वैश्विक परिप्रेक्ष्य मानव कहानियां
जयपुर फ़ुट, ख़ासतौर पर युद्धग्रस्त क्षेत्रों में विकलांगों के लिए वरदान साबित हुआ है.

भारत का जयपुर फ़ुट – विकलांगों के कल्याण के लिए बढ़ते क़दम

© UNDP India/Gaurav Menghaney जयपुर फ़ुट, ख़ासतौर पर युद्धग्रस्त क्षेत्रों में विकलांगों के लिए वरदान साबित हुआ है.

भारत का जयपुर फ़ुट – विकलांगों के कल्याण के लिए बढ़ते क़दम

एसडीजी

भारत के जयपुर फ़ुट के नाम से मशहूर संस्था, वर्षों से विकलांगों को सुलभ व निशुल्क कृत्रिम अंग उपलब्ध कराती रही है.  भारत में संयुक्त राष्ट्र विकास कार्यक्रम (UNDP), इस संस्था को, दुनिया भर के युद्धग्रस्त क्षेत्रों में अंगहीन लोगों की मदद करने के लिए, हाल ही में अपने प्रकाशन ‘Inspiring India’ में जगह दी और इसके निस्वार्थ, उज्जवल सफ़र की सराहना की.

हरियाणा के जीन्द से एक युवा गृहिणी अंजू, झुलसाने वाले गर्मी की दोपहर में, जयपुर में भगवान महावीर विकलांग सहायता समिति (BMVSS) केन्द्र में पहुँची हैं. एक दशक में यह उनका तीसरा चक्कर है. पहली बार वो यहाँ तब आई थीं, जब एक सड़क दुर्घटना में उन्होंने अपना एक पैर खो दिया था. वो एक कच्ची सड़क पर चल रही थीं कि तभी एक कार तेज़ी से उनके पास से गुज़री.

वो उस घटना को याद करते हुए सिहर उठती हैं, "मेरा पैर कटकर एक तरफ़ गिर गया."  उसके बाद उनके विकलांग देवर ने उन्हें जयपुर जाकर, प्रसिद्ध जयपुर फुट से पैर फ़िट करवाने का रास्ता दिखाया. उन्हें हर तीन या चार साल में, यह कृत्रिम अंग बदलने की आवश्यकता पड़ती है. इस बार पूरी प्रक्रिया में केवल चार घंटे लगेंगे और यह एकदम नि:शुल्क है.

BMVSS जयपुर स्थित एक ग़ैर-लाभकारी संगठन है जिसने शहर के (या कहें कि देश के) सबसे बड़े सामाजिक आविष्कार को दुनिया भर में सुलभ बना दिया. 

1997 में, टाइम पत्रिका ने इसका उल्लेख करते हुए लिखा था, "अफ़ग़ानिस्तान से रवांडा तक, दुनियाभर के युद्ध क्षेत्रों में रहने वाले लोगों ने भले ही कभी न्यूयॉर्क या पेरिस के बारे में नहीं सुना हो, लेकिन वो भारत के उत्तरी शहर जयपुर से भली-भाँति परिचित होंगे.

यह शहर जयपुर, अशान्त क्षेत्रों में एक असाधारण प्रोस्थेसिस, यानि कृत्रिम अंग के जन्मस्थान के रूप में प्रसिद्ध है. इसे ‘जयपुर फ़ुट’ के नाम से जाना जाता है, जिसने बारूदी सुरंगों से विकलांग हुए लाखों लोगों के जीवन को बेहतर बनाने में क्रान्ति ला दी है."

जयपुर फ़ुट की एक लाभार्थी.
© UNDP India/Gaurav Menghaney जयपुर फ़ुट की एक लाभार्थी.

जयपुर फ़ुट की शुरुआत

यह सब 60 के दशक में शुरू हुआ जब जयपुर में एक डॉक्टर और एक स्थानीय कारीगर ने साथ मिलकर काम शुरू किया: डॉक्टर प्रमोद करण सेठी, जयपुर के सवाई मान सिंह अस्पताल में एक आर्थोपेडिक सर्जन थे; वहीं रामचंद्र शर्मा एक अशिक्षित मूर्तिकार थे, जो कुष्ठ रोग से पीड़ित व्यक्तियों को हस्तशिल्प बनाने की शिक्षा देते थे.

डॉक्टर प्रमोद सेठी ने, अस्पताल में अपने काम के दौरान महसूस किया कि वह अपने मरीज़ों को जो solid-ankle-cushion-heel (SACH) वाला कृत्रिम पैर लगवाने की सलाह दे रहे थे, वो भारतीयों के लिए अनुपयुक्त था क्योंकि वे अक्सर फ़र्श पर बैठते हैं और जूतों के बिना चलते हैं.

तब उन्होंने रामचंद्र शर्मा से सम्पर्क किया और उन्हें पैर की गतिविधियों व दबाव बिन्दुओं के बारे में जानकारी दी. ये दोनों इच्छुक पेशेवर, दो साल विभिन्न सामग्रियों के साथ प्रयोग करके एक आदर्श प्रोस्थेटिक बनाने के प्रयास करते रहे. फिर एक दिन,जब रामचंद्र शर्मा अपनी साइकिल के टायर का पंक्चर लगवा रहे थे जब उन्हें विचार आया कि वो क्यों ना, रबर का एक पैर बनाएँ.

हालाँकि, रबर आसानी से फट जाता है. लेकिन लकड़ी के अंग पर रबर जोड़कर, फिर उसे हल्के रबर में लपेटकर, वल्केनाइज्ड करने से यह काम कर गया.

डॉक्टर प्रमोद सेठी ने, 1971 में ऑक्सफोर्ड में ब्रिटिश आर्थोपेडिक सर्जनों के सामने, औपचारिक रूप से जयपुर फ़ुट प्रस्तुत किया. लेकिन अधिकतर लोगों को इसकी प्रभावशीलता के बारे में सन्देह था. यही वजह थी कि 1975 तक, इसे केवल 59 लोगों ने उपयोग किया व अपनाया था.

उसी वर्ष, एक वरिष्ठ नौकरशाह देवेंद्र राज मेहता ने BMVSS की स्थापना की, जो बाद में में रिज़र्व बैंक ऑफ इंडिया के डिप्टी गवर्नर भी बने थे.

यह समय था जब जयपुर फ़ुट, भारत में अपनी पहचान बना रहा था.

जयपुर फ़ुट के शोध विभाग के प्रमुख, डॉक्टर मेहता.
© UNDP India/Gaurav Menghaney

युद्धरत क्षेत्रों में लोगों के लिए वरदान

1979 में सोवियत-अफ़ग़ान युद्ध छिड़ गया. रूसी लैंडमाइंस से हज़ारों अफ़ग़ान घायल हो रहे थे. इनमें बहुत बच्चे भी शामिल थे.

जयपुर फ़ुट के साथ शुरुआत से ही जुड़े, इसकी तकनीकी शाखा के प्रमुख डॉक्टर एम के माथुर बताते हैं, "हमने अफ़गानिस्तान में अपना पहला सबक़ सीखा. भारत के मुक़ाबले अफ़ग़ानिस्तान में मरीज़ों को पहाड़ी इलाक़ों में अधिक चढ़ाई करनी पड़ती थी. अफ़ग़ान लोगों ने हमें बताया कि उन्हें ख़ासतौर पर नीचे उतरने में कठिनाई होती है, वो लड़खड़ाते और गिर जाते थे. इसके लिए हमने घुटने के जोड़ में एक लॉक प्रणाली विकसित करके, उसे अधिक स्थिर बनाने की कोशिश की.

तब से अब तक, BMVSS, दशकों से अफग़ानिस्तान में, युद्धों के दौरान अपनी टीमें भेजता रहा है. इसके अलावा, अफ़ग़ानिस्तान के राष्ट्रीय विकलांगता संस्थान के साथ एक समझौते पर भी हस्ताक्षर किए हैं, जिसके तहत हर महीने भारत में प्रशिक्षित विशेषज्ञों को 70 से 100 कृत्रिम अंग बनाने की ज़िम्मेदारी दी जाती है.

जयपुर फ़ुट, जो दुनिया भर में बनाना और ख़ासतौर पर युद्ध प्रभावित क्षेत्रों के अनुकूल बनाना आसान है, सांस्कृतिक रूप से भी अफ़ग़ान लोगों के लिए सुविधाजनक था, क्योंकि भारतीयों की तरह वो भी फ़र्श पर बैठते हैं.

दुनिया के दूसरी ओर, 1979 की सैंडिनिस्टा क्रान्ति में, निकारागुआ के 2,500 से अधिक लोग युद्ध में घायल हुए, जिनमें से बहुत से लोगों के अंग काटने पड़े. 

नई तकनीकों से एक मैट पर चलाकर, विकलांग व्यक्ति के अंग की सम्पूर्ण गतिविधियाँ दर्ज की जाती हैं, जिससे उसमें तुरन्त संशोधन करना सम्भव होता है.
© UNDP India/Gaurav Menghaney

1990 में निकारागुआ को जयपुर फ़ुट से परिचित करवाया गया, और न्यूयॉर्क टाइम्स के अनुसार, यह एक तरह से "इसके विस्तार की योजना का परीक्षण स्थल" बन गया, जहाँ से इसे "लातीनी अमेरिका के बाक़ी हिस्सों और युद्ध से तबाह अन्य ग़रीब क्षेत्रों में भेजा जाने लगा, जहाँ पर्याप्त चिकित्सा उपलब्ध नहीं थी."

जयपुर फ़ुट को सर्वजन के लाभ के लिए बनाया गया था. रबर, लकड़ी और ऐल्यूमीनियम से बने इसके शुरुआती संस्करण, अन्य देशों में स्थानीय रूप से उपलब्ध सामग्रियों का उपयोग करके भी बनाए जा सकते थे.

टाइम पत्रिका के एक लेख में बताया गया, "अफ़ग़ानिस्तान में कारीगर, कृत्रिम पैर बनाने के लिए, फटे हुए तोप के गोलों की धातु का इस्तेमाल करते हैं. कम्बोडिया में कृत्रिम पैर में लगाई गई रबर का कुछ हिस्सा ट्रकों के टायरों से लिया जाता है. वहाँ लगभग हर 380 लोगों में से 1 व्यक्ति युद्ध में विकलांग हुआ है."

नवाचार से बदलता स्वरूप

जयपुर फ़ुट में तब से अब तक काफ़ी बदलाव आया है. इसकी अनुकूलन क्षमता ही इसकी विशेषता है. 

इसकी तकनीक लगातार विकसित होती रही है, और भारत और दुनिया के सर्वश्रेष्ठ अनुसंधान संस्थानों - भारतीय अंतरिक्ष अनुसंधान संगठन (ISRO), स्टैनफोर्ड विश्वविद्यालय और मैसाचुसेट्स प्रौद्योगिकी संस्थान (MIT) ने इसमें विशेष योगदान दिया है.

अब इसका अधिकांश कार्य केन्द्र की दो प्रयोगशालाओं में किया जाता है. 2012 में, नासा की मदद से, एक स्वर्ण-मानक गैट लैब स्थापित किया गया. 

जयपुर फ़ुट ने अनेक विकलांगजन को आत्मनिर्भर बनने में मदद की है.
@ UNDP India/Gaurav Menghaney

उत्कृष्टता की मिसाल

अब यह प्रयोगशाला अनुसंधान के लिए समर्पित है और पिछले वर्ष एक नई प्रयोगशाला ख़रीदी गई है. 

BMVSS में अनुसंधान के प्रमुख डॉक्टर दीपेंद्र मेहता ने बताया, “पुरानी गैट लैब में प्रति रोगी 3.5 घंटे लगते थे, लेकिन अब 15 मिनट में हमारा तकनीशियन यह जानकारी प्राप्त कर सकता है कि नया अंग दूसरे अंग जैसा ही अच्छा है या नहीं. वे कूल्हे की गति, मुद्रा, घुटनों के बराबर मुड़ने की क्षमता को माप सकते हैं...इससे तुरन्त सुधार करना सम्भव होता है.”

जयपुर फ़ुट, अंगहीन व्यक्तियों को सभी सामान्य गतिविधियाँ पहले की ही तरह करने में सक्षम बनाता है.