वैश्विक परिप्रेक्ष्य मानव कहानियां

भारत की भगवद गीता और नाट्यशास्त्र, यूनेस्को के 'विश्व स्मृति रजिस्टर' में शामिल

भारत की भगवद गीता और भरत के नाट्यशास्त्र की पांडुलिपियों को उनके सांस्कृतिक महत्व के लिए, यूनेस्को के विश्व स्मृति रजिस्टर में शामिल किया गया है.
© Bhandarkar Oriental Research Institute
भारत की भगवद गीता और भरत के नाट्यशास्त्र की पांडुलिपियों को उनके सांस्कृतिक महत्व के लिए, यूनेस्को के विश्व स्मृति रजिस्टर में शामिल किया गया है.

भारत की भगवद गीता और नाट्यशास्त्र, यूनेस्को के 'विश्व स्मृति रजिस्टर' में शामिल

संस्कृति और शिक्षा

भारत के धार्मिक ग्रन्थ ‘भगवद गीता’ और ‘नाट्यशास्त्र’ को इस वर्ष यूनेस्को के विश्व स्मृति रजिस्टर, ('Memory of the World' Register) में शामिल किया गया है. पिछले सप्ताह जोड़े गए 74 नए प्रलेखित विरासत संग्रह के साथ अब पंजीकृत संग्रहों की कुल संख्या 570 हो गई है.

यह रजिस्टर, पुस्तकों, पांडुलिपियों, मानचित्रों, फोटो, ध्वनि या वीडियो रिकॉर्डिंग जैसी प्रलेखित विरासत की रक्षा करता है, और यह सुनिश्चित करता है कि मूल्यवान अभिलेखागार और पुस्तकालय संग्रह संरक्षित एवं सुलभ हों.

इस वर्ष यूनेस्को के ‘मेमोरी ऑफ़ द वर्ल्ड' रजिस्टर के लिए, 72 देशों और 4 अन्तरराष्ट्रीय संगठनों से प्रविष्टियाँ हासिल हुईं.

एक स्वतंत्र अन्तरराष्ट्रीय सलाहकार समिति द्वारा प्रविष्टियों के मूल्यांकन के बाद, यूनेस्को के कार्यकारी बोर्ड के अन्तिम निर्णय के बाद, संग्रहों को रजिस्टर में जोड़ा जाता है.

Tweet URL

भारत की प्राचीन धरोहर

इस वर्ष भारत की भगवद गीता और भरत के नाट्यशास्त्र की पांडुलिपियों को उनके सांस्कृतिक महत्व के लिए मान्यता दी गई है.

भगवद गीता, 18 अध्यायों का एक पवित्र संस्कृत ग्रंथ है, जिसमें 700 श्लोक हैं. यह प्राचीन भारतीय परम्परा का एक बहुत महत्वपूर्ण ग्रंथ है, जो महाभारत के युद्ध के समय अर्जुन और कृष्ण के बीच संवाद के ज़रिए, आध्यात्मिक और नैतिक मार्गदर्शन प्रदान करता है.

वहीं 36 हज़ार श्लोकों से युक्त भरत का नाट्यशास्त्र, प्रदर्शन कला पर एक प्राचीन संस्कृत ग्रंथ, है. यह मूलभूत ग्रंथ, नाटक, प्रदर्शन, सौंदर्य अनुभव, भावना और संगीत को परिभाषित करता है. 

नाट्यशास्त्र में दी गई "रस" (सौंदर्य अनुभव) की अवधारणा, भारतीय कला और संस्कृति की नींव रही है.

इसके साथ ही अब विश्व स्मृति रजिस्टर में शामिल भारत के संग्रहों की संख्या बढ़कर 14 हो गई है, जिनमें ऋग्वेद, शैव पांडुलिपियाँ और तमिल चिकित्सा पांडुलिपि संग्रह जैसी अहम विरासत शामिल है.

इसके अलावा, दक्षिण एशिया से श्रीलंका के पनाडुरा वाद्य (Pānadurā Vādaya (The Great Debate of Panadura) और चीन व श्रीलंका द्वारा प्रस्तुत त्रिभाषी शिलालेख (त्रिभाषासेलिपिया) भी इसमें शामिल किया गया है.

पनाडुरा वाद्य (Pānadurā Vādaya)19वीं सदी के मध्य में बौद्धों और ईसाइयों के बीच धार्मिक मतभेद की पृष्ठभूमि में रचित पुस्तक है, जिसमें ईसाई और बौद्ध नेताओं के बीच सैद्धान्तिक मुद्दों पर खुले संवाद की वकालत करते पत्राचार के साथ-साथ सम्पूर्ण संवाद का प्रतिलेखन भी शामिल है.

वहीं त्रिभाषी शिलालेख, एक पत्थर पट्टिका है, जिस पर चीनी, फ़ारसी और तमिल में बुद्ध, भगवान विष्णु और अल्लाह की स्तुति की गई है.

विश्व धरोहर सहेजने का मंच

Tweet URL

 UNESCO की महानिदेशक ऑड्रे अज़ूले ने इस अवसर पर कहा, “लिखित विरासत, मानवता की स्मृति का एक आवश्यक, लेकिन नाज़ुक तत्व है. यही कारण है कि यूनेस्को उसके संरक्षण में निवेश करता है, सर्वोत्तम प्रथाएँ परस्पर साझा करता है और मानव इतिहास की सबसे अहम प्रतिलिपियों को इस रजिस्टर में दर्ज करके संरक्षित करता है."

"मॉरिटानिया में चिंगुएट्टी के पुस्तकालय या Côte d’Ivoire में अमादौ हैम्पेटे बा के अभिलेखागार, इसके कुछ उदाहरण हैं.”

नवीन पंजीकृत संग्रहों में से चौदह वैज्ञानिक दस्तावेज़ विरासत से सम्बन्धित हैं.

इतहाफ़ अल-महबूब (मिस्र द्वारा प्रस्तुत) हमारे युग की पहले सहस्राब्दी के दौरान खगोल विज्ञान, ग्रहों की गति, खगोलीय पिंडों और ज्योतिषीय विश्लेषण में अरब दुनिया के योगदान का प्रलेखन किया गया है. 

साथ ही, चार्ल्स डार्विन (ब्रिटेन), फ्रैडरिक नीत्शे (जर्मनी), विल्हेल्म कॉनराड रॉन्टजेन (जर्मनी) द्वारा पहली बार दर्ज किए एक्स-रे के फोटो और रोग अनुसंधान में अग्रणी कार्लोस चागास (ब्राज़ील) के अभिलेखागार भी शामिल किए गए हैं.

इसके अलावा, दासता की स्मृति से जुड़े कुछ संग्रह भी शामिल किए गए हैं, जो अंगोला, अरूबा, केप वर्डे, कुराकाओ और मोज़ाम्बिक द्वारा प्रस्तुत किए गए थे. 

साथ ही साथ कुछ ऐतिहासिक महिलाओं से सम्बन्धित अभिलेखागार भी शामिल हैं. इनमें लड़कियों की शिक्षा में अग्रणी, रेडेन अजेंग कार्तिनी (इंडोनेशिया और नेदरलैंड), लेखक कैथरीन मैन्सफील्ड (न्यूज़ीलैंड), और ट्रैवल लेखक अन्नेमारी श्वार्जेनबाक व एला मैलार्ट (स्विट्जरलैंड).

कई संग्रह ऐसे भी हैं जिनमें अन्तरराष्ट्रीय सहयोग के महत्वपूर्ण क्षणों को दर्ज किया गया है. 

इनमें जिनीवा कन्वेंशन (1864-1949) और उसके प्रोटोकॉल (1977-2005) (स्विट्जरलैंड), मानवाधिकारों की सार्वभौमिक घोषणा (संयुक्त राष्ट्र), और 1991 विंडहोएक घोषणापत्र (नामीबिया) शामिल हैं.

विश्व स्मृति कार्यक्रम

1992 में स्थापित, विश्व की स्मृति कार्यक्रम का उद्देश्य, मानवता की लिखित या दर्ज विरासत के संरक्षण और सार्वभौमिक पहुँच को बढ़ावा देना है. अक्सर अत्यधिक संवेदनशील होने के कारण इस विरासत के ख़राब होने या आपदाओं के सम्पर्क से नष्ट होने का ख़तरा रहता है.

ऐसे में UNESCO के विश्व स्मृति कार्यक्रम के तहत, देशों को संरक्षण नीतियाँ विकसित करने में मदद की जाती है, संग्रह के डिजिटलीकरण के लिए स्मृति संस्थानों को प्रशिक्षण और वित्तीय सहायता प्रदान की जाती है, और शैक्षिक निकायों के साथ मिलकर हमारे अतीत के इन आवश्यक तत्वों को स्कूल पाठ्यक्रम में एकीकृत किया जाता है, जिससे उन्हें आने वाली पीढ़ियों तक पहुँचाया जा सके.

दक्षिण एशिया से चीन व श्रीलंका द्वारा प्रस्तुत, त्रिभाषी शिलालेख (त्रिभाषासेलिपिया) और श्रीलंका का पनाडुरा वाद्य (Pānadurā Vādaya (The Great Debate of Panadura) को भी यूनेस्को के विश्व स्मृति रजिस्टर में जगह मिली है.
© National Museums, Colombo/ Buaddhaloka Foundation