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UNESCO: दुनिया का सबसे विशाल आध्यात्मिक आयोजन – महाकुम्भ

भारत में महाकुंभ मेले के दौरान विभिन्न पृष्ठभूमियों के लोगों की एक विशाल भीड़ धूल भरी सड़क पर चल रही है।
© UN News/Rohit Upadhyay इस महाकुम्भ मेले में देश-विदेश से आए लगभग 66 करोड़ श्रद्धालु शामिल हुए.

UNESCO: दुनिया का सबसे विशाल आध्यात्मिक आयोजन – महाकुम्भ

संस्कृति और शिक्षा

यूनेस्को की सूची में, 'अमूर्त सांस्कृतिक विरासत घोषित', दुनिया के सबसे विशाल आध्यात्मिक आयोजन के रूप में सूचित, महाकुम्भ मेला, हाल ही में, उत्तर प्रदेश के प्रयागराज (पूर्व इलाहाबाद) में सम्पन्न हुआ है, जिसमें देश-विदेश से आए करोड़ों श्रद्धालुओं ने पवित्र स्नान किया. यूएन एजेंसियों - यूनीसेफ़ और विश्व स्वास्थ्य संगठन (WHO) ने भी इस महाकुम्भ के आयोजन में योगदान किया.

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इस महाकुम्भ मेले में देश-विदेश से आए लगभग 60 करोड़ से अधिक श्रद्धालु शामिल हुए जिन्होंने ने गंगा-यमुना और सरस्वती नदी के पवित्र संगम पर पानी में डुबकी लगाई.

महाकुम्भ एक महत्वपूर्ण हिन्दू धार्मिक पर्व है. 

इसमें, देश-विदेश के श्रद्धालु, साधू-सन्त और नागा साधू, गंगा नदी के पवित्र जल में धार्मिक स्नान करते हैं,

इसके कारण, इसे एक आध्यात्मिक और सांस्कृतिक संगम कहा जाता है.

यूनेस्को ने, सहिष्णुता और समावेशिता के प्रतीक इस कुम्भ मेले को दिसम्बर 2017 में, यूनेस्को ने अमूर्त सांस्कृतिक विरासत (IHC) की सूची में शामिल किया था.

2025 के महाकुम्भ में, भारत में यूनेस्को के डायरेक्टर टिम कर्टिस ने भी संगम में स्नान की डुबकी लगाई.

एक विरासत का जीवन्त उदाहरण

टिम कर्टिस ने महाकुम्भ को दुनिया का सबसे बड़ा आध्यात्मिक मेला बताया. 

उनके मुताबिक़ महाकुम्भ से सांस्कृतिक विरासत की अनोखी झलक मिलती है. 

टिम कर्टिस कहते हैं, “यहाँ आने के बाद एक अलग ही ऊर्जा और माहौल का ऐहसास हुआ. इतने सारे लोगों को एक स्थान पर इकट्ठे देखना और इस पर्व में ख़ुशी-ख़ुशी इसमें शामिल होना, एक शानदार अनुभव रहा."

"इसे हर किसी को देखना चाहिए.”

उन्होंने कहा, “यह दिखाता है कि संस्कृति केवल इमारतों में नहीं है, बल्कि लोगों के आपसी जुड़ाव और परम्पराओं में बसती है."

"इतने बड़े स्तर पर आयोजित यह मेला न केवल भारत के, बल्कि दुनिया भर के लोगों को जोड़ता है, और एक गहरी आत्मीयता व अपनापन महसूस कराता है.”

“यह एक जीवन्त विरासत का बेहतरीन उदाहरण है, जो पीढ़ियों से चली आ रही परम्पराओं को सहेजकर उन्हें और आगे बढ़ाता है.”

महाकुम्भ में शामिल होने के लिए भारत के अलावा अन्य देशों से भी बहुत से लोग आए. 

स्पेन से आए इगूज़की (Eguzki)ने अपना अनुभव सुनाते हुए कहा, मैं महाकुम्भ मेले में आकर बहुत प्रसन्न हूँ, क्योंकि 144 साल के बाद ऐसा खगोलीय संयोग बना है जो पृथ्वी, इनसानों और जीवों के लिए बहुत महत्व रखता है.

महाकुम्भ मेले की विशेषताओं में, कुछ मुख्य स्नान भी शामिल हैं. मसलन, पहला शाही स्नान जो कि पौष पूर्णिमा के दिन होता है. 

UNESCO के निदेशक टिम कर्टिस भारत के प्रयागराज में महाकुंभ उत्सव के दौरान एक पात्र से नदी में तरल पदार्थ डालने की रस्म में भाग लेते हैं।
© UN News/Rohit Upadhyay

इसके बाद मकर संक्रान्ति स्नान फिर मौनी अमावस्या का स्नान जिसे मुख्य शाही स्नान भी कहा जाता है. इसके बाद बसन्त पंचमी स्नान, माघ पूर्णिमा स्नान और अन्त में महाशिवरात्रि स्नान.

कानपुर से आए एक श्रद्धालु का कहना था कि 144 साल बाद ये महाकुम्भ आया है तो हम लोगों का बहुत बड़ा सौभाग्य है. हम लोग केवल शरीर धोने के लिए नहीं आए, बल्कि यह धर्म की डुबकी है.

लंबे बालों और पीली पगड़ी वाला एक व्यक्ति भारतीय मंदिर में जटिल नक्काशीदार लकड़ी के दरवाजों के सामने खड़ा है और अपने हाथ से इशारा कर रहा है।
© UN News/Rohit Upadhyay

इसी तरह चैक गणराज्य से आए एक व्यक्ति ने संगम स्नान के अनुभव सुनाते हुए कहा, "दो पवित्र स्नान के बाद अब मैं स्वयं में बदलाव महसूस कर रहा हूँ. ऐसा लगता है जैसे गंगा जी ने मुझे वैसा बना दिया है जैसा कि वास्तव में मैं हूँ."

महाकुम्भ 45 दिनों तक चला और 26 फ़रवरी को महाशिवरात्रि स्नान के बाद समाप्त हुआ.