हर 10 में से आठ अफ़ग़ान महिलाएँ, शिक्षा, रोज़गार और प्रशिक्षण के दायरे से बाहर
पिछले एक दशक के दौरान, अफ़ग़ानिस्तान में राजनैतिक, सामाजिक व आर्थिक जीवन में महिलाओं की भूमिका, निर्णय-निर्धारक संस्थाओं और शैक्षणिक संस्थानों में उनकी घटती हिस्सेदारी पर चिन्ता जताई गई है. लेकिन, अब स्थिति अभूतपूर्व स्तर पर पहुँच गई है. संयुक्त राष्ट्र की एक नई रिपोर्ट दर्शाती है कि मानव विकास के वैश्विक मानकों पर अफ़ग़ान महिलाएँ पिछड़ती जा रही हैं.
महिला सशक्तिकरण के लिए यूएन संस्था (UN Women) ने मंगलवार को अफ़ग़ानिस्तान की स्थिति पर एक नया लैंगिक सूचकांक प्रस्तुत किया है. इसमें वर्ष 2021 में अफ़ग़ानिस्तान की सत्ता पर तालेबान की वापसी के बाद से यह लैंगिक असमानता और महिला अधिकारों के लिए गम्भीर तस्वीर को उकेरा गया है.
बताया गया है कि हाल के समय में राष्ट्रीय और स्थानीय स्तर पर निर्णय-निर्धारक संस्थाओं में अफ़ग़ान महिलाओं की भागेदारी घटकर शून्य ही रह गई है.
अध्ययन के अनुसार, अफ़ग़ान महिलाएँ उनमें निहित सम्भावनाओं का केवल 17 प्रतिशत ही साकार कर पा रही हैं, जबकि वैश्विक स्तर पर यह आँकड़ा 60 प्रतिशत है. लड़कियों के लिए माध्यमिक स्तर पर शिक्षा, महिलाओं की आवाजाही समेत अन्य नीतियों से उनकी स्थिति और बिगड़ने की आशंका है.
78 प्रतिशत अफ़ग़ान महिलाएँ, शिक्षा, रोज़गार और प्रशिक्षण से वंचित हैं और अफ़ग़ान पुरुषों की तुलना में यह दर चार गुना अधिक है. दिसम्बर 2024 में माध्यमिक शिक्षा पर थोपी गई पाबन्दी के बाद, स्कूली शिक्षा में लड़कियों की संख्या जल्द ही शून्य पहुँच जाने की आशंका है.
यूएन महिला संस्था में मानवतावादी मामलों की प्रमुख सोफ़िया कॉलटॉर्प ने जिनीवा में जानकारी देते हुए बताया कि वर्ष 2021 के बाद से ही, अफ़ग़ान महिलाओं व लड़कियों के अधिकारों, गरिमा व अस्तित्व पर जानबूझकर, अभूतपूर्व प्रहार हुए हैं.
यूएन एजेंसी की वरिष्ठ अधिकारी ने कहा कि उनके जीवन पर थोपी गई सख़्तियों, पाबन्दियों के बावजूद, अफ़ग़ान महिलाएँ डटी हुई हैं.
अध्ययन के अनुसार, पिछले कुछ वर्षों में तालेबान शासन के दौरान लैंगिक असमानता की स्थिति अभूतपूर्व स्तर पर पहुँची है, लेकिन ऐसा नहीं है कि 2021 से पहले देश में ये चुनौती मौजूद नहीं थी.
सोफ़िया कॉलटॉर्प ने ध्यान दिलाया कि अफ़ग़ानिस्तान में लैंगिक असमानता का मुद्दा, तालेबान के साथ शुरू नहीं हुआ, बल्कि उनका संस्थागत भेदभाव, पहले से ही गहराई तक समाए उन अवरोधों की ऊपरी परत है, जिसने महिलाओं को आगे बढ़ने से रोका है.
यूएन वीमैन का सूचकांक दर्शाता है कि लैंगिक खाई के विषय में सबसे ख़राब स्थिति वाले देशों में अफ़ग़ानिस्तान दूसरे स्थान पर है.
यहाँ स्वास्थ्य, शिक्षा, वित्तीय समावेशन और निर्णय निर्धारण में महिलाओं और पुरुषों की उपलब्धियों में 76 प्रतिशत की विसंगति है.
व्यवस्थागत भेदभाव
यूएन महिला संस्था ने सचेत किया है कि भेदभाव व पाबन्दियों से न केवल लैंगिक समानता समेत अन्य टिकाऊ विकास लक्ष्यों पर प्रगति में अवरोध पैदा होंगे, बल्कि निर्धनता व अस्थिरता गहरी होगी. अर्थव्यवस्था के लिए अपने श्रम बल में विविधता ला पाना भी कठिन हो जाएगा.
यूएन एजेंसी की कार्यकारी निदेशक सीमा बहाउस ने कहा कि अफ़ग़ानिस्तान के पास सबसे बड़ा संसाधन उसकी महिलाएँ व लड़कियाँ हैं. इस सम्भावना को अभी पूरी तरह से साकार नहीं किया जा रहा है.
अध्ययन के अनुसार, देश की केवल 24 प्रतिशत महिलाएँ ही श्रम बल का हिस्सा हैं, जबकि पुरुषों के लिए यह आँकड़ा 89 प्रतिशत है.
महिलाओं के कामकाज पर आमतौर पर पाबन्दी हैं, लेकिन सीमित स्तर पर कुछ छूट दी गई है. रिपोर्ट के अनुसार, महिलाएँ अब भी रिकॉर्ड संख्या में कार्यबल का हिस्सा बन रही हैं, जिसकी एक वजह लम्बे समय से जारी आर्थिक व मानवीय संकट है और महिलाएँ रोज़गार की तलाश में हैं.
अधिकाँश महिलाएँ कम आय वाले पदों पर काम करने के लिए मजबूर हैं, जहाँ रोज़गार सुरक्षा अपेक्षाकृत कम है. साथ ही, उन्हें बिना वेतन के घरेलू कार्य की ज़िम्मेदारी भी उठानी पड़ती है.
यूएन अधिकारी ने कहा कि यदि दुनिया ने अफ़ग़ान महिलाओं और लड़कियों को सार्वजनिक जीवन से मिटाया जाना स्वीकार कर लिया, तो इससे संकेत जाएगा कि हर जगह महिलाओं के साथ यह किया जा सकता है.
उन्होंने ज़ोर देकर कहा कि अफ़ग़ान महिलाओं ने हिम्मत नहीं हारी है, और हम भी उनका साथ नहीं छोड़ेंगे.