भारत: जल व ज़मीन के लिए महिलाओं के अधिकारों की लड़ाई
संयुक्त राष्ट्र विकास कार्यक्रम (यूएनडीपी) व भारत सरकार की एक नई पहल के तहत, देश के पूर्वी राज्य ओडिशा में महिलाओं को जल व ज़मीन से जुड़े अपने अधिकारों के लिए लड़ने और अपने समुदायों में बदलाव लाने के लिए सहायता दी जा रही है.
जयमनी बेहेरा हमेशा से खेती करती रही हैं, लेकिन कभी भी वो ज़मीन की मालिक नहीं रहीं. ओडिशा के मयूरभंज ज़िले के बेगुनिया गाँव, की चालीस वर्षीय माँ, जयमनी ने वर्षों तक मामूली वेतन पर कड़ी धूप में खेतों में मज़दूरी की है. ज़मीन पर मालिक़ाना हक़ पाना पुरुषों का अधिकार था, और उन्हें सींचने वाले जल पर, शायद ही कभी महिलाओं का नियंत्रण रहा है.
एक ऐसे गाँव में, जहाँ पीढ़ियों से महिलाएँ पानी लाने के लिए मीलों तक चलकर जाती थीं, जयमनी बेहेरा ने पीढ़ियों के बंधन तोड़े. आज, वो सात एकड़ की ज़मीन की मालिक हैं, जिसमें सब्ज़ियाँ, चावल और मशरूम की उपज होती है.
इसके अलावा, वो एक सौर ऊर्जा संचालित कोल्ड स्टोरेज यूनिट, एक जैविक मछली फार्म का भी प्रबन्धन करती हैं. उनकी नर्सरी एक पूर्ण विकसित कृषि व्यवसाय में तब्दील हो चुकी है, जिससे उन्हें सालाना 14 लाख रुपये की आमदनी होती है. अपने से पहली पीढ़ी की महिलाओं के विपरीत, जो अक्सर गृहिणी बनकर ही रह जाती थीं, जयमनी बेहेरा ख़ुद कमाती हैं.
लेकिन उनके जीवन में यह बदलाव अचानक नहीं हुआ. इसके लिए उन्हें मदद मिली, ओडिशा में संयुक्त राष्ट्र विकास कार्यक्रम (UNDP) के सहयोग से संचालित OIIPCRA नामक पहल से, जिसमें जलवायु सहनसक्षम कृषि के लिए सिंचाई पर ध्यान केन्द्रित किया जाता है.
इस पहल के तहत, जयमनी बेहेरा को उच्च उपज वाली सब्ज़ी, धान के बीज, जल के बेहतर उपयोग से खेती के लिए बुनियादी ढाँचा, तथा वित्तीय सब्सिडी प्रदान की गई.
एक संकट, एक पुकार
पूरे ओडिशा में, जयमनी बेहेरा जैसी महिलाएँ पुरातन बेड़ियों से आज़ाद हो रही हैं: ये महिलाएँ हमेशा जल स्रोतों का ध्यान रखती रही हैं, लेकिन उसके प्रबन्धन में उनके सुझाव नहीं लिए जाते हैं.
भारत में विश्व की जनसंख्या का 17 प्रतिशत हिस्सा रहता है, लेकिन ताज़ा जलों के स्रोत का केवल चार प्रतिशत हिस्सा ही यहाँ मौजूद है. जैसे-जैसे जलवायु परिवर्तन बढ़ रहा है, सम्वेदनशील इलाक़ों में रहने वाले लगभग 60 करोड़ भारतीयों को जल की क़िल्लत का सामना करना पड़ सकता है.
इसकी वजह से, ज़मीन में दरारें पड़ने, फ़सलों के मुरझाने समेत अन्य समस्याएँ सामने आ रही हैं.साथ ही, पानी लाने व उसे कम इस्तेमाल करने की सारी ज़िम्मेदारी महिलाओं पर ही रहती है.
76 प्रतिशत भारतीय घरों में, पानी भरकर लाने का बोझ महिलाओं के कंधों पर होता है. पानी लाने में बिताए गए घंटे, एक ऐसा खोया हुआ समय है, जिसे शिक्षा, आमदनी वाले कामकाज, या आराम करने में उपयोग किया जा सकता है.
विडम्बना यह भी है कि जब ज़मीन का मूल्य बढ़ता है, या सिंचाई आरम्भ होती है और उपज बढ़ती है, तो इसका लाभ महिलाओं को नहीं, बल्कि केवल पुरुषों को मिलता है. यहाँ तक कि कृषि में, जहाँ लगभग 50 प्रतिशत श्रमिक महिलाएँ हैं, महिलाओं को अक्सर "सहायक" ही माना जाता है. ज़मीन के क़ागज़ात पर उनके नाम नहीं होते हैं. सिंचाई कार्यक्रम बनाते समय उनके बारे में नहीं सोचा जाता है. उनके अहम व अथक परिश्रम को शायद ही कभी अर्थव्यवस्था में अहमियत मिलती हो.
नवीन युग
लेकिन मयूरभंज के जंगलों से लेकर गंजम के खेतों तक, पूरे ओडिशा में, महिलाएँ अब एक नए युग का बिगुल बजा रही हैं. वो अब केवल पानी लाने की ही नहीं,बल्कि इसके प्रबन्धन की ज़िम्मेदारी भी संभाल रही हैं.
ओडिशा सरकार की इस परियजना से उन्हें समर्थन व प्रोत्साहन मिल रहा है. इसका उद्देश्य, ग्रामीण महिलाओं का क्षमता निर्माण करना, उन्हें जल प्रबन्धन में एकीकृत करना तथा उन्हें जल संसाधन प्रबन्धन एवं सतत कृषि को बढ़ावा देने के लिए प्रौद्योगिकी से लैस करना है.
जल रूपी संसाधन की मालिक
पैंसठ साल की उम्र में डोमी नाहाक पहली बार ज़मीन की मालिक़ बनीं. अपने जीवन के ज़्यादातर समय में, वो गंजम ज़िले के छत्रपुर में भिखारीपाली गाँव में दैनिक मज़दूरी करके एक अनिश्चित आय पर गुज़र-बसर करती रहीं.
फिर, एक राजनैतिक परियोजना के तहत, नवनिर्वाचित सरपंच ने उन्हें 0.7 एकड़ की भूमि आवंटित की. शुरुआत में, यह ज़मीन सूखी और बंजर थी. लेकिन OIIPCRA परियोजना की मदद से उनके लिए एक सौर ऊर्जा संचालित बोरवेल स्थापित किया गया, प्रशिक्षण दिया गया, और उच्च उपज वाले बीज प्रदान किए गए.
फिर क्या था! डोमी नाहाक की बंजर भूमि बैंगन, मिर्च और कद्दू से हरी-भरी हो उठी, और वो इससे लगभग 40,000 रुपये प्रति वर्ष कमाने लगीं.
जल आने से सब कुछ बदल गया. जल की स्थिर आपूर्ति का मतलब था कि अब वो साल भर खेती कर सकती थीं. उनकी आमदनी बढ़ गई, लेकिन उससे भी अधिक महत्वपूर्ण बात यह थी कि अब वो आर्थिक रूप से स्वतंत्र थीं – एक ऐसी आज़ादी जिसकी उन्होंने कभी कल्पना भी नहीं की थी.
जल पंचायत
ऐसी ही अनगिनत कहानियाँ अब इलाक़े में नज़र आती हैं. ओडिशा सरकार ने महिलाओं को जल प्रबन्धन के केन्द्र में रखने के लिए पुरज़ोर प्रयास किए हैं. कालाहांडी में कभी पुरुष-प्रधान रहे सिंचाई समूह, जल पंचायत में, अब 40 महिला सदस्य शामिल हैं – यानि कुल सदस्यों का लगभग 40 प्रतिशत.
जहाँ पहले पुरुष जल वितरण तय करते थे, वहीं अब महिलाएँ भी निर्णय में शामिल होकर चर्चाओं में भाग लेती हैं कि इसे किस तरह न्यायसंगत ढंग से आवंटित किया जाए. उनकी भागेदारी से नीतियों में बदलाव आया है. साथ ही यह सुनिश्चित किया जा रहा है कि जल केवल खेती का संसाधन नहीं, बल्कि सशक्तिकरण का ज़रिया बन सके.
ओडिशा राज्य में जल प्रबन्धन का डिजिटलीकरण भी किया जा रहा है ताकि वास्तविक समय में डेटा की निगरानी की जा सके और पारदर्शिता व जवाबदेही सुनिश्चित की जा सके. इससे वास्तविक समय में 36 हज़ार से अधिक जल पंचायतों की निगरानी करना सम्भव है.
जल प्रबन्धन के अलावा, महिलाएँ सामूहिक कार्रवाई के ज़रिए बदलाव लाने में भी अहम भूमिका निभा रही हैं. 2018 में गठित कपिलेश्वर स्व-सहायता समूह से ओडिशा के महुलापल्ली गाँव में मछली पालन के क्षेत्र में क्रांतिकारी परिवर्तन आया है.
बिना किसी निवेश के, महिलाओं ने OIIPCRA योजना से प्राप्त सब्सिडी व तकनीकी प्रशिक्षण का लाभ उठाकर वैज्ञानिक जलीय कृषि प्रथाओं को अपनाया, जिससे अब वो लगभग 2.5 लाख रुपये प्रति वर्ष कमा रही हैं.
पाँच साल के अन्दर ही, वो बिना कमाई के मज़दूरी करने वाली महिलाओं से, स्वतंत्र उद्यमी बन चुकी हैं, जो इससे मिले लाभों को अपने समुदाय के साथ बाँट रहीं हैं और वापिस समुदाय के कल्याण में निवेश भी कर रही हैं.
लेकिन चुनौतियाँ बरक़रार हैं. ज़रूरी नहीं है कि क़ाग़ज़ पर दिए जल अधिकार, वास्तव में महिलाओं को उनका अधिकार दिला दें.
आज भी बाज़ार तक महिला किसानों की पहुँच सीमित है. कई ग्रामीण क्षेत्रों में, पितृसत्तात्मक मानदंड की जड़ें अभी भी इतनी गहरी जमी हुई है कि उन्हें निर्णयात्मक भूमिकाओं से अभी भी बाहर रखा जाता है.
फिर भी, जयमनी बेहेरा की कहानी से स्पष्ट है – परिवर्तन होगा, अब इसमें कोई सन्देह नहीं...सवाल है तो बस यह कि यह "कब" होगा.
इस लेख का विस्तृत संस्करण पहले यहाँ प्रकाशित हुआ.