वैश्विक परिप्रेक्ष्य मानव कहानियां

रवांडा में तुत्सी समुदाय के विरुद्ध जनसंहार के पीड़ितों का स्मरण, अतीत से सबक़ लेने की अपील

रवांडा में 1994 में तुत्सी लोगों के विरुद्ध हुए नरसंहार की 31वीं वर्षगांठ के दौरान श्रद्धान्जलि दी गई.
UN Photo/Manuel Elias
रवांडा में 1994 में तुत्सी लोगों के विरुद्ध हुए नरसंहार की 31वीं वर्षगांठ के दौरान श्रद्धान्जलि दी गई.

रवांडा में तुत्सी समुदाय के विरुद्ध जनसंहार के पीड़ितों का स्मरण, अतीत से सबक़ लेने की अपील

मानवाधिकार

संयुक्त राष्ट्र के शीर्षतम अधिकारी एंतोनियो गुटेरेश ने वर्ष 1994 में रवांडा में, तुत्सी समुदाय के विरुद्ध जनसंहार के पीड़ितों और जीवित बच गए व्यक्तियों के सम्मान में, एक न्यायसंगत व गरिमामय विश्व को आकार देने का आहवान किया है. न्यूयॉर्क स्थित संयुक्त राष्ट्र मुख्यालय में इस जनसंहार की 31वीं बरसी पर सोमवार को एक कार्यक्रम के दौरान संकल्प लिया गया कि ऐसी त्रासदी को फिर कभी नहीं दोहराने दिया जाएगा.

रवांडा में 1994 में बड़े पैमाने पर तुत्सी समुदाय के विरुद्ध जनसंहार, 7 अप्रैल 1994 को शुरू हुआ और 100 दिनों से अधिक समय तक चला. इस दौरान क़रीब 10 लाख बच्चों, महिलाओं व पुरुषों को जान से मार दिया गया.

इनमें अधिकाँश तुत्सी समुदाय से थे, मगर हुतू समुदाय और जनसंहार का विरोध करने वाले बहुत से अन्य लोगों को भी निशाना बनाया गया था.

Tweet URL

यूएन प्रमुख ने जीवित बचे व्यक्तियों, राजनयिकों, नागरिक समाज के प्रतिनिधियों के साथ सोमवार को यूएन महासभा हॉल में आयोजित एक कार्यक्रम में शिरकत की, जहाँ "मानव इतिहास में सुन्न कर देने वाले इस अध्याय" के दौरान जान गँवाने वाले लोगों का स्मरण किया गया.

महासचिव गुटेरश ने कहा, ये भयानक हिंसा और उन्माद अचानक शुरू नहीं हुआ , बल्कि “ये जानबूझकर किया गया था. पूर्व नियोजित था. इसकी योजना बनाई गई थी, जिसमें नफ़रत फैलाने वाले भाषण भी शामिल थे, जिसने दरारों को बढ़ावा दिया, और झूठ व अमानवीयता फ़ैलाई…"  उन्होंने क्षोभ जताया कि यह [इसे रोकने की] कार्रवाई में सामूहिक विफलता का परिणाम था.

संयुक्त राष्ट्र महासभा के अध्यक्ष फ़िलेमॉन यैंग ने अन्तरराष्ट्रीय समुदाय की अकर्मण्यता को याद करते हुए कहा, "शुरुआती चेतावनियों और तबाही के स्पष्ट संकेतों के बावजूद, दुनिया मूकदर्शक बनी रही, जबकि हत्याएँ जारी थीं. सरकारें बहस करती रहीं, जबकि मदद के लिए लगाई गई पुकारों को नहीं सुना गया और ज़िन्दगियाँ ख़त्म होती रहीं." 

"आज, जब हम अपनी विफलता पर विचार करते हैं, तो हमें पूछना चाहिए: क्या हमने वास्तव में अतीत से सीखा है? क्या हमने यह सुनिश्चित करने के लिए पर्याप्त प्रयास किए हैं कि इस तरह के अत्याचार फिर कभी न हों? या क्या यह कहीं और हो रहा है, जब हम इसकी बात कर रहे हैं?"

पीड़ितों ने बयाँ किए दर्द 

वैश्विक स्वास्थ्य शोधकर्ता और लेखिका जर्मेन तुइसेंज म्युलर इस जनसंहार में जीवित बच जाने वाले व्यक्तियों में हैं, जिन्होंने महासभा में अपने भयावह अनुभव को साझा किया.

उन्होंने बताया कि जब जनसंहार शुरू हुआ, तब वह सिर्फ़ नौ साल की थी और अपनी माँ के साथ राजधानी किगाली में रह रहीं थी. उनसे मिलने के लिए उनकी एक रिश्तेदार अपने दो बच्चों के साथ वहाँ आई हुई थीं.

उन्होंने कहा, "हमारा देश अकल्पनीय भयावह स्थिति में डूब गया था. परिवार बिखर गए, अजन्मे समेत बच्चों को मार दिया गया, महिलाओं के साथ बलात्कार किया गया, अक्सर उनके अपने सम्बन्धियों के सामने, और पूरे समुदाय को सिर्फ़ इसलिए मार दिया गया क्योंकि वे तुत्सी थे."

वो उस समय सुरक्षा की तलाश में, अपने प्रियजन से अलग हो गईं, और उन्हें मौतों की खबरें मिलती रहीं. एक समय ऐसा भी आया जब वो तुइसेंज म्युलर दो महीने तक एक ख़ाली पड़े घर में अकेली रहीं, जहाँ उन्होंने बारिश के पानी में पाउडर वाला दूध घोलकर और चीनी के सहारे दिन व्यतीत किए. 

वह अपनी माँ को फिर सात महीने बाद ही देख पाईं, जिन्हें जनसंहार के शुरुआती चरण में गोली मार दी गई थी. उस समय उनकी माँ, देश के अन्य हिस्सों से आए अपने परिवार के 13 सदस्यों के साथ रह रही थीं. सबसे बड़ी उनकी दादी थीं, जो अपने पति की हत्या के बाद उनके साथ रहने के लिए वहाँ आ गई थीं.

तुइसेंज म्युलर ने कहा कि आज वह जनसंहार के दौरान मारे गए दस लाख से अधिक लोगों की याद में यह अनुभव साझा कर रही हैं. "मैं जीवित बचे व्यक्तियों के लिए भी अपनी बात रख रही हूँ: हमारी सहनसक्षमता, हमारी हिम्मत, [इस घटना को] याद रखने के अपने अटूट संकल्प के लिए."

जनसंहार में जीवित बची वैश्विक स्वास्थ्य शोधकर्ता और लेखिका जर्मेन तुइसेंज म्युलर ने अपना दर्दनाक अनुभव साझा किया।
UN Photo/Manuel Elias
जनसंहार में जीवित बची वैश्विक स्वास्थ्य शोधकर्ता और लेखिका जर्मेन तुइसेंज म्युलर ने अपना दर्दनाक अनुभव साझा किया।

सबक़ याद रखना होगा

यूएन महासचिव ने मौजूदा दौर में व्याप्त दरारों का ज़िक्र करते हुए कहा कि, “जब हम इस बात पर विचार करते हैं कि ये अपराध कैसे हुए, तो हमें अपने समय में गूंज रही आवाज़ों पर भी विचार करना चाहिए. 

उन्होंने चेतावनी दी कि अफ़्रीका के ग्रेट लेक्स क्षेत्र और दुनिया भर में ‘वे’ बनाम ‘हम’ की सोच की वजह से समाजों का तेज़ी से ध्रुवीकरण हो रहा है, जबकि डिजिटल टैक्नॉलॉजी को हथियार बनाकर नफ़रत को भड़काया जा रहा है, दरारों को गहरा किया जा रहा है और झूठ फैलाए जा रहे हैं.

यूएन प्रमुख ने ऑनलाइन जगत में फ़ैल रहे "नस्लवाद, स्त्री विरोधी और जनसंहार को नकारने” जैसी प्रवृत्तियों के उभरने और झूठ, षड़यंत्र कथाओं व डीप फेक सामग्री के ख़तरनाक गति से फ़ैलने पर चिन्ता जताई. 

उन्होंने कहा कि हमें नफ़रत फ़ैलाने वाले भाषणों और विभाजन व असन्तोष को हिंसा में बदलने से रोकना होगा. इस क्रम में, उन्होंने देशों से 'ग्लोबल डिजिटल कॉम्पैक्ट' को पूरी तरह से लागू करने का आग्रह किया, जिसमें झूठ और नफ़रत से निपटने के लिए महत्वपूर्ण प्रतिबद्धताएँ व्यक्त की गई हैं.

महासचिव गुटेरेश के अनुसार, "हम सभी को मानवाधिकारों के उल्लंघन को रोकने के लिए काम करना चाहिए और इन्हें अंजाम देने वालों की जवाबदेही तय की जानी होगी."

उन्होंने सभी देशों से जनसंहार की रोकथाम पर सन्धि में शामिल होने की अपील की है ताकि जनसंहार, युद्ध अपराध, जातीय सफ़ाए और मानवता के विरुद्ध अपराधों से आम नागरिकों की रक्षा की जा सके. 

न्यूयॉर्क स्थित संयुक्त राष्ट्र मुख्यालय में इस जनसंहार की 31वीं वर्षगांठ पर जनसंहार के पीड़ितों और जीवित बच गए व्यक्तियों के लिए सम्मान में एक कार्यक्रम का आयोजन किया गया.
UN Photo/Manuel Elias
न्यूयॉर्क स्थित संयुक्त राष्ट्र मुख्यालय में इस जनसंहार की 31वीं वर्षगांठ पर जनसंहार के पीड़ितों और जीवित बच गए व्यक्तियों के लिए सम्मान में एक कार्यक्रम का आयोजन किया गया.