भारत: घर-घर ममता की 'दस्तक', यूनीसेफ़ की बाल मदद योजना
भारत में, यूनीसेफ़ के दस्तक अभियान के तहत, उत्तर प्रदेश के गोरखपुर ज़िले के एक गाँव में, एंसेफ़लाइटिस जैसे ख़तरनाक रोग से लड़ने में बड़ी सफलता हासिल हुई है. कभी अति गम्भीर एंसेफ़लाइटिस सिंड्रोम (AES) और जापानी एंसेफ़लाइटिस (JE) से पीड़ित इस ज़िले में अब स्वास्थ्य को लेकर नवीन चेतना व जागरूकता फैल रही है, जिससे इस रोग की रोकथाम सम्भव हुई है.
उत्तर प्रदेश के गोरखपुर के जैनपुर गाँव में सुबह हो चुकी है. गाँव में पक्षियों की चहचहाहट, स्कूल जाते बच्चों की साइकिल की घंटियाँ, नई जल टैंक प्रणाली से पानी भरने जाती महिलाओं की आवाज़ें गूंज रहीं हैं.
इस सबके बीच आशा कार्यकर्ता ममता देवी भी अपनी रोज़ाना की दिनचर्या के लिए तैयार हो रही हैं.
अचानक फ़ोन की एक घंटी, ममता के घर की शान्ति को भंग कर देती है.
फ़ोन पर एक चिन्तित माँ की आवाज़ सुनाई देती है, “आशा दीदी, मेरे बच्चे को बहुत तेज़ बुख़ार है. मैंने 108 पर कॉल कर दिया है.”
ममता जल्दी से अपना स्वास्थ्य बैग उठाते हुए जवाब देती हैं, "आपने बिल्कुल सही किया, मैं तुरन्त आती हूँ. मेरा इन्तज़ार करना."
ममता, फ़ोन करने वाली माँ के घर पहुँचकर दरवाज़े पर दस्तक देती हैं. ममता की यह दस्तक, दरवाज़े पर केवल एक खटखटाहट नहीं, बल्कि ख़तरनाक बीमारियों से जूझ रहे परिवारों के लिए स्वास्थ्य, सुरक्षा व उम्मीद का एक वादा है.
ममता, दरवाज़ा खटखटाते हुए सोचती हैं, "मेरा काम यही है - मेरे समुदाय की मदद के लिए खड़े रहना और उनकी मदद करना."
पहल की शुरुआत
वर्ष 2018 से पहले गोरखपुर ज़िला, इस भयानक महामारी की चपेट में था. ख़ासतौर पर मानसून के मौसम में मच्छरों के काटने से होने वाले अति गम्भीर एंसेफ़लाइटिस सिंड्रोम (AES) और जापानी एंसेफ़लाइटिस (JE) से यहाँ सैकड़ों बच्चों की जान गई थी.
ममता याद करते हुए बताती हैं, “उस समय हमें नहीं मालूम था कि यह क्या बीमारी है. बच्चों के माता-पिता को लगने लगा था कि यह कोई अभिशाप है, और इसलिए वो चिकित्सा सेवाएँ लेने के बजाय झाड़-फूँक करवाने लगे थे. जब तक बच्चों को अस्पताल लाया जाता, बहुत देर हो चुकी होती थी.”
तब वर्ष 2018 में यूनीसेफ़ के सहयोग से उत्तर प्रदेश सरकार ने दस्तक अभियान शुरू किया. इसके तहत अति गम्भीर एंसेफ़लाइटिस सिंड्रोम और जापानी एंसेफ़लाइटिस से निपटने के लिए तात्कालिक जवाबी कार्रवाई की गई.
गोरखपुर के मुख्य चिकित्सा अधिकारी डॉक्टर आशुतोष कुमार दुबे बताते हैं कि, दस्तक का मतलब है हर घर होने वाली दस्तक! जो सुनिश्चित करती है कि कोई भी बच्चा पीछे न रह जाए.”
अभियान का मक़सद, बीमारी के लक्षणों को पहचान कर, टीकाकरण के ज़रिए इसकी रोकथाम करना है. अभियान के तहत, हर घर जाकर लोगों को जागरूक किया गया.
भारत में यूनीसेफ़ के सामाजिक और व्यवहार परिवर्तन अधिकारी दया शंकर सिंह ने बताया कि, “यूनीसेफ़ और स्वास्थ्य विभाग के सहयोग से चले इस अभियान (दस्तक) की शुरुआत 7 ज़िलो से की गई.
बुख़ार के लिए तत्काल चिकित्सा देखभाल और सुरक्षित जल इस्तेमाल करने की आदत को बढ़ावा दिया गया. इसके लिए, आशा कार्यकर्ताओं और आंगनवाड़ी कर्मचारियों को समुदाय के साथ संवाद करने व उन्हें प्रभावी तरीक़े से समझाने का प्रशिक्षण दिया गया.''
ई-कवच से मदद
आशा कार्यकर्ता के रूप में दस्तक अभियान के साथ जुड़कर ममता की भूमिका में बदलाव आया. ममता, प्रशिक्षण के बाद, स्वास्थ्य के प्रति अपने समुदाय का नज़रिया बदलने के काम में लग गईं.
ममता ने बताया कि, "हमने सबसे पहले बीमारी के शुरुआती लक्षणों को पहचानने व उसे लेकर परिवारों के सलाह देनी सीखी. हमें मामलों की निगरानी करने के लिए eKavach पोर्टल जैसे डिजिटल उपकरण का उपयोग करना भी सिखाया गया."
eKavach पोर्टल, स्वास्थ्य कर्मियों और सामुदायिक स्वास्थ्य अधिकारियों (CHOs) को, बेहतर तरीक़े से स्वास्थ्य सेवाएँ मुहैया कराने में मदद करता है.
यह उन्हें मातृ एवं शिशु स्वास्थ्य, पोषण और ग़ैर-संचारी रोगों जैसे क्षेत्रों में, परिवारों के लिए महत्वपूर्ण स्वास्थ्य जानकारी उपलब्ध करवाने और उनकी निगरानी करने में मदद करता है.
ममता हर दिन अपने स्वास्थ्य थैले में पर्चियाँ और स्टिकर भरकर, घर-घर जाती हैं. ममता का कहना है, “शुरुआत में यह आसान नहीं था. परिवारों को टीकाकरण को लेकर झिझक थी. उन्हें लगता था कि इंजेक्शन उनके बच्चों को बीमार कर देंगे. टीकाकरण सुरक्षित है यह भरोसा दिलाने के लिए मैंने समुदाय के लोगों के सामने अपने बच्चों को टीका लगाया. तब जाकर उन्हें मुझ पर यक़ीन हुआ.”
ममता के लिए दस्तक अभियान एक महत्वपूर्ण मोड़ साबित हुआ. इस अभियान से ममता को न केवल प्रशिक्षण मिला, बल्कि ज़रूरी उपकरण व विशेषज्ञों की सहायता भी उपलब्ध हुई.
वह बताती हैं, “हमने जल्दी से शुरुआती लक्षणों को पहचानने, परिवारों को परामर्श देने और जीवन को बचाने के लिए तुरन्त कार्रवाई करनी सीखी. पहली बार मुझे लगा कि मेरे काम से वास्तविक बदलाव आ रहा है.”
प्रदेश व्यापी अभियान
यह अभियान प्रदेश आन्दोलन के रूप में उभरा, जिसने सभी 75 ज़िलों में जागरूकता की क्रान्ति ला दी और टीकाकरण दर में वृद्धि देखने को मिली. सरकारी स्वास्थ्य सुविधाओं में विश्वास बढ़ने से, लोग पंजीकृत चिकित्सकों से इलाज कराने वाले लोगों की संख्या में घटने लगी.
स्वच्छ जल, साफ़-सफ़ाई और मच्छर नियंत्रण में महत्वपूर्ण सुधार हुए, जिससे गोरखपुर में एईएस और जेई के मामलों में कमी आई.
अपने गाँव में ममता, दस्तक अभियान का चेहरा बनकर उभरी. अब हर घर ममता का गर्मजोशी से स्वागत करता है. यूनीसेफ़ के साथ, स्वास्थ्य, स्वच्छता और शिक्षा समेत लगभग 16 सरकारी विभाग काम करते हैं, जिन्हें यूनीसेफ़ तकनीकी मार्गदर्शन तथा संसाधन प्रदान करता है.
अभियान का असर
दस्तक अभियान का एक प्रमुख उपकरण था- रोग के लक्षणों की पहचान करके शीघ्रतम उपचार करना. ममता को एक मामला अब भी याद है. उनके गाँव में एक लड़के को मानसून के मौसम में तेज़ बुख़ार हो गया था. उसके माता-पिता ने, थोड़ा झिझकने के बाद ममता को बुलाया.
ममता ने अभिभावकों को तुरन्त 108 पर कॉल करने को कहा और उनके साथ स्वास्थ्य केन्द्र में गई. बाल गहन चिकित्सा इकाई (PICU) में लड़के को उचित उपचार हासिल हुआ.
बाल रोग विशेषज्ञ डॉक्टर ज्ञान प्रकाश गुप्ता बताते हैं, ''दस्तक अभियान से पहले ऐसी बीमारी से अक्सर बच्चों की मौत हो जाती थी. अब अभिभावक तुरन्त अपने बच्चों को लेकर अस्पताल आते हैं और पीआईसीयू व प्रशिक्षित आशा कार्यक्रताओं की बदौलत हम बच्चों की जान बचाने में सफल होते हैं.”
दस्तक अभियान के तहत ममता स्वास्थ्य शिविर आयोजित कराती है, जिसमें बच्चों का JE के ख़िलाफ़ टीकाकरण किया जाता है. शिविर में माताएँ, स्वास्थ्य से जुड़े परार्मश लेने आती हैं. ममता बताती हैं कि, “टीके बच्चों को उन बीमारियों से बचाते हैं, जिनसे कभी हमारे समुदाय में तबाही मच गई थी.”
गाँव की एक माँ नीलू ने बताया, “आशा दीदी ने हमे समझाया कि टीके किस तरह काम करते हैं. अब मुझे अपने बच्चों को टीके लगवाने से डर नहीं लगता, बल्कि भरोसा है कि टीका लगवाने से मेरा बच्चा सुरक्षित रहेगा.”
दस्तक अभियान आरम्भ होने के बाद, उत्तर प्रदेश में सकारात्मक स्वास्थ्य परिणाम सामने आए. अब हर साल 35 लाख 91 हज़ार से अधिक परिवार, आगे बढ़कर एईएस और जेई से बचने के लिए टीकाकरण करवा रहे हैं.