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म्याँमार: राख़ीन प्रान्त में बिगड़ते हालात, मानवाधिकार उच्चायुक्त ने किया आगाह

म्याँमार में टकराव जारी रहने के कारण, देश के भीतर ही विस्थापित हुए लोगों की संख्या, 20 लाख से अधिक हो गई है (फ़ाइल चित्र).
© UNICEF/Patrick Brown
म्याँमार में टकराव जारी रहने के कारण, देश के भीतर ही विस्थापित हुए लोगों की संख्या, 20 लाख से अधिक हो गई है (फ़ाइल चित्र).

म्याँमार: राख़ीन प्रान्त में बिगड़ते हालात, मानवाधिकार उच्चायुक्त ने किया आगाह

मानवाधिकार

संयुक्त राष्ट्र मानवाधिकार उच्चायुक्त कार्यालय (OHCHR) ने म्याँमार के राख़ीन प्रान्त में सैन्य नेतृत्व और विरोधी सशस्त्र बल, ‘अराकान आर्मी,’ के बीच बढ़ती हिंसा पर चिन्ता जताई है. यूएन कार्यालय ने आगाह किया है कि राख़ीन में रोहिंज्या और अन्य जातीय समुदायों के बीच तनाव भी बढ़ रहा है, जिससे नागरिक आबादी के लिए ख़तरा है और अतीत में हुए अत्याचारों को फिर से दोहराए जाने का जोखिम है.

म्याँमार की सेना और विरोधी गुट के बीच अनौपचारिक संघर्षविराम क़रीब एक वर्ष तक जारी रहा, मगर पिछले वर्ष नवम्बर में यह टूट गया, जब राख़ीन के 17 में से 15 टाउनशिप लड़ाई की चपेट में आए. 

इन घटनाओं में सैकड़ों लोग हताहत हुए और तीन लाख से अधिक लोग विस्थापित होने के लिए मजबूर हुए हैं.

म्याँमार के राख़ीन प्रान्त में सेना द्वारा वर्ष 2017 में रोहिंज्या समुदाय पर क्रूर कार्रवाई की गई थी, जिसमें कम से कम 10 हज़ार पुरुषों, महिलाओं व बच्चों की जान गई. 

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साथ ही, रोहिंज्या समुदाय के साढ़े सात लाख से अधिक लोगों ने जान बचाने के लिए अन्य देशों का रुख़ किया, और लाखों रोहिंज्या पड़ोसी देश बांग्लादेश के शरणार्थी शिविरों में रह रहे हैं.  

बड़े पैमाने पर लड़ाई

यूएन मानवाधिकार प्रमुख वोल्कर टर्क ने कहा कि राख़ीन प्रान्त एक बार फिर से अनेक पक्षों के लिए रणभूमि बन गया है, और आम नागरिकों को इसकी एक बड़ी क़ीमत चुकानी पड़ रही है. रोहिंज्या लोगों पर विशेष रूप से जोखिम है. 

“यह ख़ासतौर पर परेशान करने वाली बात है कि जहाँ 2017 में रोहिंज्या को एक समूह द्वारा निशाना बनाया गया था, अब वे दो सशस्त्र धड़ों के बीच फँसे हुए हैं, जिन्होंने अतीत में उन्हें जान से मारा है. हमें एक बार फिर रोहिंज्या लोगों को निशाना बनाए जाने से रोकना होगा.”

मानवाधिकार उच्चायुक्त कार्यालय के अनुसार, म्याँमार की सेना के नियंत्रण से ज़मीन खिसकती जा रही है और अराकान आर्मी का उत्तरी व मध्य राख़ीन में दबदबा बढ़ रहा है.

इस वजह से प्रान्त के कई इलाक़ों में लड़ाई तेज़ हो गई है, जहाँ बड़ी संख्या में रोहिंज्या समुदाय बसा है. इसके अलावा, जल्द ही राख़ीन की राजधानी सित्वे पर नियंत्रण के लिए बड़े पैमाने पर हिंसक टकराव भड़कने की आशंका है.

सेना में जबरन भर्ती

उच्चायुक्त टर्क ने कहा कि म्याँमार की सेना हार का सामना कर रही है और इस वजह से जबरन या रिश्वत देकर रोहिंज्या लोगों को सैनिकों के रूप में भर्ती करने के लिए मजबूर किया जा रहा है.

उन्होंने कहा कि छह वर्ष पहले के घटनाक्रम और रोहिंज्या समुदाय के साथ होने वाले भेदभाव की पृष्ठभूमि में यह अक्षम्य है कि उन्हें इस तरह से निशाना बनाया जा रहा है.

कुछ रिपोर्टों के अनुसार, सेना द्वारा भर्ती किए गए रोहिंज्या लोगों को जबरन राख़ीन में जातीय समुदाय के लोगों के घर, इमारतों व गाँव जलाने के लिए मजबूर किया जा रहा है.

इसके जवाब में ग्रामीणों द्वारा रोहिंज्या समुदाय के गाँवों को जलाए जाने की घटनाएँ हुई हैं. संयुक्त राष्ट्र कार्यालय ऐसी सभी रिपोर्टों की पुष्टि करने का प्रयास कर रहा है, मगर पूरे राज्य में संचार व्यवस्था ठप होने की वजह से इसमें मुश्किलें पेश आ रही हैं.

नफ़रत, दुष्प्रचार पर चिन्ता

उच्चायुक्त टर्क के अनुसार, जानबूझकर ग़लत सूचना व प्रोपेगेंडा को फैलाया जा रहा है, और ऐसे दावे किए जा रहे हैं कि इस्लामी आतंकवादियों ने हिन्दू और बौद्ध समुदाय के लोगों को बंधक बना लिया है. 

“यह वैसा ही नफ़रत भरा वृतान्त है, जिससे 2012 में सामुदायिक हिंसा को हवा मिली और फिर 2017 में रोहिंज्या के विरुद्ध भयावह हमले किए गए.”

इस वर्ष की शुरुआत से ही, अराकान आर्मी ने रोहिंज्या समुदाय के गाँवों के इर्दगिर्द मोर्चा सम्भाला हुआ है, और इस वजह से वहाँ म्याँमार की सेना द्वारा रोहिंज्या लोगों पर हमले किए गए हैं. 

वोल्कर टर्क ने कहा कि ख़तरे की घंटिया बज रही हैं, और इसलिए अतीत को दोहराए जाने से रोकना होगा. इसके लिए यह ज़रूरी है कि राख़ीन प्रान्त में म्याँमार की सेना और सशस्त्र गुटों द्वारा आम लोगों की रक्षा सुनिश्चित की जाए, ताकि रोहिंज्या समुदाय के उत्पीड़न को रोका जा सके.