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असम के जलदूत, यूनीसेफ़ के साथ मिलकर, असम में सुरक्षित पेयजल की सुविधा को बढ़ावा देने के लिए काम कर रहे हैं.

भारत: जल सुरक्षा के लिए मुस्तैद, असम के 'जलदूत'

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असम के जलदूत, यूनीसेफ़ के साथ मिलकर, असम में सुरक्षित पेयजल की सुविधा को बढ़ावा देने के लिए काम कर रहे हैं.

भारत: जल सुरक्षा के लिए मुस्तैद, असम के 'जलदूत'

एसडीजी

भारत के पूर्वोत्तर राज्य असम में संयुक्त राष्ट्र बाल कोष (यूनीसेफ़) ने, पेयजल की समस्या से निपटने के लिए, भारत सरकार के जल जीवन मिशन के तहत, जलदूत नामक एक कार्यक्रम आरम्भ किया गया है. इसका नेतृत्व युवा छात्र कर रहे हैं, जिन्हें अपने समुदाय में स्वच्छता, साफ़-सफ़ाई एवं सुरक्षित पेयजल सुनिश्चित करने का प्रशिक्षण दिया गया है.

नौवीं कक्षा का छात्र, अभिजीत पातर अपने गाँव के एक बुज़ुर्ग को टोकते हुए कहता है, "अंकल, यह पानी पीने और घरेलू उपयोग के लिए है! सरकार हर दिन प्रति व्यक्ति 55 लीटर पानी प्रदान करती है ताकि सभी को सुरक्षित पेयजल मिल सके."

अभिजीत पातर की यह प्रतिक्रिया, उस कार्यक्रम के प्रभाव का आईना है , जो यूनीसेफ़ ने भारत सरकार के जल जीवन मिशन के सहयोग से असम में आरम्भ किया है. इस पहल के तहत, बच्चों को स्वच्छ पेयजल, और साफ़-सफ़ाई का दूत बनाया गया है.

अभिजीत पातर भी असम के इन्हीं तीन लाख जलदूतों (water champions) में से एक हैं, जिसे इस पहल के तहत, सुरक्षित पानी, स्वच्छता एवं स्वास्थ्य (WASH) सेवाओं में प्रशिक्षित किया गया है.

युवा जलदूतों को असम राज्य की 7,000 जल शालाओं (वाटर स्कूल) में प्रशिक्षण दिया गया है.
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युवा नेतृत्व 

जलदूत कार्यक्रम में, पारम्परिक जागरूकता पहल से अलग हटकर, विद्यार्थियों को अपने समुदायों में सक्रिय भूमिका निभाने के लिए सशक्त बनाया जाता है. इससे न केवल स्वच्छ पानी तक पहुँच सुनिश्चित होती है, बल्कि स्वच्छता व उचित स्वास्थ्य तौर-तरीक़ों को भी बढ़ावा दिया जाता है.

इन युवा जलदूतों को असम राज्य की 7,000 जल शालाओं में प्रशिक्षण दिया गया है. यहाँ वे घरेलू नल कनेक्शन, जल, स्वच्छता व स्वास्थ्य की पैरोकारी के अलावा ज़मीनी स्तर पर व्यवहार परिवर्तन को बढ़ावा देना सीखते हैं.

मई, 2023 में शुरू हुई यह पहल, भारत के जल संकट को दूर करने में महत्वपूर्ण भूमिका निभा रही है.

यूनीसेफ़ की एक रिपोर्ट के मुताबिक़, देश के 718 ज़िलों में से दो-तिहाई ज़िले, भूजल की कमी का सामना कर रहे हैं. इससे निपटने के लिए 2019 में जल जीवन मिशन शुरु किया गया, जिसका उद्देश्य, हर घर में पाइप के ज़रिए जल प्रदान करना है.

इसी मिशन के अन्तर्गत आरम्भ किए असम के अनोखे जलदूत मॉडल में, छात्रों को शामिल करके और सार्वजनिक भागेदारी को बढ़ावा देकर, सतत जल प्रबन्धन सुनिश्चित करने के प्रयास किए जा रहे हैं.

चुनौतियों से पार

मोरीगाँव में जल जीवन मिशन के ज़िला समन्वयक, शिक्षा और विज्ञान एवं प्रौद्योगिकी विभाग के प्रशिक्षकों के सहयोग से, जलशालाओं और जलअड्डों के ज़रिए, जलदूतों के संगठन के प्रशिक्षण का संचालन करते हैं.
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मोरीगाँव में जल जीवन मिशन के ज़िला समन्वयक, शिक्षा और विज्ञान एवं प्रौद्योगिकी विभाग के प्रशिक्षकों के सहयोग से, जलशालाओं और जलअड्डों के ज़रिए, जलदूतों के संगठन के प्रशिक्षण का संचालन करते हैं.

मोरीगाँव ज़िले में ही सक्रिय रूप से मिशन को आगे बढ़ाने के लिए लगभग 1,534 जलदूत काम कर रहे हैं. जल जीवन मिशन से पहले, यहाँ के निवासी ट्यूबवैल और खुले कुँओं पर निर्भर थे. लेकिन यह अक्सर दूषित होते थे या बाढ़ के दौरान जलमग्न हो जाते थे, जिससे स्वास्थ्य को गम्भीर जोखिम रहता था. 

अब, अभिजीत जैसे जलदूत, समुदायों को सुरक्षित पेयजल और रोगों की रोकथाम में इसकी भूमिका के बारे में शिक्षित करते हैं.

अभिजीत पातर ने बताया, "मैंने पहले कभी पानी की सुरक्षा के बारे में नहीं सोचा था. अब मुझे समझ आया है कि सुरक्षित पेयजल से दस्त और टायफ़ाइड जैसी बीमारियों को रोका जा सकता है. मेरे माता-पिता और पड़ोसी भी इससे सीख रहे हैं."

पहल का प्रभाव

मोरीगाँव के ताराबोरी माध्यमिक विद्यालय ने अक्टूबर 2023 से अब तक 40 जलदूतों को प्रशिक्षित किया है. अभिजीत पातर और उसी स्कूल की एक अन्य जलदूत, नबज्योति सैकिया को, अपने उत्कृष्ट समुदायिक योगदान के लिए मोरीगाँव के ज़िला आयुक्त कार्यालय में सम्मानित भी किया गया.

विज्ञान की शिक्षक और स्कूल के जल जीवन मिशन की नोडल अधिकारी, अपलाका देवी, स्वयं काम करके सीखने के दृष्टिकोण पर ज़ोर देती हैं. 

"प्रशिक्षण के दौरान, हमने सबसे पहले अपने स्कूल के छात्रों के सामने जल आपूर्ति स्रोत का परीक्षण करके दिखाया. जो छात्र सत्र में भाग लेने में असमर्थ थे, उन्हें बाद में जलदूतों द्वारा प्रशिक्षित किया गया." 

"फिर इन छात्रों ने आगे जाकर अपने समुदायों को नए पाइप कनेक्शन के रखरखाव एवं ज़िम्मेदारी से पानी का उपयोग करने के लिए शिक्षित किया."

असम के राउमोरिया गाँव, बिहपुरिया के 5 वर्षीय सरंगा साइकिया को "सर्वश्रेष्ठ प्रदर्शन करने वाले जलदूत" का पुरस्कार दिया गया.
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असम के राउमोरिया गाँव, बिहपुरिया के 5 वर्षीय सरंगा साइकिया को "सर्वश्रेष्ठ प्रदर्शन करने वाले जलदूत" का पुरस्कार दिया गया.

लखीमपुर के ज़िला समन्वयक, चतर प्रसाद पाथोरी ने कहा, "हमारे ज़िले में, जल जीवन मिशन ने तेज़ी से प्रगति की है, और बड़े पैमाने पर इसका श्रेय जलदूतों को जाता है. वे सार्वजनिक जल प्रणालियों का निरीक्षण करते हैं, घर-घर जाकर जाँच करते हैं कि सभी मानकों का पूर्ण अनुपालन हो रहा हो, और पानी के गुणवत्ता मानकों की निगरानी करते हैं." 

"पेयजल की सुरक्षा सुनिश्चित करने के लिए फ़ील्ड टेस्टिंग करने वाले महिला समूहों के साथ मिलकर काम करते हैं. हालाँकि भूजल की कमी यहाँ एक बड़ा मुद्दा नहीं है, लेकिन जल में रासायनिक उतार-चढ़ाव के कारण बार-बार परीक्षण आवश्यक होता है. जलदूत इन बदलावों की निगरानी में एक महत्वपूर्ण भूमिका निभाते हैं."

15 वर्षीय सारंगा सैकिया बताती हैं, "हमने सितम्बर में एक जलशाला में भाग लिया, जहाँ हमे सामुदायिक स्वयंसेवक का प्रशिक्षण प्रदान किया गया. शुरुआत में, ग्रामीणों को अपने अलग-अलग नल कनेक्शन लेने के लिए मनाना कठिन था." 

"कई लोग पारम्परिक कुँओं से ही पानी लेते थे और उन्हें जल जीवन मिशन की कोई ज़रूरत नहीं दिख रही थी. लेकिन जब हमने समझाया कि जल जीवन मिशन से उन्हें मानकीकृत सुरक्षित पेयजल मिलेगा, तो धीर-धीरे उन्हें समझ आने लगा."

असम के माजुली ज़िले में बार-बार बाढ़ आने से, जल स्रोत दूषित हो जाते थे और गम्भीर जल चुनौतियों का सामना करता पड़ता है. इन बाधाओं के बावजूद, ज़िले के 702 जलदूतों ने 90 फ़ीसदी इलाक़े में जल जीवन मिशन के तहत सुरक्षित पेयजल सुनिश्चित करने में महत्वपूर्ण भूमिका निभाई है.

इस बदलाव का ज़िक्र करते हुए माजुली की एक जलदूत, सीमा बोरा कहती हैं कि लोगों को यह एहसास नहीं था कि पानी की गुणवत्ता में भी उतार-चढ़ाव हो सकता है. अब, वो सक्रियता से अपने पानी का परीक्षण करते हैं और कोई समस्या आने पर उसका समाधान करते हैं.

असम का अनोखा जलदूत मॉडल दर्शाता है कि किस तरह छात्रों को शामिल करके सार्वजनिक भागेदारी को बढ़ावा दिया जा सकता है और टिकाऊ जल प्रबंधन सुनिश्चित किया जा सकता है.
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असम का अनोखा जलदूत मॉडल दर्शाता है कि किस तरह छात्रों को शामिल करके सार्वजनिक भागेदारी को बढ़ावा दिया जा सकता है और टिकाऊ जल प्रबंधन सुनिश्चित किया जा सकता है.