नफ़रत भरी भाषा व आस्था-आधारित उत्पीड़न पर रोक लगाने की पुकार
संयुक्त राष्ट्र महासचिव ने मंगलवार को कहा कि ऑनलाइन माध्यमों पर फैल रही नफ़रत अक्सर अल्पसंख्यकों के विरुद्ध हिंसक, शारीरिक हमले भड़कने का कारण बनती है. उन्होंने सभी देशों की सरकारों, समुदायों व धार्मिक नेताओं से “नफ़रत व हिंसा भड़काने वाले कृत्यों के विरूद्ध” अपनी आवाज़ उठाने की अपील की है.
धर्म या आस्था के नाम पर हिंसक कृत्यों के शिकार लोगों की याद में मनाए जाने वाले अन्तरराष्ट्रीय दिवस के अवसर पर, यूएन महासचिव एंतोनियो गुटेरेश ने अपने सन्देश में कहा, “धर्म और आस्था की स्वतन्त्रता अपरिहार्य मानव अधिकार है.”
उन्होंने कहा, “फिर भी विश्व भर में लोग और समुदाय, विशेषकर अल्पसंख्यक, अपने पूजा स्थलों, अपनी आजीविकाओं और अपने जीवन के लिए भी ख़तरों, असहिष्णुता एवं भेदभाव का सामना करते हैं.”
महासचिव ने कहा, “यह हिंसा अक्सर ऑनलाइन और ऑफ़लाइन मंचों पर प्रचारित घृणा से भड़कती है.”
उन्होंने धर्म या आस्था के नाम पर हिंसक कृत्यों के शिकार लोगों की स्मृति के अन्तरराष्ट्रीय दिवस पर सभी पीड़ितों को याद करते हुए असहिष्णुता के इन जघन्य कृत्यों को भड़काने वाली नफ़रत भरी बोली को मिटाने का अपना संकल्प दोहराया.”
समाधान के लिए पहल
संयुक्त राष्ट्र महासचिव ने मानवाधिकारों के लिए कार्रवाई की पुकार और नफ़रत भरी भाषा के ख़िलाफ़ संयुक्त राष्ट्र की रणनीति व कार्रवाई योजना जैसी पहलों का ज़िक्र किया.
उन्होंने कहा, “मैं सभी सरकारों से आग्रह करता हूँ कि धर्म एवं आस्था के नाम होने वाले हिंसक कृत्यों को रोकने और उनसे निपटने के सिए उचित क़दम उठाएँ.”
“मैं सभी से, विशेषकर राजनैतिक, सामुदायिक एवं धार्मिक नेताओं से आग्रह करता हूँ नफ़रत और हिंसा भड़काये जाने का विरोध करें.”
महासचिव ने सरकारों, टैक्नॉलॉजी कम्पनियों और अन्य सम्बद्ध पक्षों से अपील की कि वो ऑनलाइन नफ़रत की भाषा पर अंकुश लगाने के लिए, अगले वर्ष होने वाले भविष्यवादी शिखर सम्मेलन से पहले, डिजिटल मंचों पर सूचना की प्रामाणिकता हेतु, स्वैच्छिक आचार संहिता विकसित करें.
समावेश व सम्मान
महासचिव ने कहा, "आइए, एक साथ मिलकर, हम एक अधिक समावेशी, सम्मानजनक और शान्तिपूर्ण विश्व को आकार देने का प्रयास करके, हम हिंसा के शिकार लोगों को सम्मान दें.” एक ऐसा विश्व, जहाँ विविधता को सम्मान मिले.
2019 में संयुक्त राष्ट्र महासभा द्वारा घोषित यह दिवस, उन प्रवासियों, शरणार्थियों, आश्रय चाहने वालों और अल्पसंख्यक व्यक्तियों जैसे कमज़ोर समूहों के व्यापक उत्पीड़न से प्रेरित था - जिन्हें धर्म या आस्था के आधार पर निशाना बनाया जाता है.
स्वतंत्र संयुक्त राष्ट्र मानवाधिकार परिषद द्वारा नियुक्त विशेषज्ञों के एक बड़े समूह ने एक वक्तव्य में बताया कि सभी प्रकार की असहिष्णुता और धर्म या आस्था के आधार पर भेदभाव के उन्मूलन पर संयुक्त राष्ट्र की घोषणा पर सहमति बनने में लगभग दो दशकों का समय लगा.
उन्होंने कहा कि "धर्म या आस्था की स्वतंत्रता जैसे मानवाधिकारों की उपेक्षा और उल्लंघन से पीड़ितों को व्यापक कष्ट व पीड़ा झेलनी पड़ी है.''
‘विशाल संकल्प' की आवश्यकता'
इस वर्ष, मानवाधिकारों की सार्वभौमिक घोषणापत्र (UDHR) की 75वीं वर्षगाँठ मनाई जा रही है. ऐसे में, इस बार विशेषत: इस बात पर ज़ोर दिया गया है कि यूएन चार्टर विरोधी उद्देश्यों या किसी अन्य मक़सद के लिए धर्म या आस्था का इस्तेमाल करना “पूर्णत: अस्वीकार्य और निन्दनीय होगा.”
इस वर्ष के अन्तरराष्ट्रीय दिवस को "धर्म या आस्था के आधार पर होने वाली विविध, दैनिक और गम्भीर हिंसा को उजागर करने और इसके मूल कारणों के ख़िलाफ़, अधिक दृढ़ संकल्प के साथ, तत्काल कार्रवाई करने का अवसर बताया गया है.