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28 दिनों तक समुद्र में भटकते, श्रीलंकाई प्रवासियों की दर्द भरी दास्तान

47 वर्षीय सेल्वन उन 303 श्रीलंकाई प्रवासी में से एक थे, जिन्हें तस्करों ने 28 दिनों के लिए समुद्र के बीच छोड़ दिया था.
© IOM/Anushma Shrestha
47 वर्षीय सेल्वन उन 303 श्रीलंकाई प्रवासी में से एक थे, जिन्हें तस्करों ने 28 दिनों के लिए समुद्र के बीच छोड़ दिया था.

28 दिनों तक समुद्र में भटकते, श्रीलंकाई प्रवासियों की दर्द भरी दास्तान

प्रवासी और शरणार्थी

विदेशों में बेहतर जीवन पाने की चाह में, मानव तस्करों पर अपनी जीवन भर की कमाई लुटाकर, ख़तरनाक व असफल समुद्री यात्राओं पर जाने वाले श्रीलंकाई प्रवासीअब संयुक्त राष्ट्र प्रवासन एजेंसीIOM की मदद से घर लौट आए हैं.

श्रीलंका के जाफ़ना शहर के निवासी सेलवन, पास की दुकान से किराने का सामान ख़रीदने के लिए मोटरसाइकिल पर निकले हैं. लेकिन आँखों में सीधी पड़ रही धूप से उन्हें परेशानी हो रही है और रास्ते पर ध्यान केंद्रित करना मुश्किल हो रहा है. घबराहट बढ़ने के साथ ही उनकी आँखें धुँधली होती जा रही है: उन्हें लगता है कि एक बार फिर वो जहाज़ पर डूबने के क़रीब हैं. जहाज़ में 300 से अधिक अन्य लोग भी हैं, जो लहरों के टकराने से अनियंत्रित जहाज़ में ख़ुद को सन्तुलित करने के लिए संघर्ष कर रहे हैं.

ट्रैफ़िक के बीच अपनी मोटरसाइकिल चलाते हुए, 47 वर्षीय सेलवन की साँस फूलने लगती है, और वो तेज़ी से ब्रेक लगाते है. इसके साथ ही वो वास्तविकता में वापस आ जाते हैं. पोस्ट-ट्रॉमैटिक स्ट्रेस डिसऑर्डर (PTSD) की यह क्षणिक पुनरावृत्ति, उनके लिए कोई नया अनुभव नहीं है.

सेलवन नवम्बर 2022 में उन 303 श्रीलंकाई प्रवासियों में से एक थे, जो 28 दिनों तक फिलीपींस और वियतनाम के बीच पानी में डूबते एक जहाज़ पर फँसे रहने के बाद बचाए गए थे. इनमें अनेक बच्चे व महिलाएँ भी शामिल थे. बचाए गए कई अन्य लोगों के भी PTSD से पीड़ित होने की ख़बरें हैं.

अन्तरराष्ट्रीय प्रवासन संगठन (IOM) और उसके साझीदारों की मदद से, सेलवन और कई अन्य लोगों ने श्रीलंका वापस जाने के लिए, स्वेच्छा से एक सुरक्षित मार्ग चुना, जहाँ वर्तमान में संयुक्त राष्ट्र एजेंसी उन मूल कारणों पर ध्यान देने की कोशिश कर रही है जिसकी वजह से उन्होंने इस ख़तरनाक यात्रा का जोखिम उठाया था. 

वित्तीय संकट से जन्मी ख़तरनाक अफ़वाहें 

पहले एक प्रसिद्ध राष्ट्रीय कॉलेज में वार्डन के सम्मानित पद पर रहे सेलवन, अपना खाली समय पशु पालन में बिताते थे. उन्होंने बताया, "आर्थिक संकट ने हम सभी के जीवन पर भारी असर डाला. जब उर्वरकों सहित सभी आयातों पर प्रतिबंध लगा दिया गया, तो पशुधन पालन भी मुश्किल हो गया. सार्वजनिक क्षेत्र के कर्मचारी के रूप में मेरी आय जीवन-यापन के लिए पर्याप्त नहीं थी.”

उन्होंने कहा, गम्भीर संकट के बीच शहर में चारों ओर अफवाहें उड़ीं कि एक बड़ा जहाज़ कैनेडा जाने के लिए तैयार खड़ा है.

उन्होंने कहा, "मेरे चार बच्चे हैं और मैं परिवार में अकेला आय अर्जित करने वाला हूँ. ऐसे में, उनके पालन-पोषण की सारी ज़िम्मेदारी मेरे कंधों पर है. चाहे इसे हताशा कहें, लेकिन इन वित्तीय कठिनाइयों से बचने और रोज़गार पाने के लिए मुझे यही एकमात्र उम्मीद नज़र आई. मुझे अपने बच्चों की शिक्षा जारी रखने का रास्ता खोजना ज़रूरी था.''

सेलवन ने शहर भर में फैली दबी फ़ुसफ़ुसाहटों के बारे में जानकारी इकट्ठी करनी शुरू की, जो उन्हें इस यात्रा पर ले जाने वाले एक एजेंट तक ले गईं. यात्रा के लिए एजेंट ने उनसे 4 हज़ार डॉलर की भारी राशि की माँग की. इसके लिए उन्होंने अपना सब कुछ दाँव पर लगा दिया - अपने बच्चों के लिए एक उज्जवल भविष्य की आशा में उन्होंने अपना घर और अपनी पत्नी के गहने बेच दिए और अपना स्थाई कामकाज भी छोड़ दिया.

अंकिता की दुकान जैसे अनगिनत सूक्ष्म उद्यम, श्रीलंका के वित्तीय संकट से गम्भीर रूप से प्रभावित हुए हैं.
© IOM/Anushma Shrestha

झूठे वादे

यह अफ़वाह दूर-दूर तक फैली थी. लगभग 50 किमी दूर एक अन्य शहर में, अंकिता और उनके पति ने महीनों तक कोई ग्राहक न आने पर, अपनी छोटी सी सिलाई की दुकान बेच दी. अपने घर को गिरवी रखकर, उन्होंने बेहतर भविष्य के लिए जहाज़ पर ले जाने का वादा करने वाले एक एजेंट को 7 हज़ार डॉलर का भुगतान किया.

“हमारे पास उन पर विश्वास करने के अलावा कोई विकल्प नहीं था.” उन्होंने बताया कि कैसे एजेंट ने म्याँमार की यात्रा की व्यवस्था की, और “वीज़ा की प्रक्रिया” के नाम पर उनके पासपोर्ट छीन लिए. फिर महीनों तक उन्हें एक छोटे से होटल के कमरे में इंतज़ार के लिए छोड़ दिया गया.

उन्होंने बताया, "न तो वीज़ा आया और न ही हमारे पासपोर्ट वापिस मिले."

आख़िरकार प्रस्थान का दिन आया. लेकिन वादे के अनुसार "बड़े जहाज़" की बजाय, एक नाज़ुक सी नाव उनका इंतज़ार कर रही थी, जो 22 महिलाओं और 14 बच्चों सहित यात्रियों से खचाखच भरकर रवाना हुई. 

'हर किसी को मौत का ख़ौफ़ 

'यात्रा के दूसरे दिन, नाव में समुद्र का पानी रसकर दाख़िल होने लगा, इसलिए चालक दल के सदस्य एक नए जहाज़ के साथ लौटने का वादा करते हुए, आपातकालीन बेड़े पर बैठकर भाग गए; और कभी वापस नहीं आए.

अंकिता ने कहा, "जब नौका चालक दल कई दिनों तक वापस नहीं आया, तो हमें समझ आ गया कि हम समुद्र के बीच अकेले फँस गए हैं. हम सफ़र के लिए लाए भोजन के छोटे पैकेटों पर जीवित रहने की कोशिश कर रहे थे."

समुद्र में पूरे दिन भूख उन्हें सताती रही, लेकिन मुख्य समस्या प्यास की थी. इसलिए उन्होंने पीने के लिए जंग लगी बाल्टियों में बारिश का पानी इकट्ठा किया. "हर किसी को अपनी मौत और इस यात्रा पर आने का अफ़सोस सता रहा था." 

अंकिता ने बताया कि 28 दिन तक संकट के संकेत भेजने के बाद, एक  जापानी जहाज़ से उन्हें जवाब मिला.”

बहुराष्ट्रीय बचाव मिशन

यह बचाव अभियान, श्रीलंका की नौसेना और क्षेत्रीय सिंगापुर स्थित समुद्री बचाव समन्वय केंद्र का संयुक्त प्रयास था.

 IOM ने, वियतनाम के वुंग ताओ में प्रवासियों के सुरक्षित आगमन पर, उनकी सुरक्षा के लिए एक दल तैनात किया. श्रीलंका व मालदीव में आईओएम के मिशन प्रमुख, शरत दाश ने बताया कि  भोजन, चिकित्सा सहायता और आपातकालीन आश्रय जैसी तत्काल सहायता प्रदान करने के लिए, हनोई में सरकार व श्रीलंकाई दूतावास के साथ मिलकर, संयुक्त राष्ट्र प्रवासन एजेंसी ने प्रवासियों की स्वैच्छिक वापसी में मदद की.

उन्होंने कहा, "चूँकि तस्करों ने प्रवासियों के पासपोर्ट ज़ब्त कर लिए थे, इसलिए हमने अस्थाई यात्रा दस्तावेज़ जारी करने के लिए श्रीलंकाई और वियतनामी अधिकारियों के साथ निकटता से समन्वय किया."

स्वैच्छिक वापसी दो बैचों में हुई, जिसमें आईओएम ने वियतनाम से श्रीलंका में कोलम्बो व आगे जाफ़ना तक चिकित्सा जाँच एवं यात्रा व्यवस्था की सुविधा प्रदान की.

सेलवन ने बताया, "जब आईओएम ने हमें घर वापस जाने का विकल्प दिया, तो मैंने इसे सहर्ष स्वीकार कर लिया. लेकिन, जैसे-जैसे दिन क़रीब आता गया, मुझे देश की अनिश्चित वित्तीय स्थिति और यह जानकर डर लगने लगा कि इस यात्रा के लिए अपनी जीवन भर की सारी बचत और घर गिरवी रखने के बाद अब क्या होगा. यह मेरे परिवार से मिला प्रोत्साहन ही था, जिससे मुझे वापस जाने और नए सिरे से जीवन की शुरुआत करना का विश्वास मिला.”

सेलवन ने श्रीलंका में आर्थिक संकट के दौरान अपने पशुधन को बनाए रखने के लिए संघर्ष किया.
© IOM/Anushma Shrestha

जीवन को फिर पटरी पर लाना

सेलवन के संघर्ष अभी ख़त्म नहीं हुए थे. लौटने वाले अधिकाँश प्रवासियों ने ख़ुद को बेरोज़गार और क़र्ज़ में डूबा हुआ पाया. “मैं अपने समुदाय के लोगों से मिले तानों से परेशान नहीं था; बल्कि इस बात से परेशान था कि जहाँ मैंने 20 साल से अधिक समय तक काम किया, वो अब मुझे वापस काम पर रखने के लिए तैयार नहीं थे.'' 

उन्होंने कहा कि अब वह अपने खेत पर काम करके क़र्ज़ की मासिक क़िस्तें चुकाते हैं. "हालाँकि, एक अच्छे रोज़गार और स्थिर आय के बिना, मुश्किल से ही गुज़ारा हो पाता है."

वर्तमान में, श्रीलंका स्थित संयुक्त राष्ट्र प्रवासन एजेंसी पुनर्एकीकरण सहायता प्रदान कर रही है और बचाए गए प्रवासियों की समस्याओं के दीर्घकालिक समाधान सुनिश्चित करने हेतु, बुनियादी मनोसामाजिक परामर्श, कौशल प्रशिक्षण के अवसर प्रदान करने के लिए स्थानीय अधिकारियों के साथ मिलकर काम कर रही है.

IOM, 28 दिनों तक समुद्र में भटकने के बाद बचाए गए श्रीलंकाई व्यक्तियों की स्वैच्छिक वापसी और पुन:एकीकरण प्रयासों में लगा है.
© IOM/Anushma Shrestha

सुरक्षित प्रवास के प्रयास

शरत दाश ने बताया, "देश की आर्थिक स्थिति नाज़ुक और अस्थिर बनी हुई है. जैसे-जैसे ऐसी अफ़वाहें ज़ोर पकड़ रही हैं, सुरक्षित, व्यवस्थित व नियमित प्रवास सुनिश्चित करने के लिए अन्तरराष्ट्रीय सहयोग की तत्काल आवश्यकता है, जिससे व्यावहारिक विकल्प प्रदान करके, सम्भावित प्रवासियों को ऐसी ख़तरनाक यात्राओं पर जाने से रोका जा सके."

हालाँकि वापस लौटे लोग ज़ोर देकर कह रहे हैं कि वो दोबारा कभी ऐसी यात्रा पर नहीं जाएँगे, लेकिन  कैनेडा के लिए एक नए जहाज़ के इंतज़ार की अफ़वाहों का बाज़ार फिर गर्म होने लगा है, और लोगों की सामाजिक आर्थिक कमज़ोरियों का फ़ायदा उठाने के लिए दलाल छिपे घूम रहे हैं.

सेलवन उन्हें सतर्क रहने की सलाह देते हैं. "पूरी जानकारी लेकर, हमेशा सही तरीक़े से वाणिज्य दूतावासों के रास्ते ही सफ़र पर जाने की सोचें. सभी महत्वाकांक्षी प्रवासियों के लिए मेरा सन्देश यही है कि अपनी प्रवास यात्रा में कभी भी अनियमित माध्यमों का चयन न करें, और जो अफ़वाहें आप सुनते हैं, उन पर आंख मूंदकर भरोसा नहीं करें."

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