'नई पीढ़ी अलग है': जिबूती में महिला ख़तना के उन्मूलन की ज़ोरदार पैरवी
“वो चाकू अब भी मेरी आँखों में जगह बनाए हुए है, और वो महिला भी, जिसने मुझे पकड़कर गिरा दिया था.” ये शब्द हैं हवाअ मोहम्मद कामिल के जिनकी उम्र अब 30 वर्ष हो चुकी है. उन्हें जब महिला ख़तना (FGM) का शिकार बनाया गया, तब उनकी उम्र केवल 6 वर्ष थी. वो ऐसा अनुभव था जिसने उनके जीवन में ना केवल शारीरिक, बल्कि गहरे मनोवैज्ञानिक घाव भी छोड़े. मगर अब बदलाव की बयार ज़ोर पकड़ रही है.
हवाअ मोहम्मद कामिल संयुक्त राष्ट्र की यौन एवं प्रजनन एजेंसी, UNFPA के साथ बात करते हुए कहती हैं, “मुझे अब हर पुरुष, हर व्यक्ति, हर चीज़ से डर लगता है.”
अन्तरराष्ट्रीय स्तर पर महिला जनानांग विकृति को, मानवाधिकार हनन माना जाता है, जिसमें ग़ैर-चिकित्सीय कारणों के लिए, महिला जननांग के एक हिस्से को हटाया या उसे क्षति पहुँचाई जाती है.
दुनिया भर में 23 करोड़ लड़कियाँ व महिलाएँ इस प्रथा से पीड़ित हैं. इनके अलावा लगभग 2 करोड़ 70 लाख अन्य महिलाओं व लड़कियों को अगले पाँच वर्षों के दौरान, इस प्रथा के शिकार बनाए जाने का ख़तरा है.
हवाअ मोहम्मद कामिल ने अपने डर और ग़ुस्से को सही दिशा देने के लिए, UNFPA समर्थित 'ऐले एंड ऐलेस' नैटवर्क के साथ जुड़कर इस प्रथा का विरोध करने का रास्ता चुना. यह नैटवर्क, जिबूती में यौन एवं प्रजनन स्वास्थ्य व अधिकारों की पैरवी करता है.
यह समूह, जिबूती शहर से सुदूर गाँवों की यात्रा करके जागरूकता बढ़ाने का काम करता है. इस समूह के सदस्य ख़ासतौर पर लड़कों को जागरूक करने पर ध्यान देते हैं, क्योंकि वो सामाजिक दृष्टिकोण बदलने में महत्वपूर्ण भूमिका निभा सकते हैं.
हवाअ मोहम्मद कामिल ने अपने परिवारजन को भी इस सन्देश को अपनाने के लिए प्रोत्साहित किया. एक रूढ़िवादी क्षेत्र के लिए यह एक सरल मगर क्रान्तिकारी सन्देश था: महिला ख़तना से दूर हट जाएँ.
दुष्चक्र को तोड़ना ज़रूरी
उत्तरी-मध्य तडजौराह क्षेत्र में, 39 वर्षीय ख़दीजा, मीलों लम्बे कठिन रास्ते पार करके, परिवारों को अपनी बेटियों को इस प्रथा से दूर रखने के लिए, राज़ी करने के लिए जाती हैं.
जब महिला जननांग विकृति के उन्मूलन पर यूएनएफ़पीए-यूनीसेफ़ के संयुक्त कार्यक्रम का जागरूकता सत्र उनके गाँव ओटॉय आया, तो उन्होंने उससे प्रेरित होकर इस अभियान में शामिल होने का फ़ैसला किया.
उन्होंने यूएनएफ़पीए को बताया, "पच्चीस साल पहले, मैंने अपनी बेटी को महिला ख़तना से गुज़रने दिया था. लेकिन अब मैंने क़सम खाई है कि मैं अपनी पोती की इस प्रथा से रक्षा करूँगी."ख़दीजा स्वयं इस प्रथा की शिकार रही हैं.
उन्होंने महिला ख़तना के दर्द, उससे होने वाले संक्रमण, प्रसव के दौरान जटिलताओं व दुखद मौतों को अपनी आँखों से देखा है.
उन्होंने कहा, "हमने अनेक महिलाओं का जीवन ख़त्म होते देखा है. [महिला ख़तना की शिकार महिलाओं के] स्वास्थ्य सुविधा केन्द्र तक पहुँचने से पहले ही, अत्यधिक ख़ून बहने से उनकी मौत हो गई."
उन्होंने बदलाव के अपने सन्देश को पहले महिलाओं, फिर पुरुषों व धार्मिक नेताओं के ज़रिए लोगों तक पहुँचाना शुरू किया. लेकिन उनका यह सफ़र आसान नहीं था. महिलाओं ने बताया कि उन्हें समुदायों ने बहिष्कृत कर दिया व 'झूठी जानकारी' फैलाने के लिए दंडित किया गया.
ख़दीजा बताती हैं, "लोगों को मेरे इरादों पर शक़ था. वो यह मानने को क़तई तैयार नहीं थे कि मैं यह काम बिना किसी लालच के, अपने दिल से कर रही हूँ." लेकिन उनका इरादा अटल रहा है. हवाअ मोहम्मद कामिल कहती हैं, "आज हम जो बदलाव देख रहे हैं, मुझे उस पर गर्व है."
ख़दीजा के लिए यह परिवर्तन बहुत अहम रहा है: उनके गाँव ने हाल ही में, सार्वजनिक तौर पर इस प्रथा को हमेशा के लिए त्यागने की घोषणा की है.
उनका कहना था, "परिवर्तन में समय लगता है, लेकिन अन्ततः यह मुमकिन होता है."
प्रतिरोध के ज़रिए सबक़
एक स्कूल में कक्षा में बच्चों व किशोरों की आवाज़ें गूँज रही है. वो एक स्वर में फ्रैंच वाक्यों का पाठ कर रहे हैं. लेकिन 31 वर्षीय इब्राहीम, इस व्याकरण और शब्दावली के पाठों से परे एक गहन शिक्षा देने में लगे हैं - लड़कियों के अधिकारों और उनकी बेहतर रहन-सहन के महत्व की शिक्षा.
"मैंने क़सम खाई है कि अगर मेरी शादी होती है और मेरे यहाँ बेटियाँ जन्म लेती हैं, तो मैं उन्हें इस प्रथा की शिकार नहीं होने देने व कष्ट नहीं उठाने दूंगा."
इब्राहीम अपने पाठों में महिला ख़तना की हानियों के बारे में जागरूकता का समावेश करके, अपने युवा छात्रों को धीरे-धीरे, लड़कियों के सशक्तिकरण एवं उत्कृष्ट स्वास्थ्य का रास्ता अपनाने के लिए प्रेरित करते हैं.
लेकिन जब उनकी पहली बेटी का जन्म हुआ, तो इब्राहीम को अपना वादा पूरा करने के लिए, अपनी पत्नी व दादी समेत पूरे परिवार के विरोध का सामना करना पड़ा. उन्होंने इसके बावजूद, सही रास्ता चुनते हुए अपना संकल्प पूरा करने का फ़ैसला किया.
उन्होंने कहा, "सबसे महत्वपूर्ण चीज़ स्वास्थ्य है. मैं सभी परिवारों से आग्रह करता हूँ कि वे अपनी लड़कियों के स्वास्थ्य पर ध्यान दें और उन्हें ख़तना प्रथा की शिकार नहीं बनाएँ."
महिला जननांग विकृति के ख़िलाफ़, इब्राहीम के विचारों ने उनके समुदाय को सकारात्मक रूप में प्रभावित किया और 100 से अधिक लोग अब इस प्रथा के विरोध में खड़े हैं.
एक धार्मिक महिला का नेतृत्व
पाँच बच्चों की माँ, 46 वर्षीय हावी मोहम्मद एक सामुदायिक कार्यकर्ता व एक सम्मानित धार्मिक नेता हैं. वह शमीख़त जिबूती नैटवर्क की प्रमुख सदस्य भी हैं, जोकि महिला जननांग विकृति का विरोध करने वाला एक समूह है जिसमें क्षेत्रीय धार्मिक नेता शामिल हैं. हावी मोहम्मद ख़ुद भी महिला ख़तना की पीड़ित रही हैं.
बचपन में उन्हें infibulation से गुज़रना पड़ा, जिसमें लड़की के बाहरी जननांग के कुछ हिस्सों या सभी हिस्सों को हटा दिया जाता था और खुले हिस्से को सील कर दिया जाता था.
यह एक कष्टदायक और ख़तरनाक प्रक्रिया है, जिससे गम्भीर रक्तस्राव, संक्रमण तथा अक्सर मृत्यु भी हो जाती है. हावी ने बताया कि उन्हें इसकी पूरी समझ युवावस्था में आई कि यह उनके अधिकारों का हनन था. ख़ासतौर पर मासिक धर्म के दौरान बेहद कष्टदायक दर्द होता था.
वो कहती हैं, “मैं स्कूली शिक्षा हासिल नहीं कर सकी. मुझे सामान्य काम करने के लिए भी दर्दनिवारक इंजेक्शन लेने पड़ते थे.''उनके रौष ने उन्हें पैरोकारी के रास्ते पर आगे बढ़ाया, और आज वो अफ़ारी भाषा में एक लोकप्रिय रेडियो व टेलीविज़न कार्यक्रम पेश करकती हैं.
साथ ही, मस्जिदों में ऐसे व्याख्यान देती हैं जो इस्लाम के परम्परागत विश्लेषण को चुनौती देते हैं और इस्लाम की सच्ची भावना को उजागर करते हैं. वो इनके माध्यम से देश के दूरदराज़ के इलाक़ों में जागरूकता फैलाती हैं.
हावी ने बताया, "जब हम महिला जननांग विकृति के बारे में बात करते थे तो लोग बचने लगते थे. लेकिन नई पीढ़ी अलग है. माताएँ शिक्षित हैं, जागरूक हैं.
वो अब डॉक्टर, कार्यकर्ता व शिक्षक हैं.” हावी की बेटियाँ और भतीजियाँ, उनकी प्रतिबद्धता की जीती-जागती सबूत हैं: हावी ने, परिवार और समुदाय के सदस्यों के दबाव का सामना करने के बावजूद, अपनी बेटियों और भतीजियों को महिला ख़तना की शिकार नहीं होने दिया.
उनका कहना है, "मैं बहुत दर्द झेल चुकी हूँ - मैं किसी भी लड़की को उस कष्ट से नहीं गुज़रने दूंगी, जैसा मुझे सहन करना पड़ा था."