टकराव में यौन हिंसा के मुद्दे पर संयुक्त राष्ट्र महासचिव की विशेष प्रतिनिधि प्रमिला पैटन ने कहा कि बलात्कार, युद्ध के दौरान सबसे लम्बे समय तक इस्तेमाल में लाई जाने वाली रणनीति है. 

उन्होंने कहा कि युद्ध की समाप्ति के बाद भी कई महिलाओं और बच्चों के लिए युद्ध कभी ख़त्म नहीं होता, अक्सर उनका संघर्ष सालों, बल्कि कई पीढ़ियों तक जारी रहता है.

विशेष प्रतिनिधि पैटन ने कहा कि यह दिन सिर्फ़ पीड़ितों को याद करने का नहीं, बल्कि दुनिया को जगाने का अवसर है, ख़ासकर तब, जब हिंसक टकरावों में फँसे लोगों तक मानवीय सहायता पहुँचाने के संसाधन घटते जा रहे हैं.

घाव सिर्फ़ शरीर पर नहीं...

प्रमिला पैटन ने कहा कि युद्ध के दौरान अंजाम दी गई यौन हिंसा केवल शरीर पर नहीं, बल्कि मानसिक, सामाजिक और आर्थिक रूप से भी गहरे घाव छोड़ती है. 

उन्होंने बोस्निया और रवांडा के युद्ध पीड़ितों के अनुभव साझा किए. उन्हें एक महिला ने अपने साथ हुई घटना को याद करते हुए बताया कि "उस रात सिर्फ़ मेरा शरीर नहीं छीना, बल्कि मेरा परिवार, मेरा भविष्य और मेरी शान्ति भी छीन ली."

विशेष प्रतिनिधि ने 2024 की एक रिपोर्ट का हवाला देते हुए बताया कि कोसोवो में युद्ध समाप्त हुए 25 वर्ष हो चुके हैं, लेकिन आज भी 86 प्रतिशत पीड़ित महिलाएँ अब भी सदमे, मानसिक तनाव सम्बन्धी समस्याओं से जूझ रही हैं. 

यौन हिंसा का शिकार महिलाओं को एचआईवी और अन्य यौन संचारित रोग का संक्रमण, अनचाहा और असुरक्षित गर्भधारण, गम्भीर मानसिक आघात, सामाजिक बहिष्कार, और सम्मान व शर्म से जुड़ी हिंसा का सामना करना पड़ता है. 

उन्होंने कहा कि यदि यह घाव समय पर न भरे जाएँ, तो ये दर्द और ज़्यादा गहरे और पीढ़ीगत बन जाते हैं.

3 से 75 वर्ष आयु के पीड़ित

हिंसक टकरावों के दौरान हुई यौन हिंसा पर संयुक्त राष्ट्र की रिपोर्ट में 21 देशों व क्षेत्रों में 4,500 से अधिक मामलों को अंजाम दिए जाने की पुष्टि की गई है. ये संख्या 2023 से 20 प्रतिशत और 2022 से 50 प्रतिशत अधिक हैं.

93 प्रतिशत मामलों में जीवित बचे पीड़ित महिलाएँ व लड़कियाँ हैं, जिनकी उम्र 3 से लेकर 75 वर्ष तक है. 

प्रमिला पैटन ने स्पष्ट किया कि वास्तविक आँकड़ा इससे कहीं अधिक होने की आशंका है क्योंकि अधिकाँश मामलों में जानकारी सामने नहीं आ पाती है.

दक्षिण सूडान में संघर्ष सम्बन्धी यौन हिंसा के दर्ज मामलों में से लगभग एक चौथाई मामले, बच्चों के ख़िलाफ़ हिंसा के होते हैं.
© UNICEF/Mackenzie Knowles-Coursin
दक्षिण सूडान में संघर्ष सम्बन्धी यौन हिंसा के दर्ज मामलों में से लगभग एक चौथाई मामले, बच्चों के ख़िलाफ़ हिंसा के होते हैं.

उन्होंने चेतावनी दी कि संयुक्त राष्ट्र मिशनों का प्रभाव घट रहा है, असुरक्षा बढ़ रही हैं, जिससे न केवल पीड़ितों की सुरक्षा को ख़तरे में हैं बल्कि न्याय की प्रक्रिया में भी बाधा खड़ी होगी. साथ ही, दुनिया भर में बढ़ता सैन्यीकरण और सत्तावाद, महिलाओं के अधिकारों को पीछे धकेल रहा है.

उन्होंने यूक्रेन, सूडान, काँगो लोकतांत्रिक गणराज्य, म्याँमार, हेती, ग़ाज़ा, अफ़ग़ानिस्तान, और दक्षिण सूडान जैसे संकटग्रस्त देशों व क्षेत्रों में यौन हिंसा की भयावह स्थिति का भी उल्लेख किया, विशेष रूप से सूडान के दारफ़ूर की महिलाओं के बारे में बताया, जो बलात्कार के डर से आत्महत्या तक कर रही हैं.

विशेष प्रतिनिधि पैटन ने इस अवसर पर दुनिया से अपील की कि केवल वादों से काम नहीं चलेगा, "हमें पीड़ितों को केवल सुनना नहीं, उन्हें समाधान का हिस्सा बनाना होगा. सहायता सेवाएँ पहुँचानी होंगी. समय पर, बड़े स्तर पर, निरन्तर."

उन्होंने ज़ोर देकर कहा कि महिलाओं के विकास में किया गया निवेश, समाज और दुनिया के पुनर्निर्माण में निवेश होगा.