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ग़ाज़ा: रमदान के दौरान तुरन्त युद्धविराम के लिए, सुरक्षा परिषद में प्रस्ताव पारित

ग़ाज़ा में तत्काल युद्धविराम की मांग करने वाले प्रस्ताव पर, सुरक्षा परिषद की बैठक (25 मार्च 2024)
UN Photo/Loey Felipe
ग़ाज़ा में तत्काल युद्धविराम की मांग करने वाले प्रस्ताव पर, सुरक्षा परिषद की बैठक (25 मार्च 2024)

ग़ाज़ा: रमदान के दौरान तुरन्त युद्धविराम के लिए, सुरक्षा परिषद में प्रस्ताव पारित

शान्ति और सुरक्षा

संयुक्त राष्ट्र सुरक्षा परिषद ने सोमवार को, ग़ाज़ा पट्टी में युद्ध और मानवीय पीड़ा पर विराम लगाने के लिए, तत्काल युद्धविराम लागू किए जाने और तमाम बन्धकों की तत्काल व बिना शर्ति रिहाई की मांग करने वाला एक नया प्रस्ताव पारित कर दिया है. इससे पहले, पिछले शुक्रवार को अमेरिका द्वारा प्रस्तावित एक मसौदे को रूस और चीन ने वीटो कर दिया था.

मोज़ाम्बीक़ के राजदूत पेरो अफ़ोंसो ने यूएन सुरक्षा परिषद के 10 निर्वाचित अस्थाई सदस्य देशों की ओर यह प्रस्ताव पेश किया, जिसमें मुख्य रूप से तीन मांगें की गई थीं:

ग़ाज़ा में युद्धविराम, बन्धकों की रिहाई और ग़ाज़ा में मानवीय सहायता का प्रावधान. 

इस प्रस्ताव के पक्ष में 14 वोट डाले गए, जबकि अमेरिका ने मतदान में हिस्सा नहीं लिया.

प्रस्ताव के मसौदे में 'स्थाई' युद्धविराम शब्द का इस्तेमाल किया गया था, जिसे बदल कर 'तुरन्त' युद्धविराम कर दिया गया.

संयुक्त राष्ट्र महासचिव एंतोनियो गुटेरेश ने सोशल मीडिया प्लैटफ़ॉर्म, X, पर अपनी प्रतिक्रिया में कहा कि इस बहु-प्रतीक्षित प्रस्ताव को लागू किया जाना होगा. “ऐसा करने में परिषद की विफलता अक्षम्य होगी.”

7 अक्टूबर को इसराइल पर हमास के आतंकी हमलों और उसके बाद ग़ाज़ा में इसराइल की जवाबी कार्रवाई के बाद से अब तक, सुरक्षा परिषद में इस विषय पर अब तक कई प्रस्ताव लाए जा चुके हैं. 

मगर, सुरक्षा परिषद के कुछ स्थाई सदस्य देशों (चीन, फ़्राँस, रूस, ब्रिटेन, अमेरिका) ने अपने वीटो अधिकार के ज़रिये नकार दिया.

यह प्रस्ताव, 11 मार्च को शुरू हुए रमदान के महीने में युद्धविराम लागू किए जाने की पुकार है. साथ ही, इसराइल पर हमलों के दौरान बन्धक बनाए लोगों में से शेष 130 लोगों को रिहा किए जाने की मांग की गई है.

वहीं, ग़ाज़ा में विशाल स्तर पर उपजी आवश्यकताओं और ज़रूरतमन्द आबादी तक मानवीय सहायता पहुँचाने पर बल दिया गया है, जोकि भुखमरी के कगार पर पहुँच चुकी है.  

यूएन में फ़लस्तीन के लिए स्थाई पर्यवेक्षक रियाद मन्सूर ने सुरक्षा परिषद में सदस्य देशों को सम्बोधित किया.
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यूएन में फ़लस्तीन के लिए स्थाई पर्यवेक्षक रियाद मन्सूर ने सुरक्षा परिषद में सदस्य देशों को सम्बोधित किया.

ग़ाज़ा में व्यथा का अन्त करना होगा: फ़लस्तीन

यूएन में फ़लस्तीन के लिए स्थाई पर्यवेक्षक रियाद मंसूर ने कहा कि ग़ाज़ा में एक लाख से अधिक फ़लस्तीनियों के मारे जाने या घायल होने के बाद, तुरन्त युद्धविराम की मांग करने में छह महीने का समय लगा है.

राजदूत मंसूर ने कहा कि ग़ाज़ा में फ़लस्तीनी लोग चिल्लाए, रोए, उन्होंने बददुआएँ दीं, प्रार्थना की और बार-बार मुश्किल हालात का किसी तरह सामना किया.

“अब वे अकाल के हाल में रह रहे हैं और अनेक लोग तो, अपने ही घरों के मलबे में दबे हुए हैं.” 

“उनकी इस व्यथा पर विराम लगाया जाना होगा, और इसका तुरन्त करना होगा, अभी.”

रियाद मंसूर के अनुसार, इसराइली अपराधों के ज़रिये अन्तरराष्ट्रीय क़ानून को तबाह किया जा रहा है, और अन्तरराष्ट्रीय आपराधिक न्यायालय के अनिवार्य आदेश को लागू करने के बजाय, इसराइल ने अपनी कार्रवाई को और बढ़ा दिया है.

संयुक्त राष्ट्र में इसराइल के स्थाई प्रतिनिधि और राजदूत गिलाद ऐर्दान ने सुरक्षा परिषद में सदस्य देशों को सम्बोधित किया.
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संयुक्त राष्ट्र में इसराइल के स्थाई प्रतिनिधि और राजदूत गिलाद ऐर्दान ने सुरक्षा परिषद में सदस्य देशों को सम्बोधित किया.

हमास की निन्दा ना करना शर्मनाक है: इसराइल

यूएन में इसराइल के स्थाई प्रतिनिधि और राजदूत गिलाद ऐर्दान ने सुरक्षा परिषद से सवाल किया कि पीड़ितों के साथ भेदभाव क्यों किया जा रहा है. 

उन्होंने कहा कि शुक्रवार को मॉस्को के एक कॉन्सर्ट हॉल में हुए घातक हमले की निन्दा की गई थी, मगर, सुरक्षा परिषद, 7 अक्टूबर को नोवा संगीत समारोह की निन्दा करने में परिषद विफल रही है.

इसराइली राजदूत ने कहा कि आम नागरिक, भले ही वे कहीं भी हों, संगीत का सुरक्षापूर्ण माहौल में आनन्द लेने के हक़दार हैं और सुरक्षा परिषद को बिना भेदभाव के, नैतिक स्पष्टता के साथ ऐसे आतंकी कृत्यों की समान रूप से निन्दा करनी चाहिए. 

उनके अनुसार सुरक्षा परिषद ने 7 अक्टूबर को संहार की निन्दा करने से मना कर दिया, जोकि शर्मनाक है. इसराइली राजदूत ने कहा कि जब बात बन्धकों को घर वापिस लाने की हो, तो सुरक्षा परिषद को शब्दों पर, नहीं वास्तविक कार्रवाई पर ध्यान केन्द्रित करना होगा.

नए मसौदे के अहम बिन्दु 

  • रमदान के महीने के लिए तुरन्त युद्धविराम की मांग की गई है, जिसका सभी पक्षों द्वारा सम्मान किया जाना होगा. साथ ही, इससे एक स्थाई, सतत युद्धविराम का मार्ग प्रशस्त होगा.
     
  • सभी बन्धकों की तत्काल, बिना किसी शर्त के रिहाई की जानी होगी, और उनकी चिकित्सा व अन्य मानवतावादी आवश्यकताओं को पूरा करने के लिए उन तक पहुँच सुनिश्चित करनी होगी.
     
  • हिरासत में रखे गए सभी बन्दियों के सम्बन्ध में, सभी पक्षों को अन्तरराष्ट्रीय क़ानून के तहत अपने तयशुदा दायित्वों का निर्वहन करना होगा.
     
  • ग़ाज़ा में मानवीय सहायता का प्रवाह जल्द से जल्द बढ़ाने पर बल दिया गया है ताकि पूरी ग़ाज़ा पट्टी में आम लोगों के संरक्षण को सुनिश्चित किया जा सके. 
     
  • मानवीय सहायता के मार्ग में आने वाले सभी अवरोधों को दूर करने की मांग की गई है, जिसे अन्तरराष्ट्रीय मानवतावादी क़ानून और प्रस्ताव 2712 (2023) और प्रस्ताव 2720 (2023) के अनुरूप पूरा करना होगा.

इसराइल पर हमलों में 1,200 से अधिक लोगों की जान गई थी और 240 को बन्धक बना लिया गया था. इसके बाद, इसराइली कार्रवाई में अब तक 32 हज़ार फ़लस्तीनी मारे गए गए हैं और हज़ारों अन्य लोग घायल हुए हैं.

दक्षिणी ग़ाज़ा पट्टी के ख़ान यूनिस में ध्वस्त इमारतें.
© UNICEF/James Elder
दक्षिणी ग़ाज़ा पट्टी के ख़ान यूनिस में ध्वस्त इमारतें.

ग़ाज़ा में जारी लड़ाई और इसराइली बमबारी के बीच, जल और विद्युत व्यवस्था बुरी तरह प्रभावित हुई है और मानवीय सहायता को प्रभावित इलाक़ों में पहुँचाने के मार्ग में अवरोध हैं. 

ग़ाज़ा पट्टी में हिंसक टकराव पर विराम लगाने के लिए सुरक्षा परिषद की कई बैठकें हो चुकी हैं, मगर फ़िलहाल यह सम्भव नहीं हो पाया है.

युद्धविराम की पुकार

नवम्बर 2023 में एक सप्ताह के लिए लड़ाई रोकी गई थी और ग़ाज़ा से बन्धकों और इसराइल से फ़लस्तीनी बन्दियों की अदला-बदली हुई थी.

मगर, इसके बाद लड़ाई फिर भड़क उठी और इसमें तेज़ी आई है. ग़ाज़ा में मृतक संख्या और भूख व कुपोषण से प्रभावित फ़लस्तीनियों की संख्या निरन्तर बढ़ रही है.

इसके मद्देनज़र, लड़ाई को जल्द से जल्द रोके जाने और मानवीय पीड़ा पर मरहम लगाने की मांग भी प्रबल हो रही है.

इससे पहले, सुरक्षा परिषद में विफल रहे प्रस्तावों में मोटे तौर पर यही प्रावधान थे. वहीं 2023 के अन्तिम दिनों में प्रस्ताव 2712 और 2720 पारित किया गया और उनमें भी यही भाषा थी. 

मगर युद्ध पर तुरन्त विराम लगाने के लिए 15 सदस्य देशों वाली सुरक्षा परिषद में कड़ा रुख़ लेने के विषय पर अब भी मतभेद हैं.