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अन्तरराष्ट्रीय क़ानून के प्रति बेपरवाही पर क्षोभ, 'हर संकट के पीछे आमजन की व्यथा'

संघर्ष और आग के बाद सूडान के एक शिविर में एक विस्थापित महिला राख और जलाए गए सामानों के बीच जा रही है, जो मानवीय संकट को उजागर करती है।
© UNICEF/Mohammed Jamal सूडान के दारफ़ूर में एक विस्थापन शिविर में एक महिला अपने जलाए गए आश्रय के अवशेषों को तलाशती हुई.

अन्तरराष्ट्रीय क़ानून के प्रति बेपरवाही पर क्षोभ, 'हर संकट के पीछे आमजन की व्यथा'

मानवाधिकार

युद्ध का अन्त, मौलिक मानवाधिकारों और अन्तरराष्ट्रीय क़ानून की रक्षा के इरादे से संयुक्त राष्ट्र की स्थापना की गई थी, जिसके 80 साल बाद इन संस्थापक मूल्यों व सिद्धान्तों पर ख़तरा बढ़ता जा रहा है. संयुक्त राष्ट्र मानवाधिकार उच्चायुक्त (OHCHR) वोल्कर टर्क़ ने सोमवार को जिनीवा में मानवाधिकार परिषद को सम्बोधित करते हुए यह चेतावनी जारी की है.

मानवाधिकार उच्चायुक्त टर्क़ ने कहा, “हम बढ़ते टकराव और अन्तरराष्ट्रीय मानवाधिकार तथा मानवतावादी क़ानून की खुली अनदेखी के एक ऐसे रास्ते पर बढ़ रहे हैं, जिसका बचाव नहीं किया जा सकता है.” 

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उन्होंने संकटग्रस्त दुनिया की एक गम्भीर तस्वीर पेश की, जहाँ सशस्त्र युद्ध बढ़ रहे हैं, जलवायु संकट गहराता जा रहा है, तकनीकी ख़तरों का नया दौर सामने आ रहा है और तानाशाही प्रवृत्तियाँ चिन्ताजनक रूप से बढ़ रही हैं.

अराजकता की खाई 

मानवाधिकार कार्यालय प्रमुख वोल्कर टर्क़ ने कहा, दुनिया भर में हिंसक टकराव तेज़ी से बढ़ रहे हैं. आमजन को जानबूझकर निशाना बनाया जा रहा है और कई जगहों पर भूख और बलात्कार को युद्ध के हथियार के तौर पर इस्तेमाल किया जा रहा है. फिर भी, “जवाबदेही अक्सर नदारद रहती है.” 

यूक्रेन से म्याँमार तक, ये युद्ध देशों को अराजकता और क़ानून की अनुपस्थिति की गहराई में धकेल रहे हैं.

OHCHR के अनुसार, सूडान में परस्पर विरोधी सैन्य बल के बीच सत्ता के लिए लड़ाई में इस वर्ष फ़रवरी से अप्रैल के बीच आम लोगों की मनमाने ढंग से हत्या किए जाने के मामलों में तीन गुना वृद्धि हुई है.

वोल्कर टर्क़ ने कहा, इसराइल ने ग़ाज़ा में भोजन को हथियार बना लिया है और जीवनरक्षक राहत सहायता रोक दी है. 

उन्होंने “तत्काल युद्धविराम और दो-राष्ट्र समाधान” की अपील की, जिसमें ग़ाज़ा को भविष्य के फ़लस्तीनी राष्ट्र का अभिन्न हिस्सा माना जाए.

यूएन के वरिष्ठ अधिकारी ने इसराइल और ईरान के बीच बढ़ती सैन्य तनातनी को “बेहद चिन्ताजनक” बताया और कहा कि तनाव में कमी लाने, हमलों को रोकने और आगे का रास्ता ढूंढने के लिए तुरन्त राजनयिक बातचीत शुरू करनी होगी.

निशाने पर नागरिक समाज

OHCHR के मुताबिक़, दुनिया भर में साल 2024 में कम से कम 625 मानवाधिकार कार्यकर्ताओं और पत्रकारों की हत्या हुई या वे ग़ायब हो गए. यानि हर 14 घंटे में एक मामला.

मानवाधिकार उच्चायुक्त ने चिन्ता जताई कि विश्व के कई हिस्सों में नागरिक समाज और मीडिया को बदनाम किया जा रहा है, डराया-धमकाया जा रहा है और चुप कराया जा रहा है, जबकि सत्ता की जवाबदेही तय करने में मीडिया और नागरिक समाज एक अहम भूमिका निभाते हैं.

उन्होंने ध्यान दिलाया कि मानवाधिकारों के उल्लंघन और दुर्व्यवहार मामलों की जाँच पड़ताल और उनके बारे में जानकारी जुटाना व साझा करना, हिंसक टकराव में कमी लाने और शान्ति स्थापित करने के लिए आवश्यक उपाय हैं.

वोल्कर टर्क ने क्षोभ जताया किअन्तरराष्ट्रीय आपराधिक न्यायालय (ICC) समेत अन्तरराष्ट्रीय संस्थाओं पर हो रहे हमलों से वह आहत हैं.

“राष्ट्रीय, क्षेत्रीय या अन्तरराष्ट्रीय स्तर पर न्यायाधीशों और अभियोजकों को उनके कर्तव्यों के पालन के कारण दंडित करना क़ानून के शासन पर हमला है और न्याय प्रणाली को कमज़ोर करता है.”

प्रताड़ित अल्पसंख्यक

OHCHR के अनुसार, पिछले वर्ष 119 देशों में हर पाँच में से एक व्यक्ति ने आप्रवासी-विरोध से लेकर LGBTIQ+ समुदाय को निशाना बनाने वाली नफ़रत भरी भाषा व सन्देशों और भेदभाव का सामना किया है.

उच्चायुक्त टर्क़ ने कहा कि भेदभाव न तो दुर्लभ है और न ही अचानक हो जाने वाली घटना. यह व्यापक रूप से फैला हुआ है.  उदाहरण के तौर पर, संयुक्त राष्ट्र के आँकड़ों के अनुसार, महिलाओं को पुरुषों की तुलना में दोगुने से भी अधिक भेदभाव का सामना करना पड़ता है.

उन्होंने अफ़ग़ानिस्तान में महिलाओं और लड़कियों की व्यथा का उल्लेख करते हुए कहा कि वहाँ तथाकथित तालेबान प्रशासन, सार्वजनिक जीवन से महिलाओं और लड़कियों को पूरी तरह मिटा देने की व्यवस्थागत नीति लागू करने में जुटा है.

मानवाधिकार मामलों के प्रमुख ने कहा कि इस चुनौतीपूर्ण दौर में, हमें सरकारों और समाजों को मानवाधिकारों के पक्ष में न केवल शब्दों में बल्कि अपने कर्म में भी दृढ़ता से खड़ा होना होगा.