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श्रीलंका: संकटों से जूझ रहे मछुआरों के लिए, आय के विकल्प प्रदान करने की मुहिम

आईएलओ की परियोजना के तहत, आर्थिक संकट के दौर में, मछुआरा समुदाय के लोगों को आमदनी के विकल्प प्रदान किए जा रहे हैं.
ILO Colombo
आईएलओ की परियोजना के तहत, आर्थिक संकट के दौर में, मछुआरा समुदाय के लोगों को आमदनी के विकल्प प्रदान किए जा रहे हैं.

श्रीलंका: संकटों से जूझ रहे मछुआरों के लिए, आय के विकल्प प्रदान करने की मुहिम

आर्थिक विकास

श्रीलंका, गम्भीर आर्थिक संकट के दौर से गुज़र रहा हैजिसका स्थानीय मछुआरों की आजीविका पर भीषण असर हुआ है. इस पृष्ठभूमि में, अन्तरराष्ट्रीय श्रम संगठन (ILO) की एक परियोजना के ज़रिए, देश के उत्तरी प्रान्त के मछुआरों को मत्स्य पालन स्थलों और समुद्र तक पहुँचने के रास्तों पर रखरखाव कार्य पूरा करने के लिए रोज़गार दिया जा रहा है. इससे उन्हें आमदनी का स्रोत तो मिल ही रहा है, साथ ही क्षेत्र की कायापलट भी हो रही है.

श्रीलंका के किलिनोच्ची में पूनाकरी मछुआरा सहकारी संघ के अध्यक्ष, जोसेफ़ फ्राँसिस बताते हैं, “कोविड-19 के बाद से अब तक श्रीलंका गहन आर्थिक संकट से जूझ रहा है. इन संकटों के बीच मछुआरा समुदाय बहुत संघर्ष कर रहा है. हमें अपनी आजीविका बचाए रखने के लिए, रोज़मर्रा के जीवन में अनेक कष्टों का सामना करना पड़ रहा है.”

उन्होंने कहा, “जब हम अपना सामान बाज़ार में बेचने के लिए ले लाते हैं तो दिल टूट जाता है. पहले तो हमें समुद्री उत्पाद की अच्छी क़ीमत नहीं मिलती, दूसरा मछलियों को ताजा रखने के लिए बर्फ़ का इन्तज़ाम नहीं है. तीसरा, केकड़ों को संरक्षित करने के लिए गैस भी उपलब्ध नहीं है.”

किलिनोची में अनपुपुरम मछुआरा सहकारी समिति की कोषाध्यक्ष, अमीर लोगादेवी के अनुसार, इस संकट से ख़ासतौर पर महिलाएँ बेहद प्रभावित हुई हैं. 

“जब प्रतिदिन काम (मछली पकड़ने) होता है, तो महिलाएँ, तट पर मछली पकड़ने के जाल की मरम्मत करने का काम करती हैं. इसके अलावा वो केकड़े बाँधने में भी मदद करती हैं." 

"लेकिन अब उन्हें काम नहीं मिल रहा है. लोग कर्ज़ में डूब गए हैं और कर्ज़ देने वाली कम्पनियों का उधार नहीं चुका पा रहे हैं. कई परिवार दिन में केवल एक ही बार भोजन करके गुज़ारा कर रहे हैं.”

किलिनोच्ची में रहने वाली शफ़ी मोहम्मद यूलिया ने बताया, “हमारे पास एक डीज़ल का ट्रक है, जिसे ज़्यादातर तटीय क्षेत्र के लोग किराये पर लेते हैं. चूँकि उनके घर तट से दूर हैं, इसलिए वे मछली पकड़ने के जाल ले जाने के लिए हमारा वाहन किराये पर लेते हैं." 

"इसलिए हमें काम तभी मिलता है, जब मछुआरे समुद्र में जाते हैं. हम सभी का जीवन एक दूसरे पर निर्भर है, आपस में जुड़ा हुआ है.”

कार्यक्रम के तहत, प्रतिभागी अपने क्षेत्रों में मत्स्य लैंडिंग स्थलों और समुद्री पहुँच मार्गों में रखरखाव का काम पूरा कर रहे हैं.
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आईएलओ की परियोजना

श्रीलंका में चल रहे आर्थिक संकट से उबरने में मदद करने के लिए, अन्तरराष्ट्रीय श्रम संगठन (ILO), मछुआरा समुदायों के कमज़ोर तबक़े के सदस्यों को ILO की अल्पकालिक रोज़गार सहायता प्रदान कर रहा है. इसके तहत, समुद्र तक पहुँचने के लिए मार्गों व लैंडिंग स्थलों पर लम्बे समय से लम्बित रखरखाव कार्यों को पूरा करते हुए, आय का आवश्यक स्रोत प्रदान किया जा रहा है.

ILO की आर्थिक विकास और आपसी मेल-मिलाप के लिए स्थानीय सशक्तिकरण (LEED+) परियोजना के तहत, उत्तरी प्रान्त में युवाओं, विकलांग व्यक्तियों और महिलाओं के लिए कई अल्पकालिक आय सृजन योजनाएँ लागू की जा रही हैं.

प्रतिभागी अपने क्षेत्रों में मत्स्य लैंडिंग स्थलों और समुद्री पहुँच मार्गों में रखरखाव का काम पूरा कर रहे हैं, जिसका उद्देश्य संघर्ष प्रभावित समुदायों को सशक्त बनाते हुए, उन्हें शिष्ट एवं उपयुक्त, समावेशी और टिकाऊ कामकाज उपलब्ध करवाना है.

LEED+ परियोजना, ILO के शान्ति व सहनसक्षमता के लिए वैश्विक रोज़गार कार्यक्रम एक हिस्सा है और ऑस्ट्रेलिया सरकार के विदेश व व्यापार मामलों के विभाग (DFAT), और नॉर्वे सरकार द्वारा समर्थित है.

 जोसेफ़ फ्राँसिस, श्रीलंका के किलिनोच्ची में पूनाकरी मछुआरा सहकारी संघ के अध्यक्ष हैं.
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परियोजना का प्रभाव

जोसेफ़ फ्राँसिस बताते हैं, “इसके माध्यम से सैकड़ों परिवार अपनी ज़रूरतें पूरा करने में सक्षम हुए हैं. कुल मिलाकर 600 परिवारों ने आजीविका लाभ प्राप्त  किया है, जिसमें लगभग 80% महिलाएँ थीं.”

शफ़ी मोहम्मद यूलिया कहती हैं, “यहाँ महिलाएँ घर से बाहर निकलने में हिचकिचाती हैं. इसके बावजूद, उन्होंने वर्तमान कठिनाइयों के कारण  इस काम के लिए अपने घरों से बाहर क़दम रखा. पुरुषों के होने की, उनकी नज़रों में आने की परवाह किए बिना वो काम के लिए बाहर आईं. उनके लिए ज़रूरी यह था कि उनके बच्चों को दिन में तीन बार भरपेट भोजन मिल सके.”

उन्होंने बताया, “जब हमने साथ काम करना शुरू किया तो हमें एक-दूसरे के संघर्षों का अहसास हुआ. एक माँ अपने बच्चे का स्कूल में इसलिए दाख़िला नहीं करवा पाई, क्योंकि इसके लिए उसके पास 1300 रुपये भी नहीं थे. बच्चा पाँच महीने तक स्कूल नहीं गया. यहाँ काम शुरू करने के बाद ही उन्होंने बच्चे को स्कूल में भर्ती कराया.”

शफ़ी मोहम्मद यूलिया ने यह भी बताया कि इस अवसर का लाभ उठाकर, कुछ लोगों ने अपना ख़ुद का व्यवसाय भी शुरू किया है, “व्यवसाय शुरू करने के लिए हमें पूँजी की आवश्यकता होती है. इस आय से वे घर पर हॉपर बनाकर दुकानों में सप्लाई कर रहे हैं, पिसे हुए मसाले बेच रहे हैं, तो कोई डोसा बेच रहा है.” 

इस परियोजना की सफलता बयान करते हुए जोसेफ़ फ्राँसिस कहते हैं, “यह परियोजना, मौजूदा हालात में बहुत ही सामयिक हस्तक्षेप है. इसके तहत हमने ऐसे कई कार्य पूरे किए हैं, जो शायद हम अन्यथा नहीं कर पाते." 

"उदाहरण के लिए, इस मछली पकड़ने वाले गाँव में, अक्सर तेज़ हवाओं और बारिश के दौरान, हमारी नावें एक-दूसरे से टकराकर क्षतिग्रस्त हो जाती हैं. अब हमने इससे निपटने के लिए तट पर काम पूरा कर लिया है. समुद्र तट व सड़कों को साफ़ करने से, किनारे पर फैले अपशिष्ट से होने वाली दुर्घटनाओं से भी बचाव हुआ है.”

शफ़ी मोहम्मद यूलिया ख़ुशी से बताती है, “आप देखें, पूरा इलाक़ा अब साफ़-सुथरा है. अगर कोई गन्दगी फैलाता है तो हम उसे रोकते हैं. चूँकि हमने इसे साफ़ करने के लिए मेहनत की है तो अब हमने कूड़ा फैलाने वालों से सवाल करना शुरू कर दिया है.”

जोसेफ़ फ्राँसिस के शब्दों में, “अपने गाँव के लिए सौंपा गया काम उन्होंने बख़ूबी पूरा किया है, वो भी बड़े गर्व और स्वामित्व की भावना के साथ.”