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ग़ाज़ा के स्कूलों पर इसराइली हमले, मानवता के विरुद्ध सम्भावित अपराध

गाजा के अल बुरेज में संयुक्त राष्ट्र सशस्त्र बलों के क्षतिग्रस्त आश्रय स्थल के अंदर से लिया गया दृश्य, जिसमें मलबा और अवशेष दिखाई दे रहे हैं, और बाहर विस्थापित परिवार और जीवित बचे लोग दिखाई दे रहे हैं।
© UNRWA 6 मई को ग़ाज़ा के अल बुरैज़ में, UNRWA के एक स्कूल में हुए इसराइली हवाई हमले के बाद का दृश्य, जिसे शरण स्थल के रूप में उपयोग किया जा रहा था. इस हमले में लगभग 30 लोग मारे गए, जिनमें महिलाएँ और बच्चे भी शामिल हैं.

ग़ाज़ा के स्कूलों पर इसराइली हमले, मानवता के विरुद्ध सम्भावित अपराध

मानवाधिकार

इसराइली सैन्य बलों द्वारा ग़ाज़ा में शिक्षा और सांस्कृतिक ढाँचे के विध्वंस को अंजाम दिया जाना, युद्ध अपराध है और इसे मानवता के विरुद्ध सर्वनाश (extermination) की श्रेणी में रखा जा सकता है. संयुक्त राष्ट्र मानवाधिकार परिषद द्वारा नियुक्त एक स्वतंत्र जाँच आयोग ने मंगलवार को अपनी एक नई रिपोर्ट के निष्कर्ष साझा किए हैं.

स्वतंत्र, अन्तरराष्ट्रीय जाँच आयोग (COI) की रिपोर्ट के अनुसार इसराइली बलों ने हवाई हमलों, गोलाबारी, आगज़नी और योजनाबद्ध ध्वस्तीकरण के ज़रिए ग़ाज़ा में 90 प्रतिशत से अधिक स्कूलों और विश्वविद्यालयों की इमारतों को नुक़सान पहुँचाया या पूरी तरह नष्ट कर दिया.

7 अक्टूबर 2023 को हमास द्वारा इसराइल पर किए गए आतंकी हमलों के बाद यह तबाही हुई, जिससे ग़ाज़ा में 6.58 लाख से अधिक बच्चे शिक्षा से वंचित हो गए हैं, और इनमें से कई बच्चे लगभग दो वर्षों से स्कूल नहीं जा पाए हैं. 

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स्वतंत्र जाँच आयोग की अध्यक्ष नवी पिल्लै ने कहा, “हम लगातार ऐसे संकेत देख रहे हैं कि इसराइल एक सुनियोजित अभियान चला रहा है, जिसका उद्देश्य ग़ाज़ा में फ़लस्तीनी जीवन को पूरी तरह मिटा देना है.”

“इसराइल द्वारा फ़लस्तीनी लोगों के शैक्षिक, सांस्कृतिक और धार्मिक जीवन को निशाना बनाया जाना सिर्फ़ मौजूदा पीढ़ियों को ही नहीं, बल्कि आने वाली पीढ़ियों को भी नुक़सान पहुँचाएगा और उनके स्व-निर्णय के अधिकार में बाधा पैदा होगी.”

सैन्य अड्डों में तब्दील हुई इमारतें

COI ने अपनी रिपोर्ट में दस्तावेज़ी सबूत पेश किए हैं, जिनके अनुसार, इसराइली सेना ने कई शिक्षण संस्थानों पर क़ब्ज़ा कर उन्हें सैन्य अड्डों में बदल दिया.

इनमें एक उदाहरण अल-अज़हर विश्वविद्यालय के अल-मुघरका परिसर का है, जिसके एक हिस्से को सैन्य बलों के लिए एक यहूदी उपासना स्थल में तब्दील कर दिया गया.

रिपोर्ट में बताया गया है कि हमास के लड़ाकों द्वारा एक स्कूल का सैन्य मक़सद के लिए इस्तेमाल किए जाने का मामला भी सामने आया है.

मानवाधिकार विशेषज्ञों ने ध्यान दिलाया कि ऐसा व्यवहार अन्तरराष्ट्रीय मानवतावादी क़ानून का उल्लंघन है, जिसमें नागरिक प्रतिष्ठानों (स्कूल, अस्पताल इत्यादि) और सैन्य ठिकानों के बीच स्पष्ट अन्तर को अनिवार्य बताया गया है.

धार्मिक स्थलों को  बनाया निशाना

ग़ाज़ा में आधे से अधिक धार्मिक और सांस्कृतिक स्थलों को नुक़सान पहुँचाया गया है या वे पूरी तरह नष्ट कर दिए गए हैं. इनमें कई ऐसे स्थल शामिल हैं जहाँ आमजन (महिलाएँ और बच्चे) भी शरण ले रहे थे. हमलों में सैकड़ों लोग मारे गए.

आयोग ने कहा कि इसराइली बलों को इन स्थलों का सांस्कृतिक महत्व पता था या पता होना चाहिए था, फिर भी वे इन्हें नुक़सान पहुँचाया.

इसराइली अधिकारियों ने क़ाबिज़ पश्चिमी तट में फ़लस्तीनी, यहूदी और अन्य संस्कृतियों का प्रतिनिधित्व करने वाले कई सांस्कृतिक धरोहर स्थलों पर कब्ज़ा कर लिया, उनका विकास किया और फिर उनसे आर्थिक लाभ उठाया. जबकि वहाँ रह रहे फ़लस्तीनी निवासियों को विस्थापित कर दिया गया.

इसराइल ने इन स्थलों तक फ़लस्तीनियों की पहुँच को या तो पूरी तरह रोक दिया है या बहुत सख़्त प्रतिबन्ध लगा दिए हैं.

नवी पिल्लै ने कहा कि धार्मिक और सांस्कृतिक स्थलों पर हमलों से धार्मिक व सांस्कृतिक प्रथाएँ, स्मृतियाँ और इतिहास गहरे रूप से प्रभावित हुए हैं.

उन्होंने कहा, “धरोहर स्थलों को निशाना बनाना और नष्ट करना, पश्चिमी तट में उन तक पहुँच सीमित करना और उनकी विविध ऐतिहासिक परम्पराओं को मिटाना, फ़लस्तीनियों के ज़मीनी ऐतिहासिक सम्बन्धों को कमज़ोर करता है और उनकी सामूहिक पहचान को भी क्षति पहुँचाता है.”

सिफ़ारिशें

स्वतंत्र आयोग ने इसराइल से सांस्कृतिक, धार्मिक और शैक्षणिक संस्थानों पर हमले तुरन्त बन्द करने, और इन संस्थानों पर क़ब्ज़ा कर उनका सैन्य इस्तेमाल करने पर रोक लगाने की मांग की है.

आयोग ने इसराइल से यह भी कहा कि वह अपने क़ब्ज़े और बस्तियों के विस्तार की गतिविधियों को समाप्त करे, ख़ासकर उन इलाक़ों में जो धार्मिक और सांस्कृतिक महत्व के हैं. साथ ही, अन्तरराष्ट्रीय न्यायालय (ICJ) के आदेशों का पूरी तरह से पालन किया जाना होगा.

जाँचकर्ताओं ने फ़लस्तीनी प्राधिकरण से विभिन्न संस्कृतियों से जुड़े सांस्कृतिक धरोहर स्थलों की सुरक्षा और संरक्षण सुनिश्चित करने का आग्रह किया है, और नागरिक इमारतों का सैन्य उद्देश्यों के लिए उपयोग बन्द करना होगा.

बढ़ता मानवीय संकट

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इस बीच, संयुक्त राष्ट्र एजेंसियों ने एक बार फिर ग़ाज़ा में लगातार बिगड़ते मानवीय संकट पर चेतावनी जारी की है. संयुक्त राष्ट्र बाल कोष (UNICEF) ने एक पाँच वर्षीय कुपोषित बच्चे का उदाहरण देते हुए कहा कि उसकी हालत में सुधार पूरी तरह से पर्याप्त भोजन और लगातार देखभाल पर निर्भर है. 

“बच्चों के स्वास्थ्य और जीवन रक्षा के लिए बड़े पैमाने पर राहत सामग्री को ग़ाज़ा में प्रवेश की अनुमति दी जानी चाहिए.”

फ़लस्तीनी शरणार्थियों के लिए संयुक्त राष्ट्र सहायता एजेंसी (UNRWA) के प्रमुख फ़िलिपे लज़ारिनी ने राहत सामग्री की आपूर्ति में देरी और अड़चनों पर गहरी चिन्ता जताई है.

उन्होंने इसराइल से संयुक्त राष्ट्र को ग़ाज़ा में राहत सामग्री लाने और उसे सुरक्षित रूप से वितरित करने के लिए सुरक्षित रास्ता प्रदान करने का आग्रह किया है.

“यह ही एकमात्र रास्ता है जिससे बड़े पैमाने पर भुखमरी को टाला जा सकता है, जिसमें 10 लाख बच्चे भी शामिल हैं.”

यूएन एजेंसी प्रमुख लज़ारिनी ने चेतावनी दी कि हर दिन हताहतों और घायलों की खबरें मिलती हैं, ख़ासकर उन सहायता वितरण केन्द्रों पर, जिन्हें अमेरिकी समर्थन प्राप्त है और जहाँ सुरक्षा की ज़िम्मेदारी इसराइली और निजी सुरक्षा बलों के पास है. ये केन्द्र अब हर दिन के "मौत के जाल" बनते जा रहे हैं.

उन्होंने इस वितरण व्यवस्था को अपमानजनक बताया, जिसमें हज़ारों भूखे और बेबस लोगों को राहत पाने के लिए मीलों पैदल चलने के लिए मजबूर किया जाता है, जबकि सबसे कमज़ोर और दूर-दराज़ इलाक़ों में रहने वाले लोग इस सहायता से पूरी तरह वंचित रह जाते हैं.