आगाह कर रही हैं ‘ख़तरनाक परमाणु बयानबाज़ी और धमकियाँ’, यूएन प्रमुख
संयुक्त राष्ट्र महासचिव एंतोनियो गुटेरेश ने कहा है कि ‘ख़तरनाक परमाणु बयानबाज़ी व धमकियों’ के बीच तेज़ी से बढ़ता भू-राजनैतिक तनाव, एक ख़तरे की घंटी है. उन्होंने सभी देशों से इस चेतावनी को समझकर, क़ानूनी रूप से बाध्यकारी परमाणु अस्त्र निषेध सन्धि को तात्कालिक समर्थन देने का आहवान किया है.
निरस्त्रीकरण मामलों के लिए संयुक्त राष्ट्र की उच्च प्रतिनिधि इज़ूमी नाकामित्सू ने संयुक्त राष्ट्र प्रमुख की ओर से कहा, “निरस्त्रीकरण के महत्वपूर्ण तंत्र कमज़ोर पड़ते जा रहे हैं.”
इज़ूमी नाकामित्सू ने यह टिप्पणी, न्यूयॉर्क स्थित संयुक्त राष्ट्र मुख्यालय में 3 से 7 मार्च तक चलने वाली परमाणु अस्त्र निषेध सन्धि के पक्षधर देशों की तीसरी बैठक के उदघाटन सत्र के दौरान की.
उन्होंने चिन्ता व्यक्त करते हुए कहा कि वर्तमान अप्रत्याशित परिस्थितियाँ, लोगों में डर बढ़ाकर, इस ग़लत धारणा को मज़बूत कर सकती हैं कि पूर्ण सुरक्षा के लिए परमाणु हथियारों का होना बेहद ज़रूरी है.
आशा की किरण
संयुक्त राष्ट्र निरस्त्रीकरण प्रमुख ने हालाँकि यह भी कहा कि इस चुनौतीपूर्ण परिदृश्य के बावजूद, उम्मीद की कुछ वजहें भी हैं.
एक कारण यह है कि इन हथियारों के विनाशकारी प्रभाव को लेकर वैश्विक स्तर पर जागरूकता बढ़ रही है.
उन्होंने ‘भविष्य के लिए समझौते’ की ओर इशारा करते हुए कहा कि इसमें पूरा ध्यान परमाणु हथियार से मुक्त विश्व पर केन्द्रित किया गया है. साथ ही, 2024 में जापानी ग़ैर-सरकारी संगठन, Nihon Hidankyo को नोबेल शान्ति पुरस्कार से सम्मानित किया जाना भी एक अच्छा संकेत है है, क्योंकि यह संस्था परमाणु हथियारों के पूर्ण उन्मूलन के लिए काम करती है.
इज़ूमी नाकामित्सू ने कहा कि परमाणु अस्त्र निषेध सन्धि में देशों की बढ़ती सदस्यता, नागरिक समाज के साथ व्यापक जुड़ाव और नवीन स्थापित वैज्ञानिक नैटवर्कों से भी आशा जागी है. इस नैटवर्क के विशेषज्ञों द्वारा साक्ष्य-आधारित जानकारी उपलब्ध करवाई जाती है.
अब तक, 73 देश इस सन्धि की पुष्टि या अनुमोदन कर चुके हैं और 94 देशों ने इस पर हस्ताक्षर किए हैं.
परमाणु शस्त्र-मुक्त विश्व की ओर बढ़ते क़दम
इस सप्ताह, सरकारें, अन्तरराष्ट्रीय संगठन और नागरिक समाज, परमाणु अस्त्र निषेध सन्धि के पक्षधर देशों की तीसरी बैठक के लिए एकत्रित हो रहे हैं. इस बैठक का मुख्य एजेंडा, सन्धि के पहले समीक्षा सम्मेलन की तैयारी व भविष्य के चरण की रूपरेखा तैयार करना है.
इसमें होने वाली पैनल चर्चाएँ और बहसें कई महत्वपूर्ण विषयों पर केन्द्रित होंगी, जिनमें परमाणु संघर्ष से मानवता को होने वाले ख़तरे और इसके विनाशकारी मानवीय परिणाम, सुरक्षा सम्बन्धी चिन्ताएँ, पीड़ितों की सहायता और पर्यावरण सुधार के प्रयास जैसे मुद्दे शामिल हैं.
सन्धि में क्या है?
दरअसल परमाणु अस्त्र निषेध पर क़ानूनी रूप से बाध्यकारी सन्धि, पिछले दो दशकों में पहली बहुपक्षीय परमाणु निरस्त्रीकरण सन्धि है. इसे 7 जुलाई 2017 को अपनाया गया और 22 जनवरी 2021 में लागू किया गया.
उस समय, संयुक्त राष्ट्र महासचिव ने इसे परमाणु हथियार-मुक्त विश्व हासिल करने के लक्ष्य की ओर एक महत्वपूर्ण क़दम बताते हुए कहा था कि यह परमाणु निरस्त्रीकरण के बहुपक्षीय दृष्टिकोण के प्रति मज़बूत समर्थन दर्शाती है.
इस सन्धि के तहत, परमाणु हथियारों से जुड़ी किसी भी गतिविधि में शामिल होने पर व्यापक प्रतिबन्धों का प्रावधान है.
इसमें परमाणु हथियारों के विकास, परीक्षण, उत्पादन, अधिग्रहण, स्वामित्व, भंडारण, उपयोग या इस्तेमाल की धमकी देने पर रोक लगाई गई है.
इस सन्धि में, किसी भी राष्ट्र में परमाणु हथियारों की तैनाती पर भी रोक है, या फिर किसी अन्य देश को प्रतिबन्धित गतिविधियों में सहायता देने पर भी रोक है.
इसके अलावा, पक्षधर देशों द्वारा उन व्यक्तियों की मदद का प्रावधान है, जो उनके अधिकार क्षेत्र में परमाणु हथियारों के उपयोग या परीक्षण से प्रभावित हुए हैं.
साथ ही इसमें, परमाणु हथियारों के परीक्षण या उपयोग के कारण दूषित होने वाले क्षेत्रों की पुनर्बहाली के लिए उचित पर्यावरणीय सुधार प्रयास करने के भी प्रावधान शामिल किए गए हैं.
परमाणु अस्त्र निषेध सन्धि पर पूरी जानकारी यहाँ उपलब्ध है.