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ऑनलाइन माध्यमों पर 'हेट स्पीच' को मिल रही हवा, रोकथाम उपायों में AI की भूमिका पर मंथन

अमेरिका में प्रदर्शनकारी बढ़ती नफ़रत के विरोध में सड़कों पर उतरे हैं.
© Unsplash/Jason Leung
अमेरिका में प्रदर्शनकारी बढ़ती नफ़रत के विरोध में सड़कों पर उतरे हैं.

ऑनलाइन माध्यमों पर 'हेट स्पीच' को मिल रही हवा, रोकथाम उपायों में AI की भूमिका पर मंथन

यूएन मामले

विश्व भर में, डिजिटल टैक्नॉलॉजी, कृत्रिम बुद्धिमत्ता (AI) और अन्य तकनीकों के इस्तेमाल में उछाल आया है, मगर उसके साथ ही, इन माध्यमों पर नफ़रत फैलाने वाले सन्देशों व भाषणों (Hate Speech) का प्रभाव भी कई गुना गहरा हो गया है. संयुक्त राष्ट्र ने निरन्तर आगाह किया है कि असली नज़र आने झूठे (deepfake) वीडियो, सोशल मीडिया प्लैटफॉर्म्स पर साझा की जाने वाली भ्रामक जानकारी, और भेदभाव को बढ़ावा देने वाले सन्देशों से समाजों में दरारें पैदा हो रही हैं, कमज़ोर समुदायों को निशाना बनाया जा रहा है और आपसी टकराव को हवा देने की भी कोशिशें हो रही हैं.

यूएन ने ऑनलाइन माध्यमों के ग़लत इस्तेमाल और उन पर नफ़रत भरे सन्देश व भाषणों से उपजी चुनौतियों के मद्देनज़र, इसे रोकने के लिए तत्काल ठोस क़दम उठाए जाने पर भी बल दिया है.

इसी सिलसिले में, 18 जून को ‘हेट स्पीच के विरुद्ध अन्तरराष्ट्रीय दिवस’ से ठीक पहले, न्यूयॉर्क स्थित संयुक्त राष्ट्र मुख्यालय में मंगलवार को एक कार्यक्रम आयोजित किया गया, जिसमें AI और हेट स्पीच के बीच सम्बन्ध और इसके समाधान में टैक्नॉलॉजी की भूमिका पर ध्यान केन्द्रित किया गया.

इसका उद्देश्य था: विश्व भर में समावेशी और सुरक्षित डिजिटल स्पेस को बढ़ावा देना.

सभ्यताओं के गठबंधन पर संयुक्त राष्ट्र के उच्च प्रतिनिधि मिगेल एंजेल मोराटिनोस ने अपने सम्बोधन में चेतावनी दी कि आज हमें सार्वजनिक सोच में विकृति और नफ़रत फैलाने के नए ख़तरों का सामना करना पड़ रहा है, जिसमें AI की भूमिका भी तेज़ी से बढ़ रही है.

नफ़रत के सामान्यीकरण पर चिन्ता

उन्होंने कहा कि नस्ल, धर्म और पहचान के आधार पर समुदायों पर शारीरिक व भाषाई हमले, उपासना स्थलों, सांस्कृतिक धरोहरों और सम्पत्तियों को नुक़सान, और राजनीति में मानवता को नीचा दिखाने वाली बयानबाज़ी अब आम बात होती जा रही है.

उच्च प्रतिनिधि मोराटिनोस ने इसे 'नफ़रत भरे सन्देश व भाषणों को सामान्य बना देने की प्रक्रिया' बताते हुए कहा कि इस संकट से निपटने के लिए उतनी ही गम्भीरता और संसाधनों की ज़रूरत है जितनी किसी भी अन्य वैश्विक आपदा से निपटने में होती है.

उन्होंने अपने कार्यकाल की महत्वपूर्ण उपलब्धियों में यहूदीवाद विरोध (antisemitism) से निपटने के लिए कार्ययोजना, और हाल ही में इस्लामोफ़ोबिया -- मुस्लिम विरोधी भावना -- से मुक़ाबले के लिए विशेष दूत की नियुक्ति का उल्लेख किया. 

उच्च प्रतिनिधि मोराटिनोस ने नफ़रत भरे भाषणों को राजनैतिक हथियार बनाने की प्रवृत्ति पर रोक लगाने का आग्रह किया. साथ ही, AI और डिजिटल जगत में तेज़ी से हो रहे बदलावों के बीच समावेशी, शान्तिपूर्ण और मानवाधिकार-आधारित सम्वाद को बढ़ावा देने पर बल दिया.

AI का बढ़ता दुरुपयोग 

संयुक्त राष्ट्र वैश्विक संचार विभाग की अवर महासचिव मेलिसा फ़्लेमिंग ने कहा कि AI एक ऐसा उपकरण है, जो मौजूदा सूचना तंत्र को तेज़ी से बदल रहा है, और यह इतनी महीनता और तीव्रता से हो रहा है कि कई बार हमें पता भी नहीं चलता कि हमारी राय कैसे बन रही है. 

उन्होंने कहा कि AI टैक्नॉलॉजी, जहाँ स्वास्थ्य, शिक्षा और समान पहुँच सुनिश्चित करने जैसे क्षेत्रों में मददग़ार साबित हो रही है, वैसे ही नफ़रत भरे सन्देश व भाषणों की पहचान व रोकथाम के लिए भी इसे एक प्रभावशाली उपकरण के रूप में इस्तेमाल किया जा सकता है.

मगर, इसके साथ गम्भीर ख़तरे भी जुड़े हैं, जैसे AI का दुरुपयोग करके झूठी, डीपफ़ेक वीडियो और भ्रामक सामग्री आसानी से और बड़े पैमाने पर फैलाई जा सकती है, जिन्हें भेद कर पाना अक्सर मुश्किल होता जा रहा है.

अवर महासचिव फ्लेमिंग ने कहा कि ऐसी सामग्री इस्तेमाल आज कमज़ोर तबकों जैसे शरणार्थियों, महिलाओं, प्रवासियों और अल्पसंख्यकों के विरुद्ध नफ़रत फैलाने के लिए किया जा रहा है. यह चिन्ता का विषय है कि कुछ समूह वित्तीय या रणनैतिक लाभ के लिए इनका इस्तेमाल कर रहे हैं.

यूक्रेन, ग़ाज़ा से लेकर अन्य युद्ध क्षेत्रों में इनके इस्तेमाल से संयुक्त राष्ट्र की मानवीय सहायता एजेंसियों का कामकाज और उनकी विश्वसनीयता तक प्रभावित हो रही है.

मेलिसा फ़्लेमिंग ने कहा कि इतिहास साक्षी है कि नफ़रत भरे सन्देश व भाषणों ने किस तरह युद्ध, हिंसा और जनसंहार को जन्म दिया है,  जिसमें यहूदी यातना शिविरों की भयावहता या युद्धों के दौरान रेडियो के ज़रिए फैलाई गई नफ़रत शामिल है.

इसके मद्देनज़र, सूचना की सत्यता को सुरक्षित रखने के लिए संयुक्त राष्ट्र अपनी रणनीति और कार्ययोजना को लगातार मज़बूत कर रहा है.

'वैश्विक डिजिटल कॉम्पैक्ट' को अब तक 193 देशों का समर्थन मिल चुका है और सूचना सत्यनिष्ठा पर यूएन के वैश्विक सिद्धान्तों' के ज़रिए सरकारों, शोधकर्ताओं और AI विशेषज्ञों की सिफ़ारिशों के आधार पर एक सकारात्मक बदलाव लाने की कोशिश की जा रही है.

अमेरिका कै सैन फ्राँसिस्को में प्रदर्शनकारी सड़कों पर एशियाई मूल के लोगों के ख़िलाफ़ नफ़रत प्रेरित हिंसा का विरोध कर रहे हैं.
Unsplash/Jason Leung
अमेरिका कै सैन फ्राँसिस्को में प्रदर्शनकारी सड़कों पर एशियाई मूल के लोगों के ख़िलाफ़ नफ़रत प्रेरित हिंसा का विरोध कर रहे हैं.

समाधान के लिए AI का साथ

टैक्नॉलॉजी मामलों पर संयुक्त राष्ट्र महासचिव के विशेष दूत अमनदीप गिल ने कहा कि नफ़रत भरे सन्देश व भाषणों को जन्म न तो तकनीक ने दिया है और न ही AI ने, लेकिन ये आज इसे फैलाने का शक्तिशाली माध्यम बन चुके हैं.

उन्होंने इतिहास का उल्लेख करते हुए बताया कि पहले भी रेडियो, टेलीविज़न और गुटेनबर्ग की प्रिंटिंग प्रेस जैसे माध्यमों से घृणा फैलाई गई, लेकिन आज AI की वजह से कहीं ज़्यादा तेज़ी से और बड़े पैमाने पर हेट स्पीच को हवा दी जा सकती है. यहाँ तक की AI के ज़रिए ही घृणा से भरे सन्देश तैयार किए जा सकते हैं.

विशेष दूत के अनुसार, हेट स्पीच से निपटने के लिए मोटे तौर पर राष्ट्रीय स्तर पर क़ानून मौजूद हैं, लेकिन इसकी कोई सार्वभौमिक परिभाषा नहीं है. जब हम नफ़रत भरे सन्देश व भाषणों से निपटने के लिए क़ानून बनाते हैं, तो अभिव्यक्ति की स्वतंत्रता और समानता के अधिकारों के बीच सन्तुलन बेहद ज़रूरी है.

उन्होंने चेतावनी दी कि हेट स्पीच से लड़ने की आड़ में उन विचारों को दबाना नहीं चाहिए जिनसे हम असहमत हों. इतिहास गवाह है कि नफ़रत भरे सन्देश व भाषण अल्पसंख्यकों के विरुद्ध हिंसा की वजह रहे हैं.

AI का उपयोग दोनों दिशाओं में हो सकता है, जहाँ यह भ्रामक और नफ़रत फैलाने वाली जानकारी को हवा दे सकता है और कमज़ोर समुदायों को निशाना बना सकता है, वहीं यह ऐसे सन्देशों की पहचान करने और उन्हें हटाने में सहायक भी हो सकता है.

यूनेस्को का कहना है कि नफ़रत भरी भाषा और सन्देश, दुनिया भर में फैलाव पर हैं.
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यूनेस्को का कहना है कि नफ़रत भरी भाषा और सन्देश, दुनिया भर में फैलाव पर हैं.

अमनदीप सिंह गिल ने बताया कि नेचुरल लैंग्वेज प्रोसेसिंग और भावनात्मक विश्लेषण (sentiment analysis) की मदद से नफ़रत भरे सन्देश व भाषणों को पहचाना जा सकता है, हालाँकि ये तकनीकें अभी पूरी तरह सटीक नहीं हैं और इनमें गड़बड़ियाँ हो सकती हैं.

विशेष दूत ने हेट स्पीच पर संयुक्त राष्ट्र की रणनीति और कार्ययोजना का उल्लेख करते हुए कहा कि अब समय आ गया है कि टैक्नॉलॉजी कम्पनियाँ, सोशल मीडिया प्लैटफ़ॉर्म, देशों की सरकारें और नागरिक समाज एक साथ मिलकर AI का इस्तेमाल समाधान के लिए करें, न कि समस्या बढ़ाने के लिए.

उन्होंने बताया कि संयुक्त राष्ट्र की इस पहल को सदस्य देशों का समर्थन मिला है, और अब तकनीक को मज़बूती देने के साथ-साथ ‘काउंटर-स्पीच’ यानी जवाबी सम्वाद को भी बढ़ावा देने की जरूरत है.

हेट स्पीच के विरुद्ध अन्तरराष्ट्रीय दिवस के सिलसिले में आयोजित इस चर्चा में एक अहम निष्कर्ष यह था कि नफ़रत भरे सन्देश व भाषणों के विरुद्ध प्रयास केवल एक नैतिक ज़रूरत नहीं, बल्कि शान्ति, लोकतंत्र और वैश्विक स्थिरता के लिए भी आवश्यक है.

इसलिए तकनीक को समस्या नहीं, समाधान बनाने की दिशा में सामूहिक संकल्प लेने पर बल दिया गया ताकि सर्वजन के लिए एक सुरक्षित, सम्मानजनक और समान डिजिटल भविष्य सुनिश्चित किया जा सके.