महासागर सम्मेलन: प्लास्टिक प्रदूषण समाप्ति के लिए वैश्विक अभियान को मिली मज़बूती
फ़्राँस के नीस शहर में महासागर संरक्षण सम्मलेन में 40 से अधिक नेता प्लास्टिक प्रदूषण से निपटने के इरादे से एकजुट हुए, जोकि दुनिया में सबसे तेज़ी से बढ़ते पर्यावरणीय ख़तरों में से एक है. इस सम्मेलन में प्लास्टिक प्रदूषण के विषय पर न सिर्फ़ चर्चा हुई, बल्कि इस पर पार पाने के लिए राजनैतिक इच्छाशक्ति भी व्यक्त की गई.
सभी नेताओं ने इस वर्ष के अन्त तक एक वैश्विक सन्धि को अन्तिम रूप देने की साझा प्रतिबद्धता जताई, जो पहली बार प्लास्टिक के पूरे जीवन चक्र को नियन्त्रित कर पाएगी.
बैठक में शामिल हुईं और सन्धि वार्ताओं का नेतृत्व कर रहीं ज्योति माथुर-फिलिप ने यूएन न्यूज़ को बताया, "सन्धि को अगस्त तक पूरा करने के लिए नई प्रतिबद्धता है…यह एक ऐसा मुद्दा है जिसे भविष्य के भरोसे नहीं छोड़ा जा सकता."
ज्योति माथुर-फिलिप अन्तर-सरकारी वार्ता समिति (INC) की कार्यकारी सचिव हैं.
संयुक्त राष्ट्र पर्यावरण कार्यक्रम (UNEP) की प्रमुख इंगेर ऐंडरसन की मेज़बानी में आयोजित यह अनौपचारिक बैठक एक शान्त लेकिन महत्वपूर्ण कूटनैतिक क्षण साबित हुई.
यह इस बात का संकेत था कि दो वर्षों की चर्चाओं के बाद अब राजनैतिक इच्छाशक्ति भी शायद वैज्ञानिक चेतावनियों की गम्भीरता के अनुरूप आकार ले रही है.
इस दिशा में वार्ता के लिए अहम अन्तिम बैठक 5 से 14 अगस्त के बीच जिनीवा में आयोजित की जाएगी, तो वार्ताकारों पर यह दबाव है कि वे प्लास्टिक प्रदूषण से निपटने के लिए पहला क़ानूनी रूप से बाध्यकारी वैश्विक समझौता पेश करें.
ऐसा समझौता जिसमें उत्पादन, उपभोग और अपशिष्ट प्रबन्धन जैसे सभी पहलुओं को शामिल किया जाए.
हर कोने में प्लास्टिक
वर्तमान में, प्लास्टिक कचरा पृथ्वी के लगभग हर हिस्से में अपनी जगह बना चुका है. यहाँ तक कि अब यह सूक्ष्म प्लास्टिक (microplastics) के रूप में इनसानी शरीर में भी पाया जा रहा है.
संयुक्त राष्ट्र के अनुमानों के अनुसार, यदि तुरन्त कार्रवाई नहीं की गई, तो 2040 तक हर साल सागर में प्रवेश करने वाले प्लास्टिक की मात्रा 3.7 करोड़ मीट्रिक टन तक पहुँच सकती है.
कार्यकारी सचिव ज्योति माथुर-फिलिप ने कहा, "हम प्लास्टिक में घुट रहे हैं. अगर हमने प्लास्टिक प्रदूषण से निपटने के लिए कुछ नहीं किया, तो हमारे पास एक भी पारिस्थितिकी तंत्र नहीं बचेगा, न ज़मीनी और न ही जलीय."
इससे होने वाला आर्थिक नुक़सान भी उतना ही चौंकाने वाला है. साल 2016 से 2040 के बीच प्लास्टिक से सम्बन्धित क्षति की अनुमानित लागत 281 ट्रिलियन डॉलर तक पहुँच सकती है.
उन्होंने कहा, "यह अर्थव्यवस्था पर बहुत भारी पड़ रहा है. पर्यटन में, समुद्र तटों की सफ़ाई में, मछुआरों को मछलियों की कमी में, तटीय क्षति में, और आर्द्रभूमि के नष्ट होने में."
जिनीवा में अन्तिम चरण
इस सन्धि प्रक्रिया की शुरुआत 2022 में संयुक्त राष्ट्र पर्यावरण सभा के अनुरोध पर हुई थी. यह सभा पर्यावरणीय मुद्दों पर दुनिया की सर्वोच्च निर्णयकारी संस्था है.
तब से अब तक अन्तर-सरकारी वार्ता समिति (INC) ने दो वर्षों से भी कम समय में पाँच बार बैठक की है, जो संयुक्त राष्ट्र मानकों के नज़रिए से तेज़ी से आगे बढ़ी है. कार्यकारी सचिव ज्योति माथुर-फिलिप ने बताया, "हमने दिसम्बर 2022 से दिसम्बर 2024 तक सिर्फ़ दो साल में पाँच सत्र पूरे किए हैं."
उन्हें उम्मीद है कि इस अगस्त में जिनीवा में होने वाला आगामी सत्र इस सन्धि को अन्तिम रूप देगा.
एक महत्वपूर्ण प्रगति छह महीने पहले दक्षिण कोरिया के बुसान में हुई पिछली बैठक में देखी गई, जहाँ प्रतिनिधियों ने सन्धि के मसौदे की रूपरेखा बताने वाला 22-पृष्ठीय मसौदे को तैयार किया.
उन्होंने कहा, "इसमें 32 या 33 अनुच्छेद हैं, और हर अनुच्छेद को नाम दिया गया है, ताकि देश देख सकें कि यह सन्धि कैसी दिखेगी."
"अब देश अनुच्छेदों के नम्बर के आधार पर चर्चा शुरू कर चुके हैं… और इसी वजह से मेरी उम्मीद है कि इस बार इसका निष्कर्ष निकल आएगा."
सन्धि का मसौदा अब भी वार्ता के दौर से गुज़र रहा है, लेकिन इसमें प्लास्टिक के पूरे जीवन चक्र को नियंत्रित करने के लिए उपाय शामिल हैं: उत्पादन से लेकर कचरे के प्रबन्धन तक. यह मसौदा अनिवार्य और स्वैच्छिक प्रावधानों, दोनों को शामिल किया गया है.
अगर सब कुछ योजना के अनुसार हुआ तो अन्तिम मसौदे को इस वर्ष के अन्त में या 2026 की शुरुआत में एक राजनयिक सम्मेलन में प्रस्तुत किया जाएगा, जहाँ विभिन्न देश इसे औपचारिक रूप से स्वीकार कर सकेंगे और अनुमोदन की प्रक्रिया शुरू होगी.
लघु द्वीपीय पर असमान बोझ
प्लास्टिक प्रदूषण एक वैश्विक समस्या है, लेकिन कुछ देशों, ख़ासकर लघु द्वीपीय विकासशील देशों (SIDS), को इसका अनुचित और असमान बोझ उठाना पड़ रहा है.
कार्यकारी सचिव ज्योति ने कहा, "यह एक तथ्य है कि छोटे द्वीपीय देश उतना प्लास्टिक उपयोग नहीं कर रहे, जितना उनके तटों पर बहकर आ रहा है, फिर भी उन्हें समुद्र तटों की सफ़ाई की ज़िम्मेदारी उठानी पड़ती है, जबकि वे इसके लिए ज़िम्मेदार नहीं हैं... उन पर इसका असर अन्यायपूर्ण ढंग से पड़ रहा है."
अनुमानों के मुताबिक़, विश्व स्तर पर 18 से 20 प्रतिशत प्लास्टिक कचरा समुद्र में समाप्त होता है.
नीस सम्मेलन इस समस्या से निपटने के लिए प्रयासों को गति दे रहा है, अब दुनिया की निग़ाहें जिनीवा पर टिकी हैं जहाँ अगस्त में होने वाला निर्णय यह तय कर सकता है कि क्या प्लास्टिक संकट को रोकने की दिशा में एक निर्णायक क़दम उठाया जाएगा या फिर यह यूँ ही और बढ़ता रहेगा.