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भारत: 'उत्थान' की मदद से, पदमा वंजारे बनीं, अपने परिवार की मज़बूत स्तम्भ

पद्मा बताती हैं कि यूएनडीपी की उत्थान परियोजना के तहत दिए गए स्वास्थ्य कार्ड की वजह से, अस्पताल में उनका मुफ़्त इलाज हुआ.
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पद्मा बताती हैं कि यूएनडीपी की उत्थान परियोजना के तहत दिए गए स्वास्थ्य कार्ड की वजह से, अस्पताल में उनका मुफ़्त इलाज हुआ.

भारत: 'उत्थान' की मदद से, पदमा वंजारे बनीं, अपने परिवार की मज़बूत स्तम्भ

महिलाएँ

भारत में यूएनडीपी की 'उत्थान' परियोजना ने, पदमा एकनाथ वंजारे को अपने पैरों पर खड़ा होने और केवल अपने ही दम पर, पूरे परिवार का भरण-पोषण करने का आत्मविश्वास प्रदान किया.

पदमा एकनाथ वंजारे से अपने पति का साथ, कम उम्र में ही छिन गया था. वो कहती हैं, “मेरे तीसरे बच्चे के जन्म के ठीक बाद मेरे पति का निधन हो गया था. पूरे परिवार की ज़िम्मेदारी अकेली मुझ पर पड़ गई. लेकिन मैंने ठान लिया कि मैं अपने बच्चों को पढ़ाऊंगी ताकि अपने परिवारों का भरण-पोषण करने के लिए वो एक सम्मानजनक रोज़गार चुन सकें.”

पदमा को, बचपन से ही अनेक परेशानियों का सामना करना पड़ा. महाराष्ट्र स्थित जालना ज़िले में स्थित उनके गाँव में सूखा पड़ने पर, उन्हें परिवार समेत मुम्बई जाना पड़ा. इतने बड़े शहर में जीवन यापन का कोई अन्य विकल्प उपलब्ध नहीं होने पर उन्होंने कचरा बीनकर, उसे पुनः बेचने का काम आरम्भ किया.

“जब मैंने काम करना शुरू किया, तो मैं केवल कुछ दिन की गुज़र-बसर के लायक ही आय अर्जित कर पाती थी.” 

40 साल की पदमा, अब दो दशकों से अधिक समय से सफ़ाई साथी के रूप में काम कर रही हैं.

पदमा, भारत में यूएनडीपी और हिन्दुस्तान यूनीलीवर लिमिटेड (एचयूएल) की उत्थान परियोजना के लिए मुम्बई में भागीदार स्त्री मुक्ति संगठन के सम्पर्क में आईं.

इस संगठन ने उनके जीवन में एक मार्गदर्शक का काम किया है. “मेरे पति की मृत्यु के बाद, स्त्री मुक्ति संगठन के सदस्य मेरा विस्तृत परिवार बन गए. उन्होंने कठिन समय में मेरी सहायता भी की और हमेशा मुझे अपने बच्चों को उचित शिक्षा देने के लिए प्रोत्साहित किया.

“मुझे निःशुल्क चिकित्सा देखभाल और उपचार प्रदान किया गया. उन्होंने मुझे दवाइयाँ भी दीं. परिचारक ने मुझे बताया कि आगे के चिकित्सा परामर्श के लिए भी, मुझसे कोई शुल्क नहीं लिया जाएगा.”

वह आगे कहती हैं, “मेरा बड़ा बेटा इंजीनियर है और वो अच्छी आय अर्जित कर लेता है. लेकिन फिर भी मैंने अपना काम जारी रखा है क्योंकि मुझे ये दिनचर्या पसन्द है.''

कोविड के दौरान तकलीफ़ें

महामारी के दौरान, उनके परिवार को राशन, मास्क और आवश्यक सामग्री उपलब्ध कराई गई. साथ ही, तालाबन्दी की शुरुआत में, एक दुर्घटना की शिकार होने पर उन्हें दवाइयाँ भी उपलब्ध करवाई गईं.

“कोविड-19 लॉकडाउन की शुरुआत ही हुई थी कि मुझे एक साँप ने काट लिया. मैं एक जगह से दूसरी जगह चिकित्सा सहायता पाने के लिए भागती रही. अन्त में, स्त्री मुक्ति संगठन के स्वयंसेवकों ने मुझे उचित चिकित्सा प्राप्त करने में मदद की. लेकिन इसके ख़र्च से मेरी बचत पर असर पड़ा और लॉकडाउन के दौरान काम बन्द होने से हालात और अधिक ख़राब हो गए.”

उस समय से मुझे सबक़ मिला कि बीमा करवाना कितना ज़रूरी है, ख़ासतौर पर हमारे कामकाज में, जहाँ कोई सामाजिक या वित्तीय सुरक्षा नहीं है.”

इसलिए, जब उत्थान परियोजना के कार्यकर्ताओं ने, उनके और अन्य सफ़ाई-साथियों के साथ उत्थान का विवरण साझा किया, तो वह तुरन्त तैयार हो गईं. 

पदमा ने उत्थान परियोजना के तहत ई-श्रम और स्वास्थ्य कार्ड के लिए नामांकन करा लिया.

वह बताती हैं कि उत्थान कार्यकर्ताओं ने किस तरह उनके आधार कार्ड को, उनके जनधन बैंक खाते के साथ लिंक करवाया जिससे उन्हें मासिक 500 रूपए व मुफ़्त कोविड-19 टीकाकरण जैसे कई लाभ प्राप्त हुए.

पदमा, हाल ही में एक और हादसे का शिकार हो गईं. पीठ पर एक भारी बैग गिरने से उनकी पीठ में बहुत दर्द था. वो कहती हैं, “मैं हमेशा से बहुत सावधान रहती हूँ, लेकिन इस बार भाग्य ने साथ नहीं दिया.”

उन्हें दो सप्ताह पूरा आराम करने की सलाह दी गई है और फिर चिकित्सा परीक्षण से तय किया जाएगा कि वो कितनी जल्दी अपना काम फिर शुरू कर सकती हैं.

पदमा ने बताया कि उत्थान के स्वास्थ्य कार्ड के कारण उपचार करने वाले अस्पताल ने उनसे कोई रक़म नहीं ली. “मुझे निःशुल्क चिकित्सा देखभाल और उपचार उपलब्ध करवाया गया.”

यह एक बड़ी राहत थी. उन्होंने एक मुस्कान के साथ कहा, “सकारात्मक पहलू की ओर देखूँ तो इलाज में बड़े धन ख़र्च का दबाव नहीं होने के कारण, अब मैं बिना चिन्ता के, अपने परिवार व नाती-पोतों के साथ अधिक समय बिता सकती हूँ."