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कोविड-19 के बाद, सम्पन्न देशों में बच्चों की शिक्षा व स्वास्थ्य पर हुआ गम्भीर असर

कक्षा में एक मेज पर दो युवतियां कागजों पर लिख रही हैं।
Unsplash/Jeswin Thomas कोविड-19 के फैलाव को रोकने के लिये स्कूलों को बन्द कर दिया गया जिसके कारण छात्र वर्ष 2020 में परीक्षाएँ नहीं दे पाएँ.

कोविड-19 के बाद, सम्पन्न देशों में बच्चों की शिक्षा व स्वास्थ्य पर हुआ गम्भीर असर

संस्कृति और शिक्षा

कोविड-19 महामारी के बाद, दुनिया के सबसे सम्पन्न देशों में, बच्चों के मानसिक कल्याण, शैक्षिक प्रदर्शन, और शारीरिक विकास में गिरावट दर्ज की गई है. UNICEF का एक नया अध्ययन बताता है कि बच्चे स्कूलों में आशा से कम प्रदर्शन कर रहे हैं, उनके मोटापे की चपेट में आने की आशंका बढ़ी है और वो आम तौर पर अपने जीवन से प्रसन्न नहीं हैं. 

इटली के इनोचैंटी में स्थित वैश्विक शोध कार्यालय के इस अध्ययन में वर्ष 2018 और 2022 के आँकड़ों की तुलना की गई है. 

Report Card 19: Child Wellbeing in an Unpredictable World शीर्षक वाले इस विश्लेषण में, कोविड-19 महामारी के दौरान वैश्विक तालाबन्दियों के कारण योरोपीय संघ और आर्थिक सहयोग एवं विकास संगठन (OECD) के सम्पन्न देशों में रहने वाले बच्चों पर प्रभाव पर जानकारी दी गई है. 

ऐसी ही एक अन्य रिपोर्ट पाँच वर्ष पहले प्रकाशित की गई थी.

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उसके बाद से अब तक नैदरलैंड्स और डेनमार्क ने अपना शीर्ष स्थान बरक़रार रखा है. मानसिक कल्याण, शारीरिक स्वास्थ्य, कौशल की दृष्टि से, एक बच्चे के रहने के लिए वे सर्वोत्तम देश हैं, जिनके बाद फ़्राँस का स्थान है.

इसके बाद, पोर्तुगल, आयरलैंड व स्विट्ज़रलैंड का स्थान है.

मगर, रिपोर्ट में आगाह किया गया है कि वैश्विक महामारी के बाद अनेक देशों को बच्चों के अकादमिक कौशल में गिरावट का अनुभव करना पड़ा है. उनके पढ़ने, गणित जैसे विषयो में बुनियादी क्षमता पर असर हुआ है.

कोविड-19 महामारी का प्रकोप जनवरी 2020 में शुरू हुआ, जिसके बाद धीरे-धीरे इस बीमारी ने दुनिया भर में देशों को अपनी चपेट में ले लिया था. इससे बचाव के लिए तालाबन्दी उपाय को अपनाया गया और स्कूल, कॉलेज और विश्वविद्यालयों को पूरी तरह से बन्द कर दिया गया.

पढ़ाई में पिछड़े बच्चे

तीन से 12 महीने के लिए स्कूलों में शैक्षणिक कार्य ठप हो जाने की वजह से बच्चों को दूर रहकर, घर से ही पढ़ाई-लिखाई करनी पड़ी और उन्हें इसका नुक़सान उठाना पड़ा और वे पिछड़ते चले गए.

एक अनुमान के अनुसार, बच्चे औसतन सात महीने से लेकर एक वर्ष तक शिक्षा में पीछे चल रहे हैं. सबसे अधिक ख़ामियाज़ा उन परिवारों के बच्चों को भुगतना पड़ा है, जो पहले से ही कठिनाई में गुज़र-बसर कर रहे थे.

यूनीसेफ़ इनोचैंटी कार्यालय के निदेशक बो विक्टर निलुंड ने कहा कि वैश्विक महामारी से पहले भी, बच्चों को अनेक मोर्चों पर जूझ पड़ रहा था. सम्पन्न देशों में भी उनके पास उपयुक्त समर्थन नहीं था.

“अब बढ़ती आर्थिक अनिश्चितता के दौर में, देशों को बच्चों की शिक्षा, स्वास्थ्य व कल्याण को प्राथमिकता देनी होगी ताकि उनके जीवनकाल में सम्भावनाओं और ख़ुशियों को सुनिश्चित किया जा सके. साथ ही, हमारे समाजों की आर्थिक सुरक्षा को भी.”

अध्ययन दर्शाता है कि 43 देशों में, 15 वर्ष की आयु वाले 80 लाख बच्चे उपयुक्त स्तर पर साक्षर नहीं हैं और न ही वे गिनती और हिसाब में पारंगत हैं. उनके लिए लिखे हुए समझना आसान नहीं है, जिससे उनके भविष्य के प्रति चिन्ता है.

स्वास्थ्य पर असर

इस आयु वर्ग में कुल बच्चों की यह आधी संख्या है. वर्ष 2018 की तुलना में यह चार प्रतिशत की वृद्धि को दर्शाता है. बुल्गारिया, कोलम्बिया, कोस्टा रीका, साइप्रस, मैक्सिको में इनका अनुपात सबसे अधिक है, जहाँ 15 वर्ष आयु वर्ग में दो-तिहाई से अधिक बच्चे इस श्रेणी में हैं.

रिपोर्ट में बच्चों के मानसिक स्वास्थ्य पर भी चिन्ता जताई गई है. विशेषज्ञों का मानना है कि जीवन के प्रति बच्चों की संतुष्टि का स्तर इससे प्रभावित हो रहा है.

32 में 14 देशों में इसमें गिरावट आई है. केवल जापान में ही इस क्षेत्र में बेहतरी देखने को मिली है.

कोविड-19 के बाद से बच्चों के शारीरिक स्वास्थ्य पर भी असर हुआ है और आवश्यकता से अधिक वज़न वाले बच्चों की संक्या, 43 में से 14 देशों में काफ़ी हद तक बढ़ी है.

रिपोर्ट में सचेत किया गया है कि उच्च-आय वाले देशों में बच्चों के लिए एक बेहतर बचपन और सकारात्मक भविष्य सुनिश्चित कर पाना चुनौतीपूर्ण होता जा रहा है.

अध्ययन के अनुसार, सम्पन्न देशों में बच्चों के स्वास्थ्य-कल्याण में कड़ी मेहनत से दर्ज की गई प्रगति अब जलवायु परिवर्तन समेत अन्य वैश्विक चुनौतियों की पृष्ठभूमि नाज़ुक हालात में पहुँच रही है.