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ब्रिटेन: शरण पाने के इच्छुक लोगों को रवांडा भेजने के लिए बिल, ‘मानवाधिकारों पर प्रहार’

उत्तरी फ़्रांस के कैलेह में एक शिविर में प्रवासी, इंग्लैंड पहुँचने की प्रतीक्षा कर रहे हैं. (फ़ाइल)
© UNICEF/Laurence Geai
उत्तरी फ़्रांस के कैलेह में एक शिविर में प्रवासी, इंग्लैंड पहुँचने की प्रतीक्षा कर रहे हैं. (फ़ाइल)

ब्रिटेन: शरण पाने के इच्छुक लोगों को रवांडा भेजने के लिए बिल, ‘मानवाधिकारों पर प्रहार’

मानवाधिकार

संयुक्त राष्ट्र मानवाधिकार उच्चायुक्त (OHCHR) वोल्कर टर्क ने कहा है कि ब्रिटेन में शरण लेने के इच्छुक लोगों को जल्द से जल्द देश निकाला देने और उन्हें रवांडा भेजे जाने के लिए, ब्रिटेन सरकार द्वारा उठाए गए क़दम, क़ानून के राज के बुनियादी सिद्धान्तों के विपरीत और मानवाधिकारों पर एक गम्भीर प्रहार हैं.

बड़ी संख्या में लोग शरण पाने के इरादे से, अपनी जान जोखिम में डालते हुए छोटी नावों पर सवार होकर, इंग्लिश चैनल समेत अन्य मार्गों से होकर ब्रिटेन में अनियमित ढंग से प्रवेश करते हैं.

यूएन शरणार्थी संगठन ने आशंका जताई है कि इस नए क़ानूनी प्रस्ताव के लागू होने की स्थिति में, ऐसी यात्राएँ करके ब्रिटेन पहुँचने वाले लोग, शरणार्थी संरक्षण पाने के अपने अधिकार से वंचित हो जाएंगे.

साथ ही, ऐसी स्थिति में शरण पाने के इच्छुक लोगों की व्यक्तिगत परिस्थितियों की जाँच किए बिना ही, उन्हें हिरासत में रखा या फिर देश निकाला दिया जा सकता है.

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यूएन मानवाधिकार उच्चायुक्त वोल्कर टर्क ने सोमवार को जारी अपने एक वक्तव्य में ब्रिटेन की सरकार के इस निर्णय की आलोचना की है.

इन क़ानूनी उपायों में ब्रिटेन की अदालतों से ऐसी शक्तियाँ वापिस ले ली गई, जिनके तहत शरण आकाँक्षी लोगों को ब्रिटेन से बाहर भेजे जाने के मामलों की सुनवाई हो सकती थी.

अन्तरराष्ट्रीय क़ानून के तहत शरणार्थियों और शरण पाने के इच्छुक लोगों को उन देशों में जबरन वापिस नहीं भेजा जा सकता है, जहाँ उनके उत्पीड़न का ख़तरा हो.

पुनर्विचार की अपील

यूएन मानवाधिकार उच्चायुक्त ने ध्यान दिलाया कि इस बिल में सरकारी मंत्री, आव्रजन अधिकारी, कोर्ट या शरण सम्बन्धी निर्णयों की समीक्षा करने वाले ट्राइब्यूनल, सभी निर्णय-निर्धारकों से रवांडा को एक सुरक्षित देश मानने की अपेक्षा की गई है. 

वोल्कर टर्क ने कहा कि इस सम्बन्ध में फ़िलहाल जो साक्ष्य उपलब्ध हैं, या भविष्य में सामने आ सकते हैं, उसके बावजूद यह प्रावधान किया गया है, और इसलिए इस बिल पर पुनर्विचार किया जाना चाहिए.

मानवाधिकार मामलों के प्रमुख ने कहा कि विवादित तथ्यों के मुद्दों और मानवाधिकारों से जुड़े अहम सवालों को, कोर्ट द्वारा सुलटाया जाता है, औऱ ब्रिटेन की अदालतों ने अतीत में, गहराई तक जाकर ऐसे मामलों में अपनी भूमिका निभाई है.

अदालतों की अहम भूमिका

इसके मद्देज़र, उन्होंने आग्रह किया कि यह निर्णय अदालतों पर छोड़ा जाना चाहिए कि रवांडा में जोखिमों पर सर्वोच्च न्यायालय के फ़ैसले के बाद से अब तक, सरकार द्वारा उठाए गए क़दम पर्याप्त हैं या नहीं. 

उनके अनुसार, ऐसे तथ्य जिनका अस्तित्व ही नहीं है, उन्हें क़ानूनी जामा नहीं पहनाया जा सकता है.

इस बिल में मानवाधिकार क़ानून के मौजूदा प्रावधानों को अमल में लाए जाने को काफ़ी हद तक सीमित किया गया है, जोकि मानवाधिकारों पर योरोपीय सन्धि के तहत ब्रिटेन में क़ानूनी मानक स्थापित करते हैं.

वोल्कर टर्क ने समानतापूर्ण क़ानूनी संरक्षण के दायरे से किसी एक समूह के लोगों, या किसी एक विशेष परिस्थिति से जूझ रहे लोगों को बाहर रखे जाने पर चिन्ता जताई. 

उन्होंने क्षोभ प्रकट करते हुए कहा कि यह बिना किसी भेदभाव के, सभी की पहुँच के भीतर न्याय को सुनिश्चित किए जाने की भावना के विरुद्ध है.

‘क़ानूनी मानकों पर खरा नहीं’

ब्रिटेन ने अप्रैल 2022 में रवांडा की सरकार के साथ एक नई प्रवासन व आर्थिक विकास साझेदारी की घोषणा की थी, जिसे बाद में यूके-रवांडा शरण साझेदारी का नाम दिया गया.

5 दिसम्बर 2023 को दोनों देशों द्वारा इस सन्धि पर हस्ताक्षर किए जाने के बाद, ब्रिटेन की सरकार ने शरण व प्रवासन सम्बन्धी एक बिल को जारी किया था.

संयुक्त राष्ट्र शरणार्थी मामलों की एजेंसी ने दोनों समझौतों का विश्लेषण करने के बाद कहा कि शरण के इच्छुक लोगों के हस्तांतरण के लिए जो क़ानूनी शर्तें हैं वे उसके निर्धारित मानकों पूरा नहीं करते हैं और अन्तरराष्ट्रीय शरणार्थी क़ानून के अनुरूप नहीं हैं.