ग़ाज़ा: खाद्य क़िल्लत, ऊँची क़ीमतों, सीमित आपूर्ति के कारण, जीवित रह पाना एक बड़ी चुनौती
ग़ाज़ा में फ़लस्तीनी आबादी को भरपेट भोजन न मिल पाना, उनकी दैनिक गुज़र-बसर अब एक त्रासदी बन चुकी है. मानवीय सहायता की सीमित आपूर्ति, आसमान छूती क़ीमतों, और धन की कमी ने उनके जीवन को असहनीय बना दिया है.
संयुक्त राष्ट्र की सहायता एजेंसियों ने बुधवार को चेतावनी दी कि ग़ाज़ा में बहुत ही सीमित मात्रा में खाद्य सामग्री पहुँचाई जा रही है, जिससे लोग कुपोषण का शिकार हो रहे हैं. 20 लाख ज़्यादा की आबादी के लिए भरपेट भोजन तक पहुँच कठिन होती जा रही है.
पिछले महीने इसराइल द्वारा अनुमति दिए जाने के बाद से अब तक केवल 6 हज़ार टन गेहूँ का आटा ही युद्धग्रस्त इलाक़े में पहुँच पाया है. लेकिन मौजूदा हालात को देखते हुए यह मात्रा बेहद कम है. संयुक्त राष्ट्र की मानवीय सहायता समन्वय एजेंसी (OCHA) का कहना है कि तुरन्त 10 हज़ार टन गेहूँ के आटे की ज़रूरत है.
OCHA की प्रवक्ता ओल्गा चेरेवको ने ग़ाज़ा के ख़ान युनिस से यूएन न्यूज़ को बताया बताया कि ज़मीनी हालात सुधारने का एकमात्र तरीक़ा है कि और अधिक सीमा चौकियों को खोलने की अनुमति दी जाए.
ग़ाज़ा में सिर्फ़ भोजन ही नहीं, बल्कि जीवन रक्षा के लिए ज़रूरी कई अन्य चीज़ों, जैसेकि ईंधन, खाना पकाने की गैस, आश्रय स्थल के लिए सामान की भी सख़्त ज़रूरत है. इसके मद्देनज़र बिना किसी रुकावट और अंकुश के मानवीय मदद को प्रवेश देने की अनुमति का आग्रह किया गया है.
ओल्गा चेरेवको ने इसराइली अधिकारियों से राहत कार्यों को सुचारु बनाने के लिए सुरक्षित और सहयोगपूर्ण माहौल उपलब्ध कराने की अपील की है. मानवीय सहायता मिशन के लिए प्रतीक्षा अवधि घटाई जानी चाहिए और ज़रूरतमन्दों तक पहुँच सुनिश्चित की जानी होगी.
उन्होंने दोहराया कि राहत पाने के लिए किसी को भी अपनी जान जोखिम में डालने के लिए मजबूर नहीं किया जाना चाहिए. ग़ाज़ा में लोग फ़िलहाल अकाल के जोखिम का सामना कर रहे हैं.
संयुक्त राष्ट्र महासचिव एंतोनियो गुटेरेश और आपात सहायता प्रमुख टॉम फ़्लैचर समेत अन्य शीर्ष यूएन अधिकारियों ने ग़ाज़ा में पहुँची मदद को "सागर में एक बून्द" क़रार दिया है.
आसमान छूती क़ीमतें
ग़ाज़ा के बाज़ारों में भले ही लोगों की भीड़ नज़र आती हो, लेकिन वहाँ दो बुनियादी चीज़ों की भारी कमी है: नक़दी और सामान.
इन हालात में ज़्यादातर लोगों के पास केवल तीन विकल्प बचे हैं: या तो अमेरिका और इसराइल द्वारा समर्थित नई सहायता वितरण प्रणाली से भोजन सहायता लेने कोशिश करें, जहाँ हाल के दिनों में अनेक लोगों की जान जा चुकी है; या अपने बच्चों को भूख से तड़पता देखें; या फिर बाज़ारों में बचे-खुचे और लूटे गए सामान की बेहिसाब क़ीमत चुकाएँ.
ग़ाज़ा में एक स्थानीय सरकारी कर्मचारी अकरम यूसुफ़ ने यूएन न्यूज़ संवाददाता को बताया कि, “यहाँ सामान के दाम योरोप से भी महंगे हैं. हालात बहुत मुश्किल हैं, हम दो साल से इसी हालत में जी रहे हैं."
"विस्थापन, बेघर होना, बमबारी, तबाही, इन सबके साथ व्यापारी भी मनमानी क़ीमतें वसूल रहे हैं. आम लोग अब और बोझ नहीं झेल सकते. हम करें भी तो क्या करें?”
बीते 20 महीनों से चल रहे युद्ध के कारण ग़ाज़ा में जीवन-व्यापन असहनीय हो चुका है, और यहाँ गुज़र बसर की क़ीमत अब दुनिया में में सबसे ज़्यादा मानी जा रही है.
गुज़र-बसर का संकट
बेइत लाहिया से अपने परिवार के साथ विस्थापित अहमद अल-बहरी ने बताया कि अब एक ब्रैड का पैकेट सात शेकेल यानी लगभग दो डॉलर में मिल रहा है.
“यहाँ न आटा है, न दूध, न बच्चों के लिए डायपर, और न ही खाने को कुछ बचा है. हम लगातार भूख की हालत में जी रहे हैं. मैं अपने बच्चे के लिए रोटी ख़रीदने के लिए सात शेकेल कहाँ से लाऊँ? आख़िर इस बच्चे का क्या क़सूर है?”
अक्टूबर 2023 में इसराइल पर हमास के आतंकी हमलों के बाद शुरू हुए युद्ध के बाद से फ़लस्तीनी बैन्कों में कामकाज बन्द हो जाने से लोगों की मुश्किलें और बढ़ गई हैं.
अब लोग अपने बैन्क खाते से धन निकालने और पेंशन हासिल करने के लिए फ़ोन ऐप्स का इस्तेमाल करने के लिए मजबूर हैं, और इसके लिए स्थानीय व्यापारियों के पास जाते हैं, जो भारी-भरकम कमीशन वसूलते हैं.
सरकारी कर्मचारी यूसुफ़ ने बताया कि पहले उन्हें अपना वेतन पाने के लिए 20 प्रतिशत कमीशन देना पड़ता था, लेकिन अब यह बढ़कर क़रीब 50 प्रतिशत तक पहुँच गया है.
‘मृतकों से ईर्ष्या’
ग़ाज़ा के कई निवासियों ने यूएन न्यूज़ को बताया कि अब एक किलो आटे की क़ीमत लगभग 100 शेकेल हो गई है, जो क़रीब 29 डॉलर के बराबर है.
अशरफ अल-देइरी नाम के एक व्यक्ति ने कहा कि, "अगर वेतन 2 हज़ार शेकेल है, तो कमीशन काटने के बाद वह केवल 1 हज़ार शेकेल बचता है."
"एक औसत या छोटे परिवार का रोज़ाना का ख़र्च कम से कम 500 शेकेल (लगभग 143 डॉलर) है. इसलिए हम बहुत बड़ी तकलीफ़ में हैं और हमें किसी की दया और मदद की ज़रूरत है."
रायेद ताफ़ेश नाम के एक युवा ने ऊँचे दामों को लेकर चिन्ता जताई, ख़ासकर तब उनके अधिकाँश साथी बेरोज़गार हैं और उनके पास कोई आमदनी का स्रोत नहीं है. "हम एक भी शेकेल नहीं कमाते हैं. हमारे पास रोज़गार नहीं है. हम धीरे-धीरे मर रहे हैं. "हम मृतकों से भी ईर्ष्या करने लगे हैं."
सहायता प्रयास जारी
संयुक्त राष्ट्र की टीमें सोमवार को केरेम शलोम सीमा चौकी के ज़रिए कुछ राहत सामग्री, मुख्यतः आटा, पहुँचाने में सफल रहीं. यह मदद ग़ाज़ा शहर के लिए भेजी जा रही थी, लेकिन भूखे और परेशान लोग इसे सीधे ट्रकों से छीनने लगे.
ऐसे लूटपाट और ट्रक चालकों पर हमलों की पहले भी कई घटनाएँ हुई हैं, जिन्हें संयुक्त राष्ट्र ने पूरी तरह से ख़ारिज किया है.
OCHA ने ज़ोर देकर कहा है कि क़ाबिज़ शक्ति के तौर पर इसराइल को ग़ाज़ा में सार्वजनिक व्यवस्था और सुरक्षा बनाए रखने की ज़िम्मेदारी उठानी होगी. ज़्यादा से ज़्यादा मात्रा में ज़रूरी सहायता सामग्री को सीमा चौकियों और रास्तों के माध्यम से ग़ाज़ा में प्रवेश करने दिया जाना चाहिए, ताकि मानवीय ज़रूरतें पूरी हो सकें और लूटपाट को रोका जा सके.