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आदर्श रामानंद विद्यालया के छात्र और कर्मचारी अपने विद्यालय भवन के सामने अपने बीएसवीपी पुरस्कार प्रमाण पत्र पकड़े हुए एक तस्वीर के लिए पोज दे रहे हैं।

भारत: लड़कियों के लिए सुरक्षित सहेली कक्ष

© UNICEF India आदर्श रामानंद विद्यालय, बिहार स्वच्छ विद्यालय पुरस्कार के 54 विजेताओं में से एक है.

भारत: लड़कियों के लिए सुरक्षित सहेली कक्ष

महिलाएँ

भारत में यूनीसेफ़ ने, बिहार के विद्यालयों में लड़कियों के लिए माहवारी के दिनों में देखभाल व आराम के लिए सहेली कक्ष स्थापित किए हैं. इन सुरक्षित स्थानों की उपलब्धता से ना केवल मासिक धर्म को लेकर जागरूकता बढ़ी है, बल्कि लड़के भी इस सुरक्षित स्थान का महत्व समझते हुए, स्कूलों में बदलाव का हिस्सा बन रहे हैं.

भारत के पूर्वी प्रदेश बिहार में आदर्श रामानन्द मिडिल स्कूल की चौदह वर्षीय छात्रा कृतिका, हाल ही में अपना पुराना स्कूल छोड़कर नए स्कूल में दाख़िल हुई है.

अपनी कक्षा के बाहर खड़ी कृतिका के मन में उत्साह और बैचेनी के मिले-जुले भाव हैं – जहाँ उन्हें नए स्कूल में जाने का उत्साह है, वहीं पुराना स्कूल छोड़ने का दुख भी है.

हालाँकि यह बैचेनी पुराने दोस्तों या शिक्षकों से बिछुड़ने की वजह से नहीं हैं.

उनके ज़्यादातर सहपाठी तो नए स्कूल में उनके साथ ही होंगे. इस स्कूल में ऐसा कुछ ख़ास है, जो शायद अब कृतिका को दूसरी जगह न मिले – वो है सुरक्षा.

कृतिका बताती हैं, "यह स्कूल मुझे सुरक्षा देता है. मैं यहाँ सुरक्षित महसूस करती हूँ. ऐसी सुरक्षा का अहसास नए स्कूल में नहीं होगा."

पहले वो बताने में थोड़ा हिचकिचाती हैं, फिर असमंजस दूर करते हुए खुलकर कहती हैं, "दरअसल मैं इस समय जिस स्कूल में जाती हूँ, वहाँ सहेली कक्ष नहीं है – यानि वो कमरा जो हमारा अपना हो. एक ऐसी जगह जो हमें माहवारी के दिनों में सुरक्षा का अहसास दिलाए."

स्कूल यूनिफॉर्म पहने एक लड़की सैनिटरी पैड बेचने वाली मशीन चला रही है।
© UNICEF India

लेकिन हमारी ज़िन्दगी तो एक सफ़र की तरह है, जो किसी के लिए नहीं रुकता. कृतिका को अपने जीवन का नया पड़ाव तय करना ही होगा.

फिर भी उनके नए स्कूल में सहेली कक्ष नहीं है, यह सोचकर ही उन्हें सिहरन होने लगती है.

वो अपनी सहेलियों से कहती है, "शायद मुझे यह स्वीकार करना होगा कि मेरे नए स्कूल में सहेली कक्ष नहीं है. वहाँ कोई मुझे भरोसा देने वाले नहीं होंगे, सुरक्षा का अहसास नहीं होगा, किसी को मेरी परवाह नहीं होगी. काश! मैं हमेशा के लिए यहाँ रह पाती, लेकिन मुझे जाना तो पड़ेगा ही. यही जीवन है."

वो एक ऐसी दुनिया की कल्पना करती हैं जहाँ हर स्कूल में एक सहेली कक्ष हो, जहाँ लड़कियों को अपने सपने पूरे करने के लिए सहूलियतें न छोड़नी पड़ें.

बदलाव की बयार

उनकी माँ सीता देवी ने इस बदलाव को अपनी आँखों से देखा है. वो मुस्कुराते हुए बताती हैं, "पहले कृतिका महीने में तीन-चार दिन स्कूल नहीं जा पाती थी. अब वो हर दिन जाती है. सहेली कक्ष एक वरदान की तरह है. लड़कियाँ अब इन मुद्दों के बारे में बिना शर्म, खुलकर बात करती हैं."

अब कक्षा में अनुपस्थिति की वजह सुबह की धुंध की तरह ग़ायब हो गई है, और उसकी जगह ख़ुशमिज़ाजी व शिक्षा ने ले ली है.

सीता मुस्कुराती हैं, "अब तो लड़के भी संवेदनशीलता को समझते हैं."

यूनीसेफ़ की पहल

कृतिका की दोस्त स्वीटी कुमारी ने चमकती आँखों से बताया, "यूनीसेफ़ के आने से सब कुछ बदल गया. सहेली कक्ष, साफ़-सुथरे शौचालय, हाथ धोने की जगह - ऐसा लगता है कि हम किसी बड़े बदलाव का हिस्सा हैं."

वहीं एक लड़के, हीरादान कुमार ने शर्मीली मुस्कान के साथ बताया: "मुझे इस स्कूल पर गर्व है. हम दो शौचालयों से पंद्रह शौचालयों पर पहुँच गए हैं. मुझे ख़ुशी है कि कोई भी समस्या होने पर लड़कियों के पास अब अपना सुरक्षित कोना है. अब उन्हें तबीयत ख़राब होने पर घर भागने की या हर माह तीन-चार दिन स्कूल से बाहर रहने की ज़रूरत नहीं पड़ती.”

अंकित कुमार बताते हैं, "हर कक्षा के बाहर साफ़ पानी का एक ड्रम रखा हुआ है. अब प्यास की वजह से पढ़ाई में बाधा नहीं आती."

इस बदलाव का जादू ही है जिससे आदर्श रामानन्द विद्यालय को बिहार स्वच्छ विद्यालय पुरस्कार (BSVP) प्राप्त हुआ. यह एक पुरस्कार मात्र नहीं है – बल्कि एक क्रान्ति है. इसमें जल आपूर्ति, शौचालय, हाथ धोना, अपशिष्ट प्रबन्धन और सहेली कक्ष जैसी सुरक्षित जगहों, जैसे कारकों को अहम माना गया है.

भारत के बिहार राज्य के एक स्कूल में भारतीय स्कूली छात्र एक भित्तिचित्र का अध्ययन कर रहे हैं जो वर्षा जल संचयन प्रणाली को समझाता है।
© UNICEF India

आदर्श रामानंद विद्यालय, इन 54 पुरस्कार विजेता स्कूलों में से एक है, जिसे 60 हज़ार से अधिक विद्यालयों में से, पेयजल, शौचालयों, हाथ धोने, रखरखाव, प्रशिक्षण, व्यवहार परिवर्तन व सामुदायिक जुड़ाव जैसे पैमानों पर परखकर, उत्कृष्टता के लिए चुना गया है..

स्वीटी कुमारी कहती हैं, “इससे सब कुछ बदल गया.”

एक अन्य छात्रा श्रेया सुहानी कहती हैं: "अब हम बारिश का पानी इकट्ठा करते हैं, गीले कचरे से अपने बाग़ीचे के लिए खाद बनाते हैं, प्लास्टिक का पृथकीकरण करते हैं. इस पुरस्कार ने हमें जलवायु परिवर्तन के ख़िलाफ़ पृथ्वी की रक्षा करने वाला योद्धा बना दिया है."

जलापूर्ति, स्वच्छता, स्वास्थ्य समेत BSVP के सात स्तम्भ इस स्कूल को एक क़िले की तरह सहारा देते हैं. सहेली-कक्ष मानो इसका मुकुट है, जो आपातकालीन किट और एक बिस्तर के साथ पुरानी सोच को बदलता है.

भारतीय स्कूली छात्राएं वर्दी पहने एक बगीचे में झुकी हुई हैं, प्लास्टिक कचरे को छांट रही हैं और गीले कचरे से खाद बना रही हैं।
© UNICEF India

क्रान्ति का हिस्सा बने लड़के

अंकित कुमार, हाथ धोने के नए-नए चमचमाते स्टेशनों की ओर इशारा करते हुए कहते हैं, "हम कक्षा में पाठ के लिए जाने से पहले हाथ धोते हैं. और चूँकि अब हर कक्षा के पास पानी के ड्रम रखे होते हैं – तो अब हमें अपनी प्यास बुझाने के लिए भी इन्तज़ार नहीं करना पड़ता."

कृतिका के प्रधानाचार्य जलज लोचन मुस्कुराते हुए कहते हैं, "यह पुरस्कार एक ऐसा आईना है, जो हमें अपना सर्वश्रेष्ठ रूप दिखाता है. पन्द्रह शौचालय, छँटा हुआ कचरा, बारिश के पानी का संरक्षण. ये सब कार्य स्कूल की गरिमा बढ़ाते हैं."

स्कूल में बदलाव की धूम है. स्वीटी कहती हैं, "लड़कियाँ मासिक धर्म के बारे में खुलकर बात करती हैं. लड़के भी हमारी बात ध्यान से सुनते हैं."

अंकित कहते हैं, "हम केवल सीख ही नहीं रहे हैं, बल्कि बेहतर तरीक़े से जीवन जी रहे हैं."

कृतिका के लिए, BSVP मानो सहेली कक्ष की नब्ज़ है.

वह एक कोने में खड़ी होकर सहेली कक्ष को आख़िरी बार देखते हुए फ़ुसफ़ुसाती हैं, “यह स्कूल सबसे अच्छा है. अगर लड़कियाँ और लड़के सशक्त होंगे तो पूरा बिहार सशक्त होगा.”

कृतिका, यहाँ से हासिल गरिमा, सुरक्षा, और विश्वास की सीख को, अपनी नई दुनिया में ले जाएंगी. वह मन ही मन, ख़ुद को उस कमरे में आराम करते देख रही हैं.

उनका सपना है कि एक दिन हर स्कूल में ऐसा ही सुरक्षित स्थान मौजूद हो.