अफ़ग़ानिस्तान में मानवाधिकार ‘ढहने के कगार पर’
संयुक्त राष्ट्र मानवाधिकार उच्चायुक्त वोल्कर टर्क ने मंगलवार को चेतावनी दी कि अफ़ग़ानिस्तान में, गम्भीर मानवीय संकट की पृष्ठभूमि में, तालेबान द्वारा महिलाओं व लड़कियों के “ख़ौफ़नाक” व “क्रूर” दमन से देश का भविष्य ख़तरे में है.
वोल्कर टर्क ने मानवाधिकार परिषद को आगाह करते हुए कहा, “अफ़ग़ानिस्तान में मानवाधिकार, पतन की स्थिति में हैं.”
उन्होंने, मानवाधिकार कार्यालय (OHCHR) की नवीनतम रिपोर्ट में दर्ज, ग़ैर-न्यायिक हत्याएँ, यातना और दुर्व्यवहार, मनमाने ढ़ंग से गिरफ़्तारी एवं हिरासत में लेने की घटनाओं व पूर्व सरकारी अधिकारियों के ख़िलाफ़ गम्भीर हनन के मामलों पर चेतावनी भी जारी की है.
मानवाधिकार उच्चायुक्त ने कहा, "मानवाधिकारों के उल्लंघन के अपराधियों की जवाबदेही में चिन्ताजनक कमी के कारण, स्थिति बदतर होती जा रही है."
महिलाओं की अनदेखी
उन्होंने कहा कि अफ़ग़ानिस्तान दुनिया का वो एकमात्र देश है जिसने महिलाओं व लड़कियों को माध्यमिक और उच्च शिक्षा तक पहुँच से वंचित रखकर, एक “विनाशकारी मिसाल” पेश की है.
वोल्कर टर्क ने देश की महिलाओं को "घरों की चारदीवारी तक" सीमित करने वाली "महिला द्वेषी प्रतिबन्धों की लम्बी सूची" को रेखांकित करते हुए सवाल किया: "इससे आगे और सम्भवतः क्या हो सकता है?"
उच्चायुक्त ने इस बात पर बल दिया कि स्थिर, समृद्ध अफ़ग़ानिस्तान की कोई भी सम्भावना, पुरुषों और महिलाओं की भागेदारी पर निर्भर करती है.
उन्होंने कहा, "महिलाओं व लड़कियों को दैनिक एवं सार्वजनिक जीवन में हिस्सा लेने के अधिकारों से वंचित करना, न केवल उन्हें उनके मानवाधिकारों का हनन है, बल्कि इससे अफ़ग़ानिस्तान, महिलाओं के अहम योगदान के लाभ से भी वंचित हो जाएगा."
संविधान ताक पर
वोल्कर टर्क ने कहा कि अफ़ग़ान संविधान स्थगित करने और महिलाओं को हिंसा से बचाने या मीडिया की स्वतंत्रता की गारंटी देने वाले क़ानूनों का निलम्बन, या फिर देश के स्वतंत्र मानवाधिकार आयोग का विघटन, यह सभी "उन संस्थानों के व्यवस्थित ख़ात्मे के तरीक़े थे, जो मानवाधिकारों की सुरक्षा सुनिश्चित करने के लिए अहम थे."
मानवाधिकार उच्चायुक्त ने सत्तारूढ़ प्रशासन से "रास्ता बदलने" और अपने अन्तरराष्ट्रीय मानवाधिकार दायित्वों को पूरे सम्मान के साथ निभाते हुए, अफ़ग़ानिस्तान को अन्तरराष्ट्रीय परिदृश्य पर वापस लाने का आहवान किया.
उन्होंने कहा कि अफ़ग़ानिस्तान में संयुक्त राष्ट्र सहायता मिशन (UNAMA), स्थिति की निगरानी और रिपोर्ट करना जारी रखेगा. साथ ही "व्यक्तिगत मामलों को उठाते हुए, सत्तारूढ़ अधिकारियों द्वारा अन्तरराष्ट्रीय क़ानून के अनुपालन का आग्रह करेगा."
वोल्कर टर्क ने ज़मीनी स्तर पर काम करने वाले मानवाधिकार सहयोगियों, विशेषकर अफ़ग़ान महिला कर्मचारियों की सराहना की.
उन्होंने अन्तरराष्ट्रीय समुदाय से ऐसे समय में "अफ़ग़ानिस्तान से मुँह न मोड़ने" का आहवान किया, ऐसे हालात में जबकि, अधिकारों का हनन जारी है और दो-तिहाई आबादी को सहायता की आवश्यकता है, लेकिन संयुक्त राष्ट्र व ग़ैर-सरकारी संगठनों के साथ काम करने वाली महिलाओं पर प्रतिबन्ध के कारण, मानवीय अभियान बाधित हो रहे हैं.
'ठगे जाने का अहसास'
वोल्कर टर्क की टिप्पणियाँ, अफ़ग़ानिस्तान पर विशेष रैपोर्टेयेर, रिचर्ड बैनेट द्वारा, परिषद को दी गई गम्भीर जानकारी के एक दिन बाद आई हैं.
विशेष रैपोर्टेयेर ने कहा, "विदेश में रहने वाले अनेक अफ़गान लोगों का कहना है कि वो अन्तरराष्ट्रीय समुदाय के हाथों 'ठगे हुए महसूस कर रहे हैं.' वे ठोस कार्रवाई की मांग कर रहे हैं और उनमें से कुछ ने 'लैंगिक रंगभेद की मान्यता के लिए' भूख हड़ताल भी शुरू कर दी है."
रिचर्ड बैनेट ने जून में कहा था कि चूँकि महिलाओं और लड़कियों के ख़िलाफ़ व्यवस्थित और संस्थागत भेदभाव, तालेबान की विचारधारा एवं शासन के केन्द्र में था, अफ़ग़ानिस्तान के सत्तारूढ़ प्रशासन को "लैंगिक रंगभेद (gender apartheid) के लिए ज़िम्मेदार ठहराया जा सकता है." हालाँकि इसे "अभी एक स्पष्ट अन्तरराष्ट्रीय अपराध के रूप में मान्यता नहीं मिली है" और इस बारे में अभी अधिक अध्ययन” की आवश्यकता है.
अल्पसंख्यकों का दमन
रिचर्ड बैनेट ने सोमवार को परिषद को, तालेबान के क़ब्ज़े के बाद से, "नागरिक स्थान के पतन" और "क़ानून के शासन की अनुपस्थिति", बच्चों के विकास एवं मानसिक स्वास्थ्य पर दीर्घकालिक प्रभाव, दमन व ताजिक, हज़ारा, उज़बेक और तुर्कमेन जैसे अल्पसंख्यकों के घटते प्रतिनिधित्व के बारे में भी जानकारी दी.
उन्होंने कहा, "मैं इस बात को लेकर चिन्तित हूँ कि आबादी के एक बड़े हिस्से के बीच, भेदभाव और बहिष्कार की प्रबल भावना का, अफ़ग़ानिस्तान की स्थिरता पर क्या असर पड़ सकता है."
विशेष रैपोर्टेयेर संयुक्त राष्ट्र कर्मचारी नहीं होते और किसी भी सरकार या संगठन से स्वतंत्र होकर कार्य करते हैं. वे अपनी व्यक्तिगत क्षमता में सेवा करते हैं और उन्हें अपने काम के लिए कोई वेतन नहीं मिलता है.