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भारत: सामुदायिक वन अधिकारों का मीठा फल

जंगल से शरीफ़े तोड़ती महिलाएँ.
UN Women India/Ruhani Kaur
जंगल से शरीफ़े तोड़ती महिलाएँ.

भारत: सामुदायिक वन अधिकारों का मीठा फल

महिलाएँ

भारत में महाराष्ट्र प्रदेश के आदिवासी इलाक़े की महिलाएँ, वन अधिकार हासिल करके, स्वयं सहायता समूहों के ज़रिए वन उत्पादों की इकाइयाँ स्थापित कर रही हैं, जिससे क्षेत्र की आर्थिक उन्नति के साथ-साथ, महिला सशक्तिकरण का लक्ष्य प्राप्त करने में बहुत प्रगति हुई है. यूएनवीमेन के एक प्रकाशन में, इन आदिवासी महिलाओं की जिजीवीषा की सराहना की गई है.

महाराष्ट्र के गढ़चिरौली क्षेत्र के अन्दरूनी आदिवासी इलाक़े के रामगढ़ गाँव में, संगिनी नामक ग्राम स्तरीय महिला स्वयं सहायता समूहों के संघ द्वारा संचालित एक प्रसंस्करण इकाई में उत्साह का माहौल है.

जामुन और सीताफल (शरीफ़ा) के गूदे के पैकेट डीप फ्रीज़र में रखे हैं. जामुन का गूदा ताज़ा ही निकाला गया है. शरीफ़े का मौसम जल्द ही आने वाला है.

33 वर्षीय प्रतिदन्या मेश्राम बताती हैं, ''कोविड-19 के दो साल बाद, इस साल हमारी बिक्री की बेहतर सम्भावना नज़र आ रही है. हमें उम्मीद है कि इस वर्ष मुनाफ़ा अच्छा होगा.” 

अर्थशास्त्र में एमए की डिग्री प्राप्त प्रतिज्ञा, संगिनी महिला ग्राम-संघ की एकमात्र स्नातकोत्तर हैं. वह यहाँ सचिव और लेखाकार की ज़िम्मेदारी भी संभालती हैं. अनेक अन्य सदस्य, मशीनरी और और पैकेजिंग व अन्य काम करते हैं.

'संगिनी' सहायता समूह की महिलाएँ, संघ के लिए जी-तोड़ मेहनत करती हैं.
UN Women India/Ruhani Kaur

महाराष्ट्र राज्य ग्रामीण आजीविका मिशन (MSRLM) के एक हिस्से 'संगिनी' के 'उमेद' कार्यक्रम की शुरुआत कुछ साल पहले रामगढ़ में लगभग 32 स्वयं सहायता समूहों को एकजुट करके की गई थी. 

यह स्वयं सहायता समूह, कुरखेड़ा और कोरची ब्लॉक के आसपास के गाँवों के साथ, अपने या आधिकृत सामुदायिक जंगलों (CFRs) से जंगली जामुन और शरीफ़े इकट्ठा करते हैं. फिर ‘संगिनी’ उन्हें समूहों से ख़रीदकर, बड़े ख़रीदारों को बेचने के लिए संसाधित करके उनका गूदा निकालती है.

संगिनी की लुगदी बनाने वाली यह इकाई, गढ़चिरौली के ऐसे कई प्रसंस्करण केन्द्रों में से एक है, जो पूर्णत: महिला-नेतृत्व वाले समूहों द्वारा संचालित हैं. यह साल भर मिलकर कटाई करते हैं और सामूहिक रूप से लघु वन उपज का लाभ उठाते हैं. रामगढ़ में जामुन और सीताफल (शरीफ़े) पर काम होता है. वहीं अन्य ब्लॉक में स्थित एक दूसरे गाँव जम्भुलखेड़ा में, शहद और चिरौंजी पर काम किया जाता है. तेंदू-बाँस का प्रसंस्करण करने वाली इकाइयाँ भी हैं.

जब महिलाएँ क्षमता-निर्माण प्रशिक्षण में हिस्सा लेने के लिए संगठित होती हैं, तो आजीविका मिशन कार्यक्रम उन्हें इकाई शुरू करने के लिए धनराशि व अनुदान भी प्रदान करता है.

मज़बूत कार्य प्रणाली

पैकेज किए वन उत्पाद ख़रीदारी के लिए तैयार हैं.
UN Women India/Ruhani Kaur

‘उमेद’ समूह की संस्थागत प्रणाली बेहद मज़बूत है. 10-11 महिलाओं के गुट से एक स्वयं सहायता समूह बनता है. आम तौर पर एक गाँव में एक से अधिक समूह होते हैं, जिन्हें बाद में ग्राम संघ या ग्राम संगठन में विलय कर दिया जाता है. उदाहरण के लिए, रामगढ़ में 32 स्वयं सहायता समूह हैं, जिसकी सदस्य 365 महिलाएँ हैं.

ऐसे लगभग 15 ग्राम संघ, मिलकर एक गुट बनाते हैं. इसका हिस्सा बनता है तीन से चार हज़ार महिलाओं का एक बड़ा समूह, जिसकी कुछ सदस्य अपने ग्राम संघों का प्रतिनिधित्व करती हैं. 

अन्त में, इन समूहों के उत्पादों का विपणन करने के लिए, सभी समूहों की निर्माता कम्पनी बनती है. संगिनी, फलों का तैयारशुदा का गूदा, 'इकोवन' ब्रांड नाम से सीधे अपने ख़रीदारों को, या उत्पादक कम्पनी के ज़रिए बेचती है.

ज़िलाधीश संजय मीना कहते हैं, “गढ़चिरौली के लगभग एक हज़ार 450 गाँवों ने वन अधिकार अधिनियम के तहत सामुदायिक वन अधिकार हासिल कर लिया है. चूँकि क्षेत्र की दो तिहाई भूमि पर जंगल फैले हैं, इसलिए लोगों की आजीविका का मुख्य स्रोत लघु वन उपज है.”

आकांक्षी ज़िला पहल के हिस्से के रूप में, आजीविका एवं सामुदायिक उद्यम विकास के लिए सरकार का ध्यान प्रमुखत: जंगलों के माध्यम से महिलाओं के सशक्तिकरण पर केन्द्रित है.

रामगढ़, जो कभी मानचित्र पर एक बिन्दु मात्र था, अब ज़मीनी स्तर की महिलाओं के नेतृत्व और सशक्तिकरण के लिए, उत्सुकता व अध्ययन का विषय बन गया है.