जैव विविधता, महिलाओं और टिकाऊ विकास में स्वयंसेवकों की भूमिका
इस वर्ष अन्तरराष्ट्रीय जैव विविधता दिवस की थीम – “प्रकृति के साथ सदभाव में जीवन यापन और सतत विकास” – एक बेहतर विश्व के निर्माण के लिए मानवता का मार्ग दर्शाती है. लेकिन इस राह में सबसे अधिक प्रभावित वर्ग, विशेषकर महिलाएँ, अक्सर निर्णय लेने की प्रक्रियाओं से बाहर कर दिए जाते हैं. संयुक्त राष्ट्र की एक स्वयंसेविका उर्जस्वी सोंधी, इस खाई को पाटने में महत्वपूर्ण भूमिका निभा रही हैं, और महिलाओं की आवाज़ को नीतिगत चर्चाओं तक पहुँचाने के लिए प्रयासरत हैं.
दुनिया की लगभग 10% प्रजातियों का घर भारत, अब जलवायु परिवर्तन की वजह से बढ़ते ख़तरों से जूझ रहा है. चरम मौसम, बाढ़ और आवासों का क्षरण, न केवल पारिस्थितिक तंत्र को प्रभावित कर रहे हैं, बल्कि उन समुदायों की आजीविका भी ख़तरे में डाल रहे हैं जो पूरी तरह प्राकृतिक संसाधनों पर निर्भर हैं.
इन समुदायों में महिलाएँ सबसे ज़्यादा प्रभावित हैं — लेकिन दुर्भाग्यवश, जलवायु समाधान से जुड़ी निर्णयात्मक प्रक्रियाओं से वो अक्सर बाहर रखी जाती हैं.
पर्यावरणीय न्याय की आवाज़
नई दिल्ली में पली-बढ़ी उर्जस्वी सोंधी ने पहली बार विश्वविद्यालय के एक शोध के दौरान यह देखा कि ग्रामीण महिलाओं को अपनी बात कहने के लिए कितना संघर्ष करना पड़ता है. यह अनुभव उनकी सोच बदलने वाला था.
उर्जस्वी अब एक संयुक्त राष्ट्र स्वेच्छाकर्मी के रूप में, न केवल जलवायु नीतियों में महिलाओं की भागेदारी बढ़ा रही हैं, बल्कि संयुक्त राष्ट्र विकास कार्यक्रम (यूएनडीपी) में, कई जलवायु एवं जैव विविधता परियोजनाओं पर भी काम कर रही हैं.
स्थानीय समाधान, वैश्विक दृष्टिकोण
उर्जस्वी, विशेष रूप से वैश्विक पर्यावरण सुविधा के लघु अनुदान कार्यक्रम को बेहद महत्वपूर्ण मानती हैं — एक ऐसा मंच जो समुदायों को पर्यावरणीय समाधानों की बागडोर स्वयं सम्भालने का अवसर देता है.
उर्जस्वी, नागरिक समाज संगठनों और स्थानीय समुदायों के साथ मिलकर भारत की जलवायु प्राथमिकताओं के अनुरूप परियोजनाओं को दिशा देती हैं और सफल उदाहरणों का प्रलेखन करती हैं.
बाधाएँ और समाधान
समुदायों से संवाद के दौरान उर्जस्वी ने देखा कि भाषाई विविधता और पितृसत्तात्मक मानदंड, महिलाओं की भागेदारी को बाधित करते हैं. इसे बदलने के लिए, उन्होंने ऐसे सुरक्षित स्थानों की व्यवस्था की है जहाँ महिलाएँ अपनी बात खुलकर रख सकें.
अनुवादकों की मदद से भाषाई बाधाओं को हटाया जाता है, और महिला अधिकारियों की उपस्थिति से संवाद अधिक सहज बनता है.
स्थानीय परिवर्तन
वैश्विक पर्यावरण सुविधा के लघु अनुदान कार्यक्रम ने अब तक 50 से अधिक संगठनों को सहयोग दिया है, जिनमें ओडिशा में तटीय समुदायों में मैन्ग्रोव वृक्षारोपण, महाराष्ट्र में वैकल्पिक आजीविका हेतु मसल हार्वेस्टिंग राफ्ट्स और तमिलनाडु में महिलाओं के नेतृत्व में रेतीले तटीय क्षेत्रों में वृक्षारोपण शामिल हैं.
उर्जस्वी बताती हैं, “मैं स्वयंसेवा के माध्यम से इस कार्यक्रम को ज़मीनी स्तर पर कार्यान्वित होते देखने और महिलाओं की भागेदारी सुनिश्चित करने में योगदान कर पा रही हूँ."
"यह कार्यक्रम टिकाऊ खेती को बढ़ावा देने से लेकर पारम्परिक जल निकायों की रक्षा तक, स्थानीय ज्ञान और नेतृत्व में महिलाओं की भागेदारी को बढ़ावा देकर जलवायु सहनसक्षमता बढ़ाने में मदद करता है."
वो कहती हैं, “महिलाओं की कहानियाँ केवल प्रलेखन नहीं, बल्कि नीति निर्माण का हिस्सा हैं.”
भारत में यूएनडीपी की स्थानीय प्रतिनिधि एंजेला लुसिगी ने, स्वयंसेवकों की भूमिका को “राष्ट्रीय विकास और स्थानीय कार्रवाई को जोड़ने वाली कड़ी” बताया.
भारत के युवजन के लिए उनका सन्देश स्पष्ट है: “आप केवल योगदान ही नहीं दे रहे — आप नेतृत्व सीख रहे हैं, अनुभव अर्जित कर रहे हैं, और सतत विकास लक्ष्यों को वहाँ पहुँचा रहे हैं जहाँ उनकी सबसे ज़्यादा ज़रूरत है.”
प्रकृति के साथ सदभाव बनाकर रहना और सतत विकास अपनाना ही एक उज्जवल और समावेशी भविष्य की कुंजी है, और उर्जस्वी सोंधी जैसे स्वयंसेवक इस दिशा में वास्तविक बदलाव का प्रतिनिधित्व करते हैं.
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