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भारत: उत्थान से प्रेरित होकर संभाली, स्वयं सहायता समूह की बागडोर

आशा कहती हैं कि उन्होंने जीवन में कई परेशानियाँ झेली हैं, इसलिए वो अपने बच्चों को लिए बेहतर जीवन की कामना करती हैं.
UNDP India
आशा कहती हैं कि उन्होंने जीवन में कई परेशानियाँ झेली हैं, इसलिए वो अपने बच्चों को लिए बेहतर जीवन की कामना करती हैं.

भारत: उत्थान से प्रेरित होकर संभाली, स्वयं सहायता समूह की बागडोर

महिलाएँ

सफ़ाई साथियों का कार्य, अनौपचारिक व असंगठित होता है, जिसमें काम के लम्बे घंटे, कम आय, कठोर परिस्थितियाँ, व समाज में निम्न दर्जे का स्थान मिलने के कारण स्थिति बेहद चुनौतीपूर्ण हो जाती है. ऐसे में, सफ़ाई कर्मियों के लिए स्वास्थ्य देखभाल, बच्चों की शिक्षा या आपात स्थितियों से निपटना बहुत मुश्किल हो जाता है. इस अनौपचारिक अपशिष्ट अर्थव्यवस्था का अधिकाँश हिस्सा होती हैं महिलाएँ, जो घर के कामकाज का दोहरा बोझ उठाती हैं. इन्ही समस्याओं के समाधान के लिए, भारत में यूएनडीपी ने उत्थान पहल शुरू की. उत्थान परियोजना से प्रेरित होकर, स्वयं सहायता समूह का नेतृत्व सम्भालने वाली आशा प्रहलाद सेन्धड़े की कहानी.

जब आशा प्रहलाद सेन्धड़े को उत्थान परियोजना के बारे में मालूम हुआ, तो उन्होंने तुरन्त ई-श्रम, पैन व स्वास्थ्य कार्ड के लिए नामांकन कर दिया.

वो बताती हैं, “बुरे समय से अपनी रक्षा करना ज़रूरी है, ख़ासतौर पर हमारे लिए जो संवेदनशील हैं और सरकार की ऐसी कल्याणकारी योजनाओं के बारे में जागरूक नहीं हैं.”

सात भाई-बहनों में सबसे बड़ी आशा ने हमेशा घर की ज़िम्मेदारी अपने कन्धों पर उठाई. उनके माता-पिता कोयला खान श्रमिक थे, इसलिए आशा ने, अपने बड़े परिवार के भरण-पोषण में मदद हेतु, कम उम्र में ही काम करना शुरू कर दिया था.

शुरूआत में उन्होंने आस-पड़ोस से कचरा एकत्र करने का काम किया. "चूँकि मैं सबसे बड़ी थी, मुझे घर सम्भालने के लिए आगे आना पड़ा क्योंकि हमारे सामने बहुत विकल्प नहीं थे. मैंने कभी भी अपने काम को हेय दृष्टि से नहीं देखा क्योंकि इससे मेरे परिवार के लिए भोजन मिलता था."

हालाँकि, उन्होंने अपने विवाह के बाद यह काम छोड़ दिया. लेकिन फिर एक दुर्घटना के कारण उनके पति काम करने में असमर्थ हो गए. तब एक बार फिर अपने परिवार का भरण-पोषण करने का बोझ उन पर आ पड़ा. 

कचरा संग्रहण कार्य से परिचित होने के कारण उन्होंने दोबारा यह पेशा अपना लिया. आशा बताती हैं कि किस तरह बुरे समय में भी इस काम से उन्हें प्रेरणा व ध्यान केन्द्रित करने की शक्ति मिलती रही. "अपने परिवारवालों की गुज़र-बसर के लिए मैंने लम्बे घंटों तक काम करना शुरू कर दिया.”

हमने बैंक खाते के लिए आवेदन किया, और धन की बचत पर उत्थान परियोजना द्वारा प्राप्त क्षमता निर्माण प्रशिक्षण के बाद हमें उम्मीद है कि हम स्वयं सहायता समूह के ज़रिए अधिक आय अर्जित करने में सक्षम होंगे.

भारत में यूएनडीपी की उत्थान परियोजना से प्रेरित होकर, आशा ने अपना स्वयं सहायता समूह शुरु किया.
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आज उन्हें एक सफ़ाई साथी के रूप में काम करते हुए 30 वर्षों से अधिक समय हो गया है और उसकी कई कड़वी-मीठी यादें हैं. उन्होंने अपने पति को खो दिया और इसके तुरन्त बाद, कैंसर के कारण उनके सबसे बड़े बेटे का निधन हो गया. 

“मैंने बहुत कठिन समय देखा है. मेरे काम और स्त्री मुक्ति संगठन (एसएमएस) के साथ सम्पर्क के बाद अब मैं अच्छी स्थिति में हूँ."

आशा एक स्वयं सहायता समूह का नेतृत्व भी करती हैं. इसके लिए उनका चुनाव तब किया गया, जब उन्होंने सफ़ाई साथियों को क़र्ज़ देकर लगातार परेशान करने वाले सूदखोरों के ख़िलाफ़ मुहिम छेड़ दी थी. और स्त्री मुक्ति संगठन की मदद से, धैर्य व दृढ़ता के साथ उन सूदख़ोरों को बाहर कर दिया था.

उत्थान से प्रेरणा लेते हुए, उन्होंने राष्ट्रीय शहरी आजीविका मिशन के तहत स्वयं सहायता समूह के लिए कार्य ऋण का आवेदन किया.

“मैं हमारे लिए उपलब्ध सामाजिक कल्याण योजनाओं बारे में और अधिक जानना चाहती थी, और जब हमें राष्ट्रीय शहरी आजीविका मिशन की योजनाओं के बारे में मालूम हुआ, तो उत्थान कार्यकर्ता ने हमारी मदद की. फिर हमने स्वयं सहायता समूह का गठन करके, ऋण के लिए आवेदन किया.

अतिरिक्त आमदनी अर्जित करने के लिए, उनका समूह, मशीनें और मसाला पीसने की मशीनों का नया उद्यम शुरू करना चाहता है. इतनी व्यक्तिगत असफलताएँ देखने के बाद भी आशा दृढ़ संकल्पित हैं और अपने बच्चों व पोते-पोतियों के लिए बेहतर जीवन की कामना करती हैं. 

“मैंने एक सफ़ाई साथी के रूप में, अपने ज्ञान और क्षमताओं का पूरा उपयोग किया है और अपने परिवार के लिए ऐसा करती रहूंगी. मुझे आशा है कि उन्हें कभी भी बुरे समय के सामने के सामने झुकना नहीं पड़े और वे जीवन की चुनौतियों से आसानी से जूझ सकें."