जलवायु परिवर्तन से निपटने की तैयारी के लिए, एशिया-प्रशान्त की अर्थव्यस्थाओं की परख
पिछले वर्ष, विश्व अर्थव्यवस्था के कुल विस्तार में एशिया-प्रशान्त क्षेत्र ने अपना 60 फ़ीसदी योगदान दिया, मगर इसके बावजूद यहाँ स्थित अनेक देश जलवायु झटकों का सामना करने और हरित व्यवस्थाओं को अपनाने से होने वाले नतीजों के लिए अब भी तैयार नहीं हैं. एशिया-प्रशान्त क्षेत्र के लिए संयुक्त राष्ट्र आर्थिक एवं सामाजिक आयोग (UNESCAP) द्वारा प्रकाशित एक नई रिपोर्ट में यह निष्कर्ष साझा किया गया है.
रिपोर्ट में अर्थव्यवस्था व जलवायु द्वारा एक दूसरे को प्रभावित करने वाले रुझानों के अलावा क्षेत्र की आर्थिक मज़बूती पर असर डालने वाली चुनौतियों, जैसेकि उत्पादकता में धीमी वृद्धि, सार्वजनिक कर्ज़ का जोखिम और बढ़ते व्यापारिक तनाव की भी पड़ताल की गई है.
संयुक्त राष्ट्र की अवर महासचिव औ की कार्यकारी सचिव,आर्मिडा सालसियाह अलिसजहबाना ने कहा कि बढ़ती वैश्विक आर्थिक अनिश्चितता और गहराते जलवायु जोखिमों के कारण, राजकोषीय व मौद्रिक नीति-निर्माताओं के सामने मौजूद हालात आसान नहीं है.
“इस उभरते परिदृश्य में आगे बढ़ने के लिए न केवल ठोस राष्ट्रीय नीतियों की आवश्यकता है, बल्कि दीर्घकालिक आर्थिक सम्भावनाओं की रक्षा व जलवायु परिवर्तन से निपटने के लिए समन्वित क्षेत्रीय प्रयासों की भी ज़रूरत है."
इस सर्वेक्षण में 30 देशों का विश्लेषण किया गया है, जिनमें से 11 को जलवायु जोखिमों के प्रति अधिक सम्वेदनशील माना गया है: अफ़ग़ानिस्तान, कम्बोडिया, इस्लामी गणराज्य ईरान, कज़ाख़्स्तान, लाओ लोकतांत्रिक गणराज्य, मंगोलिया, म्याँमार, नेपाल, ताज़िकिस्तान,उज़बेकिस्तान और वियतनाम.
जलवायु परिवर्तन से निपटने की क्षमता में पूरे क्षेत्र में कई असमानताएँ नज़र आईं हैं.
कुछ देशों ने जलवायु वित्त जुटाकर,हरित नीतियाँ अपनाई हैं,लेकिन अन्य देश कड़ी चुनौतियों का सामना कर रहे हैं. इनमें राजकोषीय बाधाएँ, कमज़ोर वित्तीय प्रणाली और सार्वजनिक वित्तीय प्रबन्धन की सीमित क्षमता समेत अन्य समस्याएँ हैं.
सर्वेक्षण दर्शाता है कि विभिन्न देश, जलवायु परिवर्तन से जुड़ी विविध आर्थिक चुनौतियों का सामना करने के लिए किस तरह की नीतियाँ अपना रहे हैं.
उदाहरण के लिए, कोरिया गणराज्य में औद्योगिक विकास के साथ जलवायु लक्ष्यों का तालमेल बैठाना, लाओ पीडीआर में कृषि पर निर्भरता होने के कारण जलवायु मुद्दों का समाधान ढूंढना, कज़ाख़्स्तान में जीवाश्म ईंधन पर निर्भरता की वजह से जलवायु जोखिमों को दूर करना, और बांग्लादेश व वानुआतु जैसी तटीय अर्थव्यवस्थाओं में नीतिगत कार्रवाई को आगे बढ़ाना.
धीमी प्रगति
दुनिया के अन्य हिस्सों की तुलना में एशिया-प्रशान्त क्षेत्र की अर्थव्यवस्थाओं का अच्छा प्रदर्शन रहा, लेकिन इसके बावजूद, विकासशील अर्थव्यवस्थाओं में औसत आर्थिक वृद्धि, 2024 में 4.8 प्रतिशत तक रह गई, जबकि 2023 में यह 5.2 प्रतिशत थी.
सबसे कम विकसित देशों में, 2024 की औसत आर्थिक वृद्धि दर 3.7 प्रतिशत रही, जोकि सतत विकास लक्ष्य के तहत निर्धारित प्रति वर्ष 7 प्रतिशत के लक्ष्य से बहुत कम है.
2008 के वैश्विक वित्तीय संकट के बाद से, एशिया-प्रशान्त क्षेत्र में श्रम उत्पादकता की रफ़्तार तेज़ी से घटी है.2010 और 2024 के दौरान, एशिया-प्रशान्त के 44 विकासशील देशों में से केवल 19 में ही आय के मामले में अग्रणी अर्थव्यवस्थाओं के साथ खाई कम रहो रही है जबकि 25 देश काफ़ी पीछे रह गए हैं.