तथ्य-आधारित पारम्परिक चिकित्सा पद्धति को बढ़ावा दिए जाने का संकल्प
विश्व स्वास्थ्य संगठन (WHO) के प्रथम पारम्परिक चिकित्सा वैश्विक शिखर सम्मेलन के समापन पर साझेदारों एवं हितधारकों ने तथ्य-आधारित पारम्परिक, पूरक एवं एकीकृत औषधि में निहित सम्भावनाओं को संवारने का संकल्प लिया है, ताकि सौर्वभौमिक स्वास्थ्य कवरेज और मानव स्वास्थ्य व कल्याण पर केन्द्रित टिकाऊ विकास लक्ष्यों को हासिल किया जा सके.
17 से 18 अगस्त तक, भारत के गुजरात प्रदेश की राजधानी गाँधीनगर में हुआ यह दो दिवसीय शिखर सम्मेलन सर्वजन के स्वास्थ्य व कल्याण पर केन्द्रित था.
इस सम्मेलन के ज़रिए, गम्भीर स्वास्थ्य चुनौतियों का समाधान करने और वैश्विक स्वास्थ्य व टिकाऊ विकास में प्रगति आगे बढ़ाने में पारम्परिक, अनुपूरक और एकीकृत औषधि की भूमिका पर चर्चा की जा रही है.
एक अनुमान के अनुसार, दुनिया भर में 80 फ़ीसदी आबादी, पारम्परिक औषधि व चिकित्सा पद्धति का इस्तेमाल करती है.
पारम्परिक औषधि व चिकित्सा से तात्पर्य आदिवासी समुदायों व अन्य संस्कृतियों द्वारा सहेजे गए ज्ञान, कौशल व प्रथाओं के उस भंडार से है, जिसका उपयोग स्वास्थ्य बनाए रखने और शारीरिक व मानसिक बीमारी की रोकथाम, निदान व उपचार में किया जाता है.
पारम्परिक औषधि के अन्तर्गत एक्यूपंचर, आयुर्वेदिक औषधि व जड़ी-बूटी के मिश्रण और आधुनिक दवाओं का इस्तेमाल किया जाता है.
जी20 समूह के देशों समेत अन्य 88 देशों के मंत्रियों, वैज्ञानिकों, पारम्परिक औषधि का उपयोग करने वाले चिकित्सकों, स्वास्थ्यकर्मियों और नागरिक समाज के सदस्यों ने इसमें हिस्सा लिया.
सम्मेलन के दौरान सभी हितधारकों ने अपने अनूठे अनुभवों, सर्वोत्तम तौर-तरीक़ों और रचनात्मक सहयोग के लिए विचारों को साझा किया.
विश्व के अनेक क्षेत्रों, जैसेकि ऑस्ट्रेलिया, बोलिविया, ब्राज़ील, कैनेडा, ग्वाटेमाला और न्यूज़ीलैंड समेत अन्य देशों से आदिवासी लोगों के समूहों ने भी अपना ज्ञान साझा किया, जिनके लिए पारम्परिक औषधि ना केवल स्वास्थ्य देखभाल बल्कि संस्कृति और आजीविका में भी अहम भूमिका निभाती है.
सम्मेलन के दौरान पारम्परिक चिकित्सा के विषय पर विश्व स्वास्थ्य संगठन के एक वैश्विक सर्वेक्षण के नतीजों को साझा किया गया है. इसके अनुसार, लगभग 100 देशों में पारम्परिक, पूरक व एकीकृत चिकित्सा (TCIM) सम्बन्धी राष्ट्रीय नीतियाँ व रणनीतियाँ हैं.
यूएन स्वास्थ्य एजेंसी के अनेक सदस्य देशों में, पारम्परिक तौर-तरीक़ों से उपचार, अति-आवश्यक चिकित्सा की सूची में है, और राष्ट्रीय स्वास्थ्य बीमा योजनाओं में कवरेज प्राप्त है.
बड़ी संख्या में लोग उपचार, रोग की रोकथाम और ग़ैर-संचारी बीमारियों की देखभाल, दर्दनिवारक और पुनर्वास के लिए पारम्परिक, पूरक एवं एकीकृत की तलाश करते हैं.
तथ्य एवं नवाचार
फ़िलहाल राष्ट्रीय स्वास्थ्य प्रणालियों और रणनीतियों में पारम्परिक औषधि के लाखों स्वास्थ्यकर्मियों, मान्यता प्राप्त पाठ्यक्रमों, स्वास्थ्य केन्द्रों और स्वास्थ्य व्यय को एकीकृत नहीं किया गया है.
यूएन स्वास्थ्य एजेंसी के सहायक महानिदेशक डॉक्टर ब्रूस ऐलवर्ड ने कहा कि तथ्यों की एक मज़बूत बुनियाद तैयार करना, उनके संगठन की प्राथमिकता है, ताकि उपयुक्त नियामन व नीतियाँ विकसित करने में देशों को मदद प्रदान की जा सके.
शिखर सम्मेलन के दौरान पारम्परिक चिकित्सा पर उपलब्ध जटिल डेटा के विश्लेषण और अहम तौर-तरीक़ों की पहचान करने में कृत्रिम बुद्धिमता की भूमिका को भी रेखांकित किया गया.
विशेषज्ञों का मानना है कि सत्यनिष्ठ व समतापूर्ण उपायों को अपनाकर, तथ्यों के ज़रिये ऐसी नीतियाँ तैयार की जा सकती हैं, जिनसे स्वास्थ्य प्रणालियों में पारम्परिक औषधि का सुरक्षित व कारगर इस्तेमाल किया जा सके.
शिखर सम्मेलन के सारांश दस्तावेज़ में विविध प्रकार के मुद्दों पर निष्कर्षों व संकल्पों को प्रस्तुत किया गया है, जोकि वैश्विक नीति, नेतृत्व, नवाचार, स्वास्थ्य कार्यबल, डेटा, तथ्य, निगरानी, नियामन, क़ानूनी फ़्रेमवर्क, जैवविविधता संरक्षण व टिकाऊ विकास पर लक्षित हैं.