विश्व भर में, हर चार में से एक रोज़गार पर, एआई का असर होने की सम्भावना
दुनिया भर में हर चार में से एक रोज़गार, जनरेटिव कृत्रिम बुद्धिमता (एआई) की चपेट में आ सकता है, मगर यह भी अनुमान है कि टैक्नॉलॉजी कर्मचारियों का स्थान लेने के बजाय उनके कामकाज के तौर-तरीक़ों में बड़े बदलाव की वजह बनेगी. अन्तरराष्ट्रीय श्रम संगठन (ILO) के एक नए अध्ययन में निष्कर्ष पेश किया गया है.
जनरेटिव एआई (GenAI) की मदद से स्वनिर्मित लिखित सामग्री, तस्वीरें, संगीत, बड़ी सामग्री का सारांश और सॉफ़्टवेयर कोड जैसी सामग्री तैयार की जा सकती है.
इस टैक्नॉलॉजी की उपलब्धता व इस्तेमाल जैसे-जैसे बढ़ेंगे, उससे कर्मचारियों द्वारा हर दिन किए जाने वाले काम को नए सिरे से ढालने की आवश्यकता होगी.
यूएन श्रम एजेंसी और पोलैंड के राष्ट्रीय शोध संस्थान ने अपने एक साझा अध्ययन में बताया है कि कामकाजी दुनिया में विशाल बदलाव आ रहे हैं, और उनके नतीजतन, रोज़गार सम्बन्धी ज़िम्मेदारियों में बदलाव होंगे, न कि बड़े पैमाने पर रोज़गारों का नुक़सान.
विशेषज्ञों का मानना है कि महिलाओं के लिए व लिपिक-सम्बन्धी (clerical) भूमिकाओं में सबसे बड़े परिवर्तन आने की सम्भावना है, जिसके मद्देनज़र, समावेशी नीतियाँ अपनाए जाने पर बल दिया गया है.
इस अध्ययन के लिए, दुनिया भर में 30 हज़ार रोज़गारों में कर्मचारियों की ज़िम्मेदारियों का सर्वेक्षण, विशेषज्ञ समीक्षा और एआई टैक्नॉलॉजी के ज़रिये आकलन किया गया है, ताकि यह पता लगाया जा सके कि एआई के कारण आने वाले बदलाव का असर किस पर सबसे अधिक होगा.
रिपोर्ट तैयार करने वाले विशेषज्ञों के अनुसार, ऐसे रोज़गार बहुत कम हैं, जिन्हें मौजूदा एआई टैक्नॉलॉजी से पूरी तरह से स्वचालित किया जा सके. जनरेटिव एआई का सम्भावित असर, रोज़गारों में बदलाव हो सकता है.
महिलाओं पर ग़ैर-आनुपातिक असर
रिपोर्ट बताती है कि उच्च-आय वाले देशों में, जिन रोज़गारों पर एआई टैक्नॉलॉजी से स्वचालन (automation) का सबसे अधिक जोखिम है, वे कुल महिला रोज़गारों का 9.6 प्रतिशत है, जोकि पुरुषों की हिस्सेदारी की तुलना में क़रीब तीन गुना अधिक है.
विश्व भर में, महिलाओं के कुल रोज़गारों का 4.7 प्रतिशत हिस्सा, अधिक जोखिम वाली इस श्रेणी में है, जबकि पुरुषों के लिए यह आँकड़ा 2.4 प्रतिशत है.
ILO का कहना है कि इस विसंगति की एक बड़ी वजह यह है कि लिपिक-विषयक और प्रशासनिक भूमिकाओं में महिलाओं का प्रतिनिधित्व अधिक है, और इन्हीं के एआई की चपेट में आने की आशंका भी अधिक है.
इन रोज़गारों में दस्तावेज़, लिखित सामग्री को सही ढाँचे में ढाला जाता है, बैठकें निर्धारित की जाती हैं, डेटा को कम्पयूटर में जमा किया जाता है. इन सभी को एआई टैक्नॉलॉजी के ज़रिये दक्षतापूर्वक किया जा सकता है.
इन भूमिकाओं के पूरी तरह से ख़त्म हो जाने की सम्भावना नहीं है, मगर रिपोर्ट में आगाह किया गया है कि आंशिक स्वचालन होने से रोज़गार की गुणवत्ता घट सकती है. कर्मचारियों के दायित्व में कमी आएगी, आय वृद्धि रुक जाएगी और असुरक्षा बढ़ेगी.
लक्षित प्रशिक्षण या फिर भूमिकाओं को नए सिरे से तैयार नहीं किए जाने से, कुछ कर्मचारियों, विशेष रूप से महिलाओं के पास ढलने के लिए सीमित अवसर होंगे.
विश्व भर में असमान तस्वीर
उच्च-आय वाले देशों में, कुल रोज़गारों के 34 प्रतिशत हिस्से पर, जनरेटिव एआई का असर हो सकता है, जबकि निम्न-आय वाले देशों में यह केवल 11 फ़ीसदी है.
मध्य-आय वाले क्षेत्रों, जैसेकि लातिन अमेरिका और एशिया के कुछ हिस्सों में हालात, इन दोनों के बीच में हैं.
योरोप और मध्य एशिया में लैंगिक रूप से विसंगति सबसे अधिक है, जिसकी वजह लिपिक-विषयक भूमिकाओं में महिला कर्मचारियों की अधिक संख्या है. साथ ही, इन क्षेत्रों में व्यापक स्तर पर डिजिटल टैक्नॉलॉजी को अपनाया जा रहा है.
वहीं, सब-सहारा अफ़्रीका, दक्षिण एशिया और अरब देशों में जनरेटिव एआई की चपेट में आने वाले रोज़गारों का प्रतिशत कम है, मगर यदि बिना रक्षा उपायों के आगे बढ़ा गया, तो इससे यहाँ के श्रम बाज़ारों में बड़ा व्यवधान देखने को मिल सकता है.
ठोस क़दमों पर बल
यूएन श्रम एजेंसी ने सभी देशों की सरकारों, नियोक्ताओं (employers) और कामगार संगठनों से आग्रह किया है कि जनरेटिव एआई से आने वाले बदलावों में कर्मचारियों को हटाने के बजाय उन्हें समर्थन दिया जाना होगा.
इसके तहत, डिजिटल कौशल विकास व प्रशिक्षण की सुलभता बढ़ानी होगी, विशेष रूप से महिलाओं और उन कर्मचारियों के लिए, जो क्लर्क या अन्य प्रशासनिक भूमिकाओं में हैं.
ILO ने कहा है कि श्रम बाज़ार और शिक्षा नीतियों से एआई योजनाओं को एकीकृत किया जाना होगा. और कर्मचारियों को बदलाव के लिए तैयार करनेके इरादे से तकनीकी प्रशिक्षण, अनुकूल बुनियादी ढाँचा, आधुनिक पाठ्यक्रम और नियोक्ताओं की आवश्यकताओं व राष्ट्रीय नीतियों के बीच तालमेल आवश्यक है.
रिपोर्ट में, जनरेटिव एआई से हो रहे बदलाव की प्रक्रिया में समावेशी सामाजिक संवाद पर भी बल दिया गया है. जनरेटिव का कार्यस्थल पर कितना इस्तेमाल किया जाए, इस विषय में कर्मचारियों की भी राय ली जानी चाहिए और उनके अनुभवों को समझ कर ही निर्णय लिए जाने होंगे.