ग़ाज़ा की आर्थिक पुनर्बहाली में लग सकते हैं दशकों और खरबों डॉलर, अंकटाड
संयुक्त राष्ट्र के व्यापार और विकास संगठन - UNCTAD ने बुधवार को एक नई रिपोर्ट में कहा कि ग़ाज़ा में युद्ध के परिणामस्वरूप, वहाँ की अर्थव्यवस्था में अभूतपूर्व विनाश हुआ है, जिसे उलटने में दसियों अरब डॉलर की रक़म और दशकों का समय लगेगा.
ग़ाज़ा युद्ध के सामाजिक और आर्थिक प्रभावों का यह प्रारम्भिक मूल्यांकन, सकल घरेलू उत्पाद (जीडीपी) के नुक़सान, पुनर्बहाली की समय सीमा और निर्धनता व घरेलू व्यय पर स्थाई प्रभावों की पड़ताल करता है.
अनुमान है कि साल 2023 में ग़ाज़ा के सकल घरेलू उत्पाद में साढ़े 65 करोड़ डॉलर की गिरावट आई, जो 24 प्रतिशत के बराबर है.
अंकटाड का कहना है कि ग़ाज़ा को अगर एक विश्वसनीय अर्थव्यवस्था के साथ आर्थिक पुनर्बहाली करनी है तो सैन्य टकराव को तत्काल रुकना होगा. साथ ही, पुनर्निर्माण कार्य, पूर्ण गम्भीरता के साथ और बिना किसी देरी के शुरू होना चाहिए.
“अन्तरराष्ट्रीय समुदाय को बिल्कुल अभी कार्रवाई करनी होगी, इससे पहले कि बहुत देर हो जाए.”
त्वरित आर्थिक गिरावट
ग़ाज़ा में, वर्ष 2007 में हमास की सत्ता स्थापित होने के बाद से ही वहाँ, इसराइल की नाकाबन्दी चल रही है और 2022 तक इसकी औसत विकास दर केवल 0.4 प्रतिशत थी.
अंकटाड का अनुमान है कि 2023 की पहली तीन तिमाहियों में, अर्थव्यवस्था में पहले ही 4.5 प्रतिशत की गिरावट आ चुकी थी. युद्ध ने आर्थिक पतन को काफ़ी तेज़ कर दिया है.
रिपोर्ट में पाया गया कि अगर तत्काल युद्ध रोककर, पुनर्निर्माण का कार्य शुरू कर दिया जाए तो, और 2007-2022 की वृद्धि प्रवृत्ति जारी रहे, तो भी वर्ष 2022 के सकल घरेलू उत्पाद (GDP) का स्तल बहाल करने में, वर्ष 2092 तक का समय लगेगा.
"हालाँकि, सकल घरेलू उत्पाद की वार्षिक 10 प्रतिशत की वृद्धि दर वाला सर्वाधिक आशावान परिदृश्य भी रखा जाए तो भी, ग़ाज़ा के प्रति व्यक्ति सकल घरेलू उत्पाद के, नाकाबन्दी से पहले यानि वर्ष 2006 के स्तर पर बहाल करने के लिए, वर्ष 2035 तक का समय लगेगा."
विकट सामाजिक आर्थिक स्थितियाँ
ग़ाज़ा पट्टी में स्थितियाँ पहले से ही अति गम्भीर थीं, जो दुनिया में सबसे घनी आबादी वाले स्थानों में से एक है. वहाँ 20 लाख से अधिक फ़लस्तीनी जन, 365 वर्ग किलोमीटर के दायरे में सीमित हैं.
आबादी का बड़ा हिस्सा यानि लगभग 80 प्रतिशत लोग, अन्तरराष्ट्रीय सहायता पर निर्भर थे; दो-तिहाई आबादी ग़रीबी रेखा से नीचे रहती थी,और युद्ध से पहले बेरोज़गारी 45 प्रतिशत थी. लोगों को स्वच्छ पानी, बिजली और उचित सीवेज प्रणाली तक पर्याप्त पहुँच नहीं थी. इसके अतिरिक्त, पिछले इसराइली सैन्य अभियानों से हुए अधिकांश विनाश की भरपाई नहीं हो पाई.
अंकटाड का कहना है कि युद्ध-पूर्व सामाजिक आर्थिक स्थितियों को बहाल करने में दशकों लगेंगे और पर्याप्त विदेशी सहायता की आवश्यकता होगी.
एजेंसी यह भी ध्यान दिलाया है कि मौजूदा युद्ध ने ग़ाज़ा की 85 प्रतिशत आबादी को विस्थापित कर दिया है, आर्थिक गतिविधियाँ रुक गई हैं, और ग़रीबी व बेरोज़गारी और भी बढ़ गई हैं.
आज, लगभग 80 प्रतिशत, श्रम योग्य आबादी बेरोज़गार है, जबकि लगभग 37 हज़ार 379 इमारतें, क्षतिग्रस्त या पूरी तरह तबाह हो गई हैं, जोकि ग़ाज़ा में कुल ढाँचे के, 18 प्रतिशत के बराबर है.
अंकटाड ने कहा, "ग़ाज़ा पट्टी की लगभग आधी आबादी बच्चों की है, और अब ये इलाक़ा बसने योग्य नहीं बचा है क्योंकि लोगों के पास आय के पर्याप्त स्रोत, पानी, स्वच्छता, स्वास्थ्य या शिक्षा तक पहुँच नहीं है."