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म्याँमार में हिंसा समाप्त करके, टिकाऊ राजनैतिक समाधान की पुकार

म्याँमार के कुछ इलाक़ों में आम लोगों को स्वच्छ जल उपलब्ध नहीं है.
© UNICEF/Nyan Zay Htet
म्याँमार के कुछ इलाक़ों में आम लोगों को स्वच्छ जल उपलब्ध नहीं है.

म्याँमार में हिंसा समाप्त करके, टिकाऊ राजनैतिक समाधान की पुकार

मानवाधिकार

संयुक्त राष्ट्र के मानवाधिकार उच्चायुक्त कार्यालय (OHCHR) ने कहा है कि म्याँमार की सेना ने पिछले साल के दौरान, आम लोगों के खिलाफ़ हिंसा को अभूतपूर्व स्तर तक बढ़ा दिया, जिसके कारण, चार साल पहले सेना द्वारा किए गए तख़्तापलट के बाद से, पिछले साल के दौरान सबसे ज़्यादा आम लोग मारे गए हैं. मानवाधिकार उच्चायुक्त वोल्कर टर्क ने देश में हिंसा समाप्त करके, एक टिकाऊ राजनैतिक समाधान निकाले जाने का आहवान किया है.

वर्ष 2024 में युद्ध के विश्लेषण में पाया गया कि सत्ता पर, जैसे-जैसे सेना की पकड़ कमज़ोर होती गई, उसने आम लोगों और नागरिक आबादी वाले क्षेत्रों पर जवाबी हवाई हमलों और तोपख़ाने की गोलाबारी का सिलसिला शुरू किया.

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सेना ने, हज़ारों युवाओं को सैन्य सेवा में जाने के लिए मजबूर किया, मनमाने ढंग से लोगों की गिरफ़्तारियाँ कीं और मुक़दमे चलाए, बड़े पैमाने पर लोगों को विस्थापित होने के लिए विवश किया.

इसके अलावा, प्राकृतिक आपदाओं के बीच भी, मानवीय सहायता करने वालों को, ज़रूरतमन्द लोगों तक पहुँच से वंचित रखा.

यूएन मानवाधिकार कार्यालय की एक प्रैस विज्ञप्ति में कहा गया है कि राजनैतिक क़ैदियों के लिए सहायता संघ (AAPP) के अनुसार, पिछले चार वर्षों में सेना ने कम से कम 6 हज़ार 231 आम लोगों की हत्याएँ की गई हैं, जिनमें 1 हज़ार 144 महिलाएँ और 709 बच्चे हैं.

वर्ष 2024 में, कम से कम 1 हज़ार 824 लोग मारे गए, जिनमें 531 महिलाएँ और 248 बच्चे थे.

संयुक्त राष्ट्र के मानवाधिकार उच्चायुक्त वोल्कर टर्क ने शुक्रवार को कहा है, “चार साल बाद, यह देखना बेहद दुखद है कि आम लोगों के लिए वास्तविक स्थिति दिन-ब-दिन बदतर होती जा रही है."

उन्होंने कहा, "यहाँ तक कि सेना की शक्ति कम होने के बावजूद भी, उसके अत्याचार और हिंसा का दायरा व तीव्रता बढ़ गए हैं.

जवाबी हमलों को इस तरह तैयार किया गया और अंजाम दिया गया कि आबादी को नियंत्रित किया जा सका, उसे डराया जा सके और दंडित किया जा सके.

अत्यधिक क्रूरता व दंडमुक्ति

वोल्कर टर्क ने कहा, "सैना द्वारा खड़े किए गए इस मानवाधिकार संकट ने, आम लोगों के ख़िलाफ़ अन्धाधुन्ध हमले किए जाने, लोगों तक मानवीय सहायता पहुँचाए जाने से इनकार किए जाने और मानवाधिकारों के व्यवस्थित उल्लंघन के माध्यम से, अनगिनत पीड़ाएँ दी गई हैं.

"इस क्रूरता को तुरन्त समाप्त किए बिना और अपराधियों के लिए जवाबदेही तय किए बिना, हताहत हुए आम लोगों की संख्या में वृद्धि जारी रहेगी और आम लोगों के लिए समग्र स्थिति अनिवार्य रूप से बिगड़ती रहेगी."

पिछले एक साल के इस विश्लेषण में अत्यन्त क्रूरता वाले कृत्य भी दर्ज किए गए हैं, जिनमें लोगों का सिर क़लम करना, उन्हें जलाने, अंग-भंग करने, फाँसी देने, यातना देने और मानव ढाल का उपयोग करने जैसी अत्यधिक क्रूरतापूर्ण घटनाएँ शामिल हैं. आम लोगों के ख़िलाफ़ इन कृत्यों को पूरी तरह से दंड से मुक्त होकर अंजाम दिया गया.

सैनिकों ने कई बस्तियों में सक्रिय लड़ाई की अनुपस्थिति में ही, गाँवों पर हमला किया ऐसा सम्भवतः अन्य क्षेत्रों में सैन्य-विरोधी सशस्त्र गुटों की बढ़त के प्रतिशोध में किया गया.

यूएन मानवाधिकार कार्यालय का कहना है कि सिविल बुनियादी ढाँचे, स्कूलों, पूजा स्थलों, स्वास्थ्य सुविधाओं, देश के भीतर ही विस्थापित लोगों के लिए बनाए शिविरों और सार्वजनिक समारोहों को जानबूझकर निशाना बनाने से, बड़ी संख्या में आम लोग हताहत हुए और लोगों का विस्थापन हुआ है. साथ ही, शिक्षा और स्वास्थ्य सेवा जैसी आवश्यक सेवाओं में बाधा उत्पन्न हुई.

आम लोगों को संचार बन्द होने और ख़ुद की व्यापक निगरानी किए जाने का भी ख़ामियाज़ा भुगतना पड़ा, जिससे जीवन रक्षक और बचाव कार्यों में बाधा उत्पन्न हुई.

वर्ष 2024 में सैन्य-विरोधी गुटों द्वारा, आम लोगों के ख़िलाफ़ की गई हिंसा ने भी सुरक्षा सम्बन्धी चिन्ताएँ पैदा कीं, अलबत्ता, इस हिंसा की तुलना, सेना द्वारा की गई हिंसा के स्तर और दायरे के साथ नहीं की जा सकती.

संयुक्त राष्ट्र मानवाधिकार कार्यालय को, सैन्य विरोधी सशस्त्र गुटों द्वारा, अपने नियंत्रण वाले क्षेत्रों में अंजाम दी गई यातना, न्यायेतर हत्याओं, यौन हिंसा, जबरन भर्ती और अन्य दुर्व्यवहारों के आरोप भी प्राप्त हुए हैं.

राख़ीन प्रान्त में बदतर स्थिति

म्याँमार के अशान्त पूर्वी क्षेत्र से जान बचाकर भागने के बाद एक परिवार सुरक्षा की तलाश में है.
© UNOCHA/Siegfried Modola

वोल्कर टर्क ने कहा कि वह राख़ीन प्रान्त में स्थिति के तेज़ी से बिगड़ने और रोहिंज्या आबादी सहित सभी समुदायों के लिए दरपेश गम्भीर सुरक्षा जोखिमों से चिन्तित हैं.

उन्होंने कहा है, "रोहिंज्या लोग, ख़ुद को युद्धरत अराकान सेना और देश की सेना के बीच फँसा हुआ पाते हैं, जहाँ सुरक्षा के लिए कोई जगह नहीं है. वे पूरे साल पीड़ित रहे क्योंकि उनके गाँव जला दिए गए और रोहिंज्या युवाओं को सैन्य सेवा में लगाया गया.”

“मानवीय सहायता बन्द कर दी गई जबकि उन्हें बार-बार विस्थापन के लिए मजबूर होना पड़ा, सुरक्षा के लिए किसी भी तरह के साधन को खोजने के प्रयास में भागना पड़ा."

वोल्कर टर्क ने कहा, "चूँकि अराकान सेना ने राख़ीन प्रान्त पर अपना नियंत्रण मज़बूत कर लिया है, इसलिए उन्हें अन्तरराष्ट्रीय मानवाधिकार क़ानून और अन्तरराष्ट्रीय मानवीय क़ानून का सम्मान करना चाहिए और अपने नियंत्रण वाले क्षेत्रों में सभी जन की रक्षा करनी चाहिए."

ग़ौरतलब है कि म्याँमार में, लगभग दो करोड़ लोगों को मानवीय सहायता की आवश्यकता है.

संयुक्त राष्ट्र के आँकड़े बताते हैं कि 35 लाख से अधिक लोग विस्थापित हुए हैं, जिनमें से एक तिहाई बच्चे हैं, हालाँकि सिविल सोसायटी संगठनों के आँकड़ों से मालूम होता है कि कुल संख्या इससे दोगुनी से भी अधिक हो सकती है.

वर्ष 2024 के दौरान, विस्थापन का एक प्रमुख कारण, सेना द्वारा हज़ारों युवाओं की जबरन भर्ती करना था, जिसमें रोहिंज्या समुदाय के सदस्य भी शामिल थे. इससे लोगों में व्यापक भय फैल गया. हज़ारों युवा छिप गए हैं या विदेश भाग गए हैं, जिससे 18 से 35 वर्ष की आयु के बहुत से लोगों का बहुत बड़ा श्रम बल ग़ायब हो गया है, और आर्थिक संकट बदतर हो गया है.

वोल्कर टर्क ने प्रभावशाली देशों, विशेष रूप से क्षेत्र के देशों से, म्याँमार में हिंसा को समाप्त करने के लिए दोगुना प्रयास करने, पूर्ण और निर्बाध मानवीय सहायता पहुँच के लिए दबाव डालने का आग्रह किया है.

उन्होंने राजनैतिक आधार पर हिरासत में लिए गए सभी लोगों की रिहाई, लोकतंत्र और मानवाधिकारों को बढ़ावा देने वाले पक्षकारों के साथ सार्थक रूप से जुड़ने और हिंसा व उत्पीड़न से बचकर भागने वालों के लिए अन्तरराष्ट्रीय सुरक्षा सुनिश्चित करने का आहवान भी किया.

मानवाधिकार उच्चायुक्त ने कहा कि अंजाम दिए गए अपराधों के मामलों में दंडमुक्ति क़ायम रहने की ज़िम्मेदारी भी अन्तरराष्ट्रीय समुदाय पर ही है.

उन्होंने ज़ोर देकर कहा कि न्याय और जवाबदेही के सात एक टिकाऊ राजनैतिक समादान तलाश किए जाने की सख़्त ज़रूरत है जिसके ज़रिए यह सुनिश्चित किया जा सके कि म्याँमार के लोगों को फिर कभी ऐसी पीड़ाओं का सामना नहीं करना पड़े, जो उन्होंने पिछले चार वर्षों मके दौरान किया है.