ग़ाज़ा: ‘सामूहिक नस्लीय सफ़ाए’ के बारे में चेतावनी
संयुक्त राष्ट्र की एक स्वतंत्र मानवाधिकार विशेषज्ञ फ़्रांसेस्का अलबानीज़ ने शनिवार को आगाह करते हुए कहा है कि फ़लस्तीनी क्षेत्र ग़ाज़ा में, नागरिक आबादी अब “सामूहिक नस्लीय सफ़ाए” के गम्भीर ख़तरे का सामना कर रही है. उन्होंने अन्तरराष्ट्रीय समुदाय से, युद्धरत हमास और इसराइल क़ाबिज़ बलों के दरम्यान तुरन्त युद्धविराम लागू करवाने की अपील की है.
इसराइल द्वारा 1967 से क़ाबिज़ फ़लस्तीनी इलाक़ों में मानवाधिकार स्थिति पर संयुक्त राष्ट्र की विशेष रैपोर्टेयर फ़्रांसेस्का अलबानीज़ ने शनिवार को जारी एक प्रैस वक्तव्य में कहा है, “क़ाबिज़ फ़लस्तीनी क्षेत्र में स्थिति बहुत गम्भीर स्तर पर पहुँच गई है.”
उन्होंने कहा है, “संयुक्त राष्ट्र और उसके सदस्य देशों को, युद्धरत पक्षों के दरम्यान एक युद्धविराम लागू करवाने के लिए, अपने प्रयास सघन करने होंगे, इससे पहले कि हम सभी एक ऐसे मुक़ाम पर पहुँच जाएँ जहाँ से वापसी सम्भव ना हो. ”
विशेष रैपोर्टेयर ने कहा, “अन्तरराष्ट्रीय समुदाय पर की ये ज़िम्मेदारी है कि वो आम आबादी को, अत्याचार अपराधों से संरक्षित करे. इसराइली क़ाबिज़ बलों और हमास द्वारा किए जाने वाले अन्तरराष्ट्रीय अपराधों के लिए जवाबदेही, तत्काल निर्धारित की जानी होगी.”
7 अक्टूबर 2023 से, ग़ाज़ा पट्टी में इसराइली हवाई हमलों में, 1900 से अधिक फ़लस्तीनियों की मौत हुई है जिनमें लगभग 600 बच्चे भी हैं, और 7,600 लोग घायल भी हुए हैं. साथ ही इसराइली हवाई हमलों के कारण, चार लाख 23 हज़ार से अधिक लोग विस्थापित भी हुए हैं.
7 अक्टूबर को, हमास के हमलों में लगभग 1200 इसराइली नागरिकों की भी मौत हुई थी.
स्वतंत्र मानवाधिकार विशेषज्ञ ने कहा है कि ये तबाही उस आबादी पर हो रही है, जिसने वर्ष 2008 के बाद से, पाँच युद्धों का सामना किया है जो विशेष रूप से इसराइल द्वारा वर्ष 2007 में लागू की गई ग़ाज़ा की नाकाबन्दी के सन्दर्भ में हुए हैं.
फ़्रांसेस्का अलबानीज़ ने कहा कि ग़ाज़ा की नाकाबन्दी को, अन्तरराष्ट्रीय समुदाय ने, सामूहिक दंड परिभाषित करते हुए, उसकी व्यापक निन्दा की है.
विस्थापन का आदेश
ग़ौरतलब है कि इसराइली बलों ने, 12 अक्टूबर को एक आदेश जारी किया था कि ग़ाज़ा के उत्तरी इलाक़े में रहने वाले लगभग 11 लाख लोग, अपनी सुरक्षा के लिए, 24 घंटों के भीतर दक्षिणी हिस्से में चले जाएँ, जबकि वहाँ इसराइल के हवाई हमले जारी थे.
यूएन एजेंसियों के अनुसार उससे अगले दिन यानि 13 अक्टूबर, शुक्रवार को, इसराइली ने, इलाक़े की “सफ़ाई” करने के लिए, ग़ाज़ा में दाख़िल होना शुरू कर दिया था.
यूएन मानवाधिकार विशेषज्ञ की प्रैस विज्ञप्ति में कहा गया है कि फ़लस्तीनियों के पास, ग़ाज़ा में कहीं भी सुरक्षित ठिकाना नहीं बचा है क्योंकि इसराइल ने छोटे से ग़ाज़ा पट्टी क्षेत्र की पूर्ण नाकाबन्दी कर दी है, जिसमें पानी, भोजन, ईंधन और बिजली की आपूर्ति को, ग़ैरक़ानूनी तरीक़े से काट दिया गया है.
ग़ाज़ा पट्टी के लिए एक मात्र अन्तरराष्ट्रीय सीमा चौकी – रफ़ाह, जोकि आंशिक रूप से खुली हुई थी, वो भी इसराइल के हवाई हमलों में भारी विध्वंस हो जाने के बाद बन्द हो गई है.
यूएन मानवाधिकार विशेषज्ञ ने कहा है, “इस बात का गम्भीर ख़तरा है कि हम 1948 में हुए नाकबा, और 1967 के नाकसा का दोहराव देख रहे हैं, और वो भी विशाल स्तर पर. अन्तरराष्ट्रीय समुदाय को, ऐसा फिर से नहीं होने देने के लिए, हर सम्भव कोशिश करनी होगी.”
फ़्रांसेस्का अलबानीज़ ने ध्यान दिलाया कि इसराइली सार्वजनिक अधिकारियों ने खुलेआम एक अन्य नाकबा की हिमायत की है.
नाकबा शब्द 1947-1949 के दौरान हुई उन घटनाओं के लिए प्रयोग किया जाता है, इसराइल द्वारा लगभग साढ़े सात लाख फ़लस्तीनी शरणार्थियों को, युद्धक गतिविधियों के दौरान उनके घरों व ज़मीन से बेदख़ल कर दिया गया था, और उस जबरन बेदख़ली के बाद इसराइल देश की स्थापना हुई थी.
शान्ति से रहने का अधिकार
नाकसा घटनाक्रम के दौरान, 1967 में, इसराइल ने फ़लस्तीनी क्षेत्रों – पश्चिमी तट और ग़ाज़ा पट्टी पर क़ब्ज़ा कर लिया था, और उस दौरान लगभग साढ़े तीन लाख फ़लस्तीनी विस्थापित हुए थे.
मानवाधिकार विशेषज्ञ ने कहा है, “इसराइल ने युद्ध की धुन्ध में, पहले ही फ़लस्तीनी लोगों का सामूहिक नस्लीय सफ़ाया शुरू कर दिया है. इसराइल एक बार फिर, आत्म रक्षा के नाम पर, उस कृत्य को सही ठहराने की कोशिश कर रहा है जो नस्लीय सफ़ाए की श्रेणी में शामिल होगा.”
फ़्रांसेस्का अलबानीज़ ने कहा, “इसराइल के कोई भी सैन्य अभियान, अन्तरराष्ट्रीय क़ानून की हदों को पार कर गए हैं. इससे पहले कि बहुत देर हो जाए, अन्तरराष्ट्रीय समुदाय को, अन्तरराष्ट्रीय क़ानून के इन घातक उल्लंघनों को तत्काल रोकना होगा.”
उन्होंने कहा, “समय बहुत क़ीमती है. इसराइलियों और फ़लस्तीनियों, दोनों को ही शान्ति, अधिकारों की समानता, गरिमा और स्वतंत्रता के साथ जीवन जीने का अधिकार है.”
संयुक्त राष्ट्र के विशेष रैपोर्टेयर और अन्य मानवाधिकार विशेषज्ञ, स्वैच्छिक आधार पर काम करते हैं, वो यूएन स्टाफ़ नहीं होते है और ना ही उन्हें उनके कामकाज के लिए, संयुक्त राष्ट्र से कोई वेतन मिलता है.