आपदाओं की असल लागत, पूर्व अनुमान से 10 गुना अधिक
दुनिया भर के देशों में आपदाओं की बेतहाशा लागत के कारण, स्वास्थ्य सेवा, आवास, शिक्षा और रोज़गार पर दूरगामी प्रभाव पड़ रहे हैं. देश, प्राकृतिक आपदाओं के कारण भारी वित्तीय लागत से जूझ रहे हैं, क्योंकि इन आपदाओं का वित्तीय बोझ, पहले लगाए गए अनुमान से 10 गुना अधिक है.
यह संयुक्त राष्ट्र की आपदा जोखिम न्यूनीकरण एजेंसी, UNDRR ने मंगलवार को जारी एक रिपोर्ट में कहा गया है कि एक तरफ़ वर्तमान अनुमान बताते हैं कि भूकम्प, भूस्खलन और बाढ़ जैसी प्राकृतिक आपात स्थितियों का वैश्विक आर्थिक प्रभाव सालाना लगभग 200 अरब डॉलर है.
UNDRR के लिए वैश्विक जोखिम विश्लेषण विभाग की प्रमुख जेंटी कर्श-वुड ने कहा कि यह आँकड़ा "वास्तविक लागत के केवल एक अंश" को दर्शाता है.
उन्होंने चेतावनी के अन्दाज़ में कहा कि वास्तविक लागत 2.3 ट्रिलियन डॉलर के क़रीब है. साथ ही, दुनिया सतत विकास के क्षेत्र में हो रही प्रगति पर "आपदाओं के प्रभाव को लगातार कम करके आँक रही है."
बाढ़ों की भीषणता और विनाश
इस स्थिति की गम्भीरता को इस उदाहरण से समझना आसान होगा. अगर किसी व्यक्ति का जन्म, 1990 में हुआ तो उसके जीवनकाल में, सदी में एक बार आने वाली विनाशकारी बाढ़ का अनुभव करने की सम्भावना 63 प्रतिशत है. जबकि 2025 में पैदा हुए बच्चे के लिए यह सम्भावना 86 प्रतिशत तक बढ़ जाती है.
कर्श-वुड ने कहा, "ये घटनाएँ हम सभी को प्रभावित कर रही हैं."
चरम मौसम की लागत केवल नष्ट हुए बुनियादी ढाँचे में ही नहीं मापी जाती है, बल्कि स्वास्थ्य, शिक्षा और अवसर के खोए हुए वर्षों के रूप में भी मापी जाती है.
निर्बल मानवीय जवाबी कार्रवाई
स्वास्थ्य सेवा, शिक्षा और रोज़गार के क्षेत्र, आपात स्थितियों के कारण तेज़ी से बाधित हो रहे हैं, जिससे राष्ट्रीय ऋण बढ़ रहा है और पुनर्बहाली की रफ़्तार धीमी हो रही है - विशेष रूप से पहले से ही कमज़ोर देशों में.
कर्श-वुड ने कहा कि इस स्थिति ने मानवीय सहायता के लिए जवाबी कार्रवाई को अस्थाई और ऐसी बना दिया है जिसे समर्थन नहीं मिल पा रहा है क्योंकि देश, लगातार और गम्भीर जलवायु झटकों से जूझ रहे हैं.
नुक़सान दोगुना हो गया है
UNDRR के अनुसार, पिछले दो दशकों में आपदाओं से होने वाला वित्तीय नुक़सान दोगुना हो गया है.
एजेंसी की नई रिपोर्ट बताती है कि अन्तरराष्ट्रीय समुदाय किस तरह से स्थाई निवेश करने के लिए सहयोग कर सकता है, जिससे भविष्य की आपदाओं के प्रति सहनशीलता बने और सार्वजनिक वित्त पर दबाव कम हो.
कर्श-वुड ने ज़ोर देकर कहा कि जलवायु सम्बन्धी घटनाओं से होने वाले अधिकांश नुक़सान को रोका जा सकता है.
आगे की चुनौती "हमारी वित्तपोषण प्रणालियों में बेहतर ढंग से तालमेल बनाना और "सार्वजनिक व निजी निवेश का उपयोग यह सुनिश्चित करने के लिए करना है कि हम सरकारों पर बोझ को कम कर रहे हैं."
2014 और 2023 के बीच आपदाओं के कारण लगभग 24 करोड़ लोग अपने देशों के भीतर ही विस्थापित हुए.
चीन और फिलीपीन्स दोनों ही देशों ने 4 करोड़ से अधिक विस्थापित व्यक्तियों की जानकारी दी, जबकि भारत, बांग्लादेश और पाकिस्तान में यह संख्या 1 करोड़ से 3 करोड़ के बीच थी.
जलवायु घटनाओं से जुड़ी भारी लागत और उनसे उत्पन्न होने वाले क़र्ज़, विकासशील देशों और कमज़ोर आबादी को असमान रूप से प्रभावित करते हैं.