भारत: शरणार्थियों के लिए, शिक्षा के ज़रिए आत्मनिर्भरता की नई राह
भारत की राजधानी नई दिल्ली के कुछ इलाक़ों में कुछ ऐसी कक्षाएँ चल रही हैं, जिनसे शरणार्थी बच्चों को न केवल शिक्षा, बल्कि बेहतर भविष्य की उम्मीद भी मिल रही है. संयुक्त राष्ट्र शरणार्थी एजेंसी (UNHCR) की सहायता से संचालित इन प्रशिक्षण केन्द्रों में अफ़ग़ानिस्तान, सूडान, चाड और काँगो लोकतांत्रिक गणराज्य समेत अन्य देशों से आए शरणार्थी बच्चे और वयस्क, आशा से भरी एक नई राह पर आगे बढ़ रहे हैं. (वीडियो)
दिल्ली के भोगल इलाक़े में स्थित एक शैक्षणिक केन्द्र, शरणार्थी बच्चों व युवाओं के लिए आशा की किरण बन गया है. यहाँ पढ़ रहे 120 से अधिक छात्रों को अंग्रेज़ी, हिन्दी, गणित और कम्प्यूटर के कौशल सिखाए जाते हैं.
मालवीय नगर स्थित एक अन्य केन्द्र में भी बच्चों व महिलाओं को डिजिटल साक्षरता एवं भाषा शिक्षा दी जा रही है. इन केन्द्रों का मुख्य उद्देश्य है: शरणार्थियों को आत्मनिर्भर बनाना.
भोगल केन्द्र में अंग्रेज़ी के शिक्षक मोहम्मद अकबरी, पिछले सात वर्षों से बच्चों को पढ़ा रहे हैं. वे बताते हैं, “अधिकतर छात्र अफ़ग़ानिस्तान से हैं, लेकिन सूडान और काँगो लोकतांत्रिक गणराज्य जैसे देशों के बच्चे भी यहाँ आते हैं. मैं बच्चों को पढ़ाते हुए ख़ुद भी बहुत कुछ सीख रहा हूँ - जैसेकि अब मुझे कुछ अरबी और फ़्रांसीसी भाषाओं के कई शब्द समझ में आने लगे हैं.”
भोगल केन्द्र में छठी कक्षा में पढ़ने वाले मोहम्मद इदरीस आगे चलकर डॉक्टर बनना चाहते हैं. इदरीस के अनुसार, इस केन्द्र में उन्हें अंग्रेज़ी के साथ-साथ कम्प्यूटर सीखने में भी काफ़ी मदद मिली.
वहीं अपनी 6 साल की पोती को केन्द्र में छोड़ने के लिए आईं अनीशा परवानी ने बताया, “अफ़ग़ान शरणार्थियों की आर्थिक हालत अच्छी नहीं है, इसलिए हम बच्चों को प्राइवेट स्कूल में नहीं भेज सकते. लेकिन यह केन्द्र हमारे जीवन में बदलाव ला रहा है. अब मेरी पोती हिन्दी और अंग्रेज़ी दोनों भाषाएँ बोल सकती है.”
मालवीय नगर केन्द्र में पढ़ाने वाली 21 वर्षीय फ़रिश्ता हैदरी ख़ुद भी छात्रा हैं. वो कहती हैं, “मैं अपने समुदाय के लिए कुछ करना चाहती थी, इसलिए यहाँ पढ़ाना शुरू किया.”
यह केन्द्र केवल बच्चों के लिए नहीं, बल्कि वयस्क महिलाओं के लिए भी है, जहाँ उन्हें भाषा और कम्प्यूटर कौशल सिखाए जा रहे हैं ताकि वे रोज़गार योग्य बन सकें.
अफ़ग़ान एकजुटता समिति के अध्यक्ष मोहम्मद क़ैस मलिकज़ादा का कहना है, “ये केन्द्र सभी के लिए खुले हैं.”
उन्होंने बताया कि इन केन्द्रों से कई छात्रों को भारतीय स्कूलों और राष्ट्रीय मुक्त विद्यालय शिक्षा संस्थान (NIOS) में दाख़िला भी मिला है.
इन केन्द्रों में दी जा रही शिक्षा, शरणार्थियों के लिए केवल पढ़ाई नहीं, बल्कि एक नए जीवन की शुरुआत है — जहाँ वे भाषा के साथ-साथ अपने भविष्य को गढ़ने की क्षमता भी हासिल कर रहे हैं.