भारत: अनुकूलन की राह पर अग्रसर, ओडिशा की जलवायु नायिकाएँ
भारत में यूएनडीपी, भारत सरकार एवं साझीदारों के साथ मिलकर, ओडिशा प्रदेश की 300 से अधिक महिलाओं को जलवायु चैम्पियन के रूप में प्रशिक्षित कर रहा है. इसके तहत, उन्हें टिकाऊ कृषि व मैन्ग्रोव वन बहाली के गुर सिखाए जा रहे हैं, जिससे जलवायु सहनसक्षमता का निर्माण व आजीविकाओं का संरक्षण तो सम्भव हुआ ही है, साथ ही महिलाओं में अभूतपूर्व आत्मविश्वास का संचार भी हुआ है.
देबजानी मंडल, ओडिशा के तटीय ज़िले केन्द्रापाड़ा की एक तेज़ दोपहर में, अपने धान के खेतों के बीच खड़ी, अपने अनुभवी हाथों से मिट्टी की जाँच कर रही हैं.
34 वर्षीय किसान, देबजानी मंडल, अथक गर्मी की परवाह किए बिना, उस ज़मीन का निरीक्षण करने में लगीं हैं, जो कभी उनके लिए मुसीबत बन गई थी. वो ज़मीन, कभी एक मौसम में सूखी रहती थी, तो दूसरे मौसम में उसी ज़मीन में जलभराव के कारण परेशानी उत्पन्न हो जाती थी.
कुछ ही समय पहले की बात है जब देबजानी इस खेत में फ़सल उगाने के लिए संघर्ष कर रही थीं. अनियमित मानसून के कारण, कभी उपजाऊ रहे खेत, हाल के समय में कम उपज देने लगे थे, जिससे कई किसानों को क़र्ज़ लेने के लिए मजबूर होना पड़ा था.
देबजानी के लिए हालात तब बदले, जब उन्होंने सरकार समर्थित एक जलवायु सहनसक्षमता परियोजना के तहत, चावलों की खेती के नए तरीक़े अपनाए. तरीक़ा आकर्षक था: कम पानी और कम रसायनों के साथ अधिक उपज. फिर भी, पीढ़ियों से चले आ रहे पारम्परिक तरीक़े को बदलने के ख़याल से लोगों को डर लगता था.
वो बताती हैं, "शुरुआत में, दूसरों को समझाना मुश्किल था. लेकिन जब उन्होंने मेरी फ़सलों को फलते-फूलते देखा, तो वो हमारी बात सुनने लगे."
देबजानी जल्द ही, वो अपने खेतों की देखभाल का काम सम्भालने के साथ-साथ, अपने समुदाय में किसानों के पूरे समूहों का नेतृत्व करने लगीं. उन्होंने अन्य किसानों को चावल उगाने का वो तरीक़ा सिखाया, जो प्रकृति के अनुकूल हो, उसके ख़िलाफ़ नहीं.
जलवायु परिवर्तन के ख़िलाफ़ लड़ाई में अग्रणी
सौ मील दूर, बालासोर ज़िले के बाढ़ की सम्भावना वाले क्षेत्र में, ज्योत्सना रानी प्रधान जलवायु परिवर्तन के ख़िलाफ़ एक अलग लड़ाई लड़ रही हैं. एक गृहिणी और दो बच्चों की माँ ज्योत्सना पर्यावरणविद तब बनीं, जब बाढ़ का बढ़ता पानी उनके घर में प्रवेश कर गया. बाढ़ अब केवल मौसमी परेशानी नहीं है; यह अस्तित्व के लिए ख़तरा बन गई है.
जब ज़्योत्सना को देबजानी और 'जलवायु चैम्पियंस' के बढ़ते नैटवर्क के बारे में पता चला तो उन्होंने भी इसका हिस्सा बनने का पक्का इरादा कर लिया. अब ये जलवायु नायिकाएँ, महिला प्रधान जलवायु अनुकूल खेती एवं समुदाय संचालित सहनसक्षमता में बढ़-चढ़कर भाग ले रही हैं.
ज्योत्सना ने दृढ़ संकल्प के साथ, अपने गाँव में बैठकें आयोजित करना शुरू किया, और किसानों को उन तकनीकों से परिचित कराया जो क्षेत्र के बढ़ते अनियमित मौसमी रुझान का सामना कर सकते थे. उन्होंने संसाधनों के बँटवारे व सामूहिक कार्रवाई को प्रोत्साहित किया.
हालाँकि उनके विचारों को पहले सन्देह भरी नज़रों से देखा गया. लेकिन उन्होंने हार नहीं मानी. वो कहती हैं, "लोग तभी सुनते हैं, जब वो अपनी आँखों से बदलाव देखते हैं." और जल्द ही, वो सुनने लगे.
ओडिशा के तटीय गाँवों में एक शान्त क्रान्ति
देबजानी और ज्योत्सना जैसी महिलाओं की सफलता ने ओडिशा के तटीय गाँवों में एक शान्त क्रान्ति को जन्म दिया है. खेती और वित्तीय मामलों में कभी उपेक्षित रहीं महिलाएँ, अब सहनसक्षमता की रचयिता बन गई हैं.
उन्होंने साबित किया है कि टिकाऊ समाधानों से भूमि व उसके लोगों, दोनों का कल्याण होता है. उनके प्रयासों से फ़सल उत्पादन और घरेलू आय में वृद्धि हुई है. साथ ही, सामुदायिक सम्बन्ध मज़बूत हुए हैं, जिससे अलग-अलग होने वाले प्रयास, एक सामूहिक आन्दोलन में बदल गए हैं.
ओडिशा, अपने निचले तटों और कमज़ोर पारिस्थितिक तंत्र के साथ, जलवायु परिवर्तन की अग्रिम पंक्ति में है. बढ़ते समुद्री स्तर और नमकीन पानी के प्रवेश से, न केवल खेत बल्कि सम्पूर्ण आजीविकाएँ ख़तरे में हैं. महिलाएँ इन चुनौतियों का सबसे बड़ा बोझ उठाती हैं, जबकि उन पर पारम्परिक रूप से घरेलू व कृषि कार्य, दोनों की ज़िम्मेदारी होती है, लेकिन अब वो पीछे नहीं हटकर, आगे बढ़कर इस चुनौती का सामना कर रही हैं.
भारत सरकार, हरित जलवायु कोष और यूएनडीपी की मदद से, ओडिशा में 300 से अधिक महिलाओं को जलवायु चैम्पियन के रूप में प्रशिक्षित किया गया है. उन्हें टिकाऊ कृषि, जैविक बीजों का उपचार और कीट प्रबन्धन का प्रशिक्षण दिया गया है. साथ ही, मैन्ग्रोव वनों को बहाल करने के गुर भी सिखाए गए हैं, जो तूफ़ान की लहरों के ख़िलाफ़ प्राकृतिक ढाल का काम करते हैं. इसके अलावा, आपदा की तैयारी में प्रशिक्षण के ज़रिए अपने समुदायों का मार्गदर्शन करना सिखाया गया है.
कृषि से परे: मज़बूत समुदायों का गठन
देबजानी और ज्योत्सना, कृषि के अलावा भी बहुत कुछ करती हैं. वे परिवारों को सरकारी योजनाओं से जोड़ते हैं, पर्यावरण अनुकूल प्रथाओं को बढ़ावा देती हैं, अगली पीढ़ी को प्रशिक्षित करती हैं, और स्थानीय युवाओं के लिए जागरूकता कार्यक्रम चलाते हैं. वे स्व-सहायता समूहों और सामुदायिक संघों के साथ सहयोग करके, सुनिश्चित करती हैं कि ये पहल निरन्तर चलती रहे.
देबजानी के लिए यह परिवर्तन बेहद व्यक्तिगत है.
वह कहती हैं, "मैं पहले अपने घर से, बहुत कम ही बाहर निकलती थी. लेकिन अब, मैं अर्थपूर्ण चर्चाओं में भाग लेती हूँ, जहाँ लोग मुझसे मिलकर, मेरी सलाह लेते हैं. इससे मुझे ग़ज़ब का आत्मविश्वास जागा है. मैं चाहती हूँ कि मेरी बहनें भी इसका अनुभव करें."
उनके गाँव की महिलाओं ने यह बदलाव देखा है. वे अब जलवायु परिवर्तन को एक अमूर्त ख़तरे के रूप में नहीं, बल्कि एक ऐसी चुनौती के रूप में देखती हैं, जिससे ज्ञान, एकता एवं दृढ़ संकल्प के साथ निपटा जा सकता है.