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2024 में, हर चार में से एक देश में, महिला अधिकारों पर बढ़ा विरोध

ब्राजील में लड़कियां खेल की वकालत को बढ़ावा देने के लिए संयुक्त राष्ट्र महिला और आईओसी के कार्यक्रम में भाग लेती हैं। उन्हें हाथ पकड़कर एक वृत्त बनाते हुए कैमरे की ओर देखते हुए दिखाया गया है।
© UN Women/Rossana Fraga ब्राज़ील में महिलाएँ अपने अधिकारों के लिए प्रदर्शन कर रही हैं.

2024 में, हर चार में से एक देश में, महिला अधिकारों पर बढ़ा विरोध

महिलाएँ

महिला सशक्तिकरण के लिए प्रयासरत यूएन संस्था (UN Women) की एक नई रिपोर्ट के अनुसार, दुनिया भर में महिलाओं व लड़कियों के बुनियादी अधिकारों को अभूतपूर्व ख़तरों का सामना करना पड़ रहा है. महिलाओं को पहले से कहीं अधिक स्तर पर भेदभाव से जूझना पड़ रहा है, उनके लिए क़ानूनी संरक्षण कमज़ोर है और उनकी रक्षा व समर्थन पर केन्द्रित कार्यक्रमों व संस्थाओं के लिए कम धनराशि उपलब्ध है.

यूएन एजेंसी ने 8 मार्च को अन्तरराष्ट्रीय महिला दिवस से ठीक पहले, गुरूवार को Women's Rights in Review 30 Years After Beijing नामक अपनी रिपोर्ट प्रकाशित की है, जिसके अनुसार एक-चौथाई देशों में महिला अधिकारों पर प्रतिघात हो रहा है.

महिला अधिकारों के लिए कई दशकों की पैरोकारी के बावजूद, आर्थिक अस्थिरता, जलवायु संकट, हिंसक टकराव और राजनैतिक विरोध के कारण लैंगिक समानता के लिए हालात बिगड़ रहे हैं.

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इतिहास में किसी ना किसी समय पर 87 देशों का नेतृत्व महिलाओं द्वारा किया जा चुका है, मगर वास्तविक समानता साकार करने के लिए अब भी एक लम्बा रास्ता तय किया जाना है.

रिपोर्ट में चिन्ता जताई गई है कि हर 10 मिनट में किसी पारिवारिक सदस्य या अंतरंग साथी द्वारा एक महिला या लड़की को जान से मारा जा रहा है.

डिजिटल जगत में लैंगिक विषमताएँ गहरी हुई हैं, कृत्रिम बुद्धिमता व सोशल मीडिया प्लैटफ़ॉर्म पर हानिकारक प्रवृत्तियों को बढ़ावा मिल रहा है, जबकि महिलाओं व लड़कियों को डिजिटल व टैक्नॉलॉजी क्षेत्र में समुचित प्रतिनिधित्व हासिल नहीं है.

बीते दशक में, हिंसक टकराव की चपेट में आने वाली महिलाओं व लड़कियों की संख्या में 50 फ़ीसदी की वृद्धि हुई है, महिला अधिकार कार्यकर्ताओं को उत्पीड़न झेलना पड़ रहा है और उन पर निजी हमले व उन्हें मार दिए जाने के मामले बढ़े हैं.

यूएन एजेंसी के अनुसार, कोविड-19 जैसे संकटों, बढ़ती खाद्य व ईंधन क़ीमतों और लोकतांत्रिक संस्थाओं के क्षरण से ना केवल प्रगति धीमी हो रही है, बल्कि अब तक दर्ज की गई प्रगति की दिशा भी पलट रही है.

बीजिंग+30, अब तक प्रगति

वर्ष 2025 में महिला अधिकारों के नज़रिये से अहम बीजिंग घोषणापत्र की 30वीं वर्षगाँठ है, जोकि उनके अधिकारों को आगे बढ़ाने के लिए एक दिग्गदर्शक रोडमैप है. नवीनतम रिपोर्ट के अनुसार, इसके तहत हुई प्रगति को समझा जाना अहम है.

1995 में 189 देशों की सरकारों ने चीन की राजधानी बीजिंग में सभी महिलाओं व लड़कियों के लिए समान अधिकारों को हासिल करने की महत्वाकाँक्षी योजना पर सहमति जताई थी.

1995 के बाद से अब तक, देशों ने लैंगिक समानता को बढ़ावा देने के लिए 1,531 क़ानूनी सुधार लागू किए हैं, मातृत्व मृत्यु दर में एक-तिहाई की गिरावट आई है, और संसद में महिलाओं का प्रतिनिधित्व दोगुने से अधिक हो गया है.

बेहतरी के लिए उपाय

इसके बावजूद, यह स्पष्ट किया गया है कि 2030 एजेंडा के उद्देश्यों को साकार करने के लिए अभी लम्बा सफ़र तय किया जाना होगा. प्रगति की रफ़्तार बढ़ाने के लिए बीजिंग+30 कार्रवाई एजेंडा में इसी इरादे से प्राथमिकताएँ तय की गई हैं.

इसके तहत, टैक्नॉलॉजी की सुलभता को बढ़ाना, उसमें समानता व सुरक्षा को सुनिश्चित किया जाना होगा. सामाजिक संरक्षा, सार्वभौमिक स्वास्थ्य देखभाल व शिक्षा में निवेश किए जाने होंगे, जिनसे महिलाओं की आर्थिक स्वाधीनता को बल मिल सकता है.

इसके अलावा महिलाओं के नेतृत्व वाले संगठनों के लिए वित्तीय मदद का प्रावधान करना होगा. स्थाई शान्ति व पर्यावरणीय नीतियों में उनका नेतृत्व भी अहम है, और हरित रोज़गारों में उनकी भागेदारी भी.

रिपोर्ट के अनुसार, देशों को महिलाओं व लड़कियों के विरुद्ध हिंसा का अन्त करने वाले क़ानून लागू करने होंगे, और प्रतिक्रिया व रोकथाम उपायों पर केन्द्रित सामुदायिक संगठनों को समर्थन प्रदान करना होगा.

बीजिंग घोषणापत्र की 30 वर्षगाँठ, और महिलाओं की स्थिति पर यूएन आयोग की आगामी बैठक, लैंगिक समानता को राष्ट्रीय नीतियों, क्षेत्रीय रणनीतियों व वैश्विक समझौतों का एक अहम हिस्सा बनाने का अवसर है,